इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने 11 दिसम्बर 2025 को हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के शुभ जन्म दिवस पर ज़ाकिरों, शायरों और मद्दाहों से मुलाक़ात में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शख़्सियत पर चर्चा की। उन्होंने प्रचारिक और मीडिया जंग के संबंध में कुछ निर्देश दिए। (1)
स्पीच इस प्रकार हैः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
अरबी ख़ुतबे का अनुवादः सारी तारीफ़ पूरी कायनात के पालनहार के लिए है और दुरूद व सलाम हो हमारे सरदार और पैग़म्बर अबुल क़ासिम मुस्तफ़ा मोहम्मद और उनकी सबसे पाक, पाकीज़ा और मासूम नस्ल पर ख़ास कर ज़मीनों पर अल्लाह के ज़रिए बाक़ी रखी गई हस्ती पर।
प्यारे भाइयो और बहनो! आप सबका दिल की गराइयों से स्वागत करता हूं। हम ने इन सम्मानीय भाइयों द्वारा प्रस्तुत की गयी चीज़ों से फ़ायदा उठाया। उनके अर्थपूर्ण शेरों ने इस महफ़िल में जान डाल दी। उनके शेर इस दौर से समन्वित हैं। बहुत सी महफ़िलें ऐसी होती हैं जिन में भीड़ तो होती है, मगर वे अपने समय से समन्वित नहीं होतीं; लेकिन यह सभा, वाक़ई आज के दौर से समन्वित है। आपके शेर, आपकी बातें, आपके बयान, आपकी सभा और आपका जोश व जज़्बा, सब ने मिल कर इस सभा को मौजूदा दौर से समन्वित कर दिया।
मैं हज़रत फ़ातेमा ज़हरा, सिद्दीक़ए ताहेरा सलामुल्लाह अलैहा के शुभ जन्म दिवस और हमारे अज़ीज़ व महान इमाम ख़ुमैनी (रहमतुल्लाह अलैह) के शुभ जन्म दिवस की मुबारकबाद पेश करता हूं। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के बारे में मैं संक्षेप में अपनी बात अर्ज़ करुंगा, इसलिए कि इस महान महिला की महानता, ख़ूबियां और उच्चस्तरीय गुण ऐसे नहीं हैं कि हम अपनी ज़बान और बयान से उनका ज़िक्र कर सकें। वे हमारी सोच, हमारी कल्पना और हमारी समझ से कहीं ऊंची हस्ती हैं। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि हैं वो एक संपूर्ण आदर्श थीं। क्या हम अमल करना नहीं चाहते? क्या हम हज़रत फ़ातेमा की तरह ज़िंदगी गुज़ारना नहीं चाहते? वह आदर्श थीं; और आदर्श के मुताबिक़ ही चलना और अमल करना चाहिए। वह धर्म पर अमल का नमूना थीं, न्याय व इंसाफ़ की ध्वजवाहक थीं और जेहाद का सबसे आला नमूना थीं। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का जेहाद सबसे मुश्किल जेहादों में गिना जाता है। अगर कोई तुलना करे तो शायद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही वसल्लम की तमाम जंगें एक तरफ़ और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का जेहाद एक तरफ़ है। वह जेहाद का नमूना थीं। वह हक़ बात को बयान करने का नमूना थीं; मस्जिदुन्नबी में दिया गया उनका वह अमर ख़ुतबा बेमिसाल, स्पष्ट और सबक़ लेने योग्य था। वह महिलाओं से विशेष ज़िम्मेदारियों का भी नमूना थीं: दांपत्य जीवन, बच्चों की परवरिश, हज़रत ज़ैनब ज़ैसी शख़्सियत की तरबियत और दूसरे अनगिनत इस्लामी मूल्य। ये सब वे ज़ाहिरी पहलू हैं जो हमारी निगाह में आ सकते हैं; जबकि बातिनी और पाकीज़ा स्थान हमारी नज़र की पहुंच से ऊपर और हमारे बयान से बाहर हैं।
और अब कुछ बातें 'मद्दाही' अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम और उनके अहलेबैत की शान में शेर पढ़ने और उनका ज़िक्र करने की कला के बारे में अर्ज़ करना चाहता हूं। आज मेरी बात का केन्द्र बिंदु यही है। आज 'मद्दाही' एक बहुत अहम प्लेटफ़ार्म बन चुकी है, मुनासिब है कि इसके बारे में रिसर्च और अध्ययन किया जाए। 'मद्दाही' अब सिर्फ़ आना, पढ़ना और लोगों को रुला देना नहीं रही; हमारे मुल्क में यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतीक बन चुकी है और इस बात का तक़ाज़ा करती है कि इसका गहरा अध्ययन किया जाए। रिसर्च से मुराद क्या है? यानी गहराई तक पहुंचना; यह जानना कि इन शेरों, नज़्मों, और धुनों के पीछे क्या सोच और क्या संदेश छिपा है। इसी तरह "कमियों की पहचान" भी ज़रूरी है; ताकि संभावित कमज़ोरियों को चिंहित किया जा सके। साथ ही तरक़्क़ी के रास्तों की तलाश कि मद्दाही को किस तरह विकास के मार्ग पर ले जाया जाए और उन्नति की ओर बढ़ाया जाए। यह सब ऐसे मामले हैं जिन पर रिसर्च करने वाले काम कर सकते हैं और आज इसकी बहुत ज़्यादा ज़रूरत है।
निश्चित तौर पर अतीत में मद्दाही मौजूद थी; हमारी नौजवानी के ज़माने में भी मद्दाही करने वाले मौजूद थे, अलबत्ता इतनी व्यापकता के साथ नहीं, और न ही इतनी तादाद में, न ही इस समझ और न इस इल्मी स्तर पर, लेकिन थे। अलबत्ता उन में कुछ अहम ख़ुसूसियतें भी थीं, मिसाल के तौर पर वे लंबे लंबे क़सीदे, ज़बानी पढ़ा करते थे। फिर भी कुल मिलाकर हमारे दौर की मद्दाही और आज के दौर की मद्दाही में बहुत अंतर है। आज मद्दाही हमारे समाज में एक हैरतअंगेज़ हक़ीक़त बन चुकी है। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं ताकि हमारे अज़ीज़ मद्दाह, इस बात की ओर से जागरुक रहें कि वे किस कद़्र अहम काम अंजाम दे रहे हैं। अगरचे आप ख़ुद जानते हैं; आज के शेर और आज की विषयवस्तु से ज़ाहिर है कि मद्दाह अपनी ज़िम्मेदारियों और अपनी स्थिति से अवगत हैं। कई दशकों के बाद यह अहम हक़ीक़त अब एक प्रभावी तत्व के रूप में हमारे मुल्क में नुमायां हो चुकी है। हमे इसकी ज़रूरत है। हमें ऐसे प्रभावी तत्वों को मज़बूत करना है जो दिमाग़, सोच और दिलों पर असर डालते हैं; पहले उन्हें पहचानें, फिर उन्हें मज़बूत करें। यही मेरी अस्ल बात है जिसे मैं आगे बयान करुंगा।
निश्चित तौर पर हर मद्दाही का स्तर एक जैसा नहीं है; उनका स्तर ऊपर नीचे होता है। सभी कलाओं का यही हाल हैः कुछ आला दर्जे की होती हैं, कुछ अवसत दर्जे की लेकिन कुल मिलाकर संतुलित रूप में कहा जा सकता है कि आज मद्दाही "रेज़िस्टेंस के साहित्य" के अहम केन्द्रों में से एक है। आज मद्दाही रेज़िस्टेंस के साहित्य का एक मज़बूत स्तंभ बन चुकी है। अगर कोई सोच हो मगर उसके मुताबिक़ साहित्य न हो तो वह सोच मर जाती है और मिट जाती है। सोच और नज़रिए के मुताबिक़ साहित्य की रचना एक महान कला है। उन केन्द्रों में से एक जहाँ रेज़िस्टेंस का साहित्य तैयार होता है, फैलता है, स्थानान्तरित होता है, वह मद्दाही और अंजुमन का यही प्लेटफ़ार्म है।
अब सवाल यह है कि "राष्ट्रीय रेज़िस्टेंस" से क्या मुराद है? जब हम "रेज़िस्टेंस के राष्ट्रीय साहित्य" की बात करते हैं तो राष्ट्रीय रेज़िस्टेंस क्या होता है? आज "राष्ट्रीय रेज़िस्टेंस" की शब्दावली इस्तेमाल होती है; यह किस चीज़ के मुक़ाबले में रेज़िस्टेंस कर रहा है? राष्ट्रीय रेज़िस्टेंस से मुराद यह है कि इंसान की ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ विभागों में दुश्मन जो दबाव डालता है कि एक क़ौम को झुकने पर मजबूर कर दे, उसके मुक़ाबले में धैर्य, दृढ़ता और डट कर खड़े रहने की ताक़त। रेज़िस्टेंस से मुराद यही हैः दबाव के आगे न झुकना, बर्दाश्त करना, मुक़ाबला करना, डटे रहना, दुश्मन को आगे बढ़ने से रोक देना और उसके हाथ काट देना।
यह दबाव जिसका हम ज़िक्र कर रहे हैं, किसी भी तरह का हो सकता है; फ़र्क़ नहीं पड़ता। कभी यह सैन्य दबाव होता है, जिसे हमने देखा है; नई नस्ल ने शायद पहले न देखा हो, मगर अब वह देख रही है; हम ने तो 40 साल पहले भी इसका अनुभव किया था। मक़सद यह था कि इस्लामी गणराज्य को ज़बर्दस्ती किसी थोपी गयी बात को मानने पर मजबूर किया जाए। यह दबाव सैन्य साधन से भी हो सकता है, आर्थिक साधन से भी, या शोर और हंगामा करके, प्रोपैगंडा और मीडिया के ज़रिए हवा बना कर भी हो सकता है। ज़रा सोशल मीडिया पर नज़र डालें, विदेशी रेडियो के प्रसारण को देखें, सिर्फ़ पत्रकारों और रिपोर्टरों के नहीं बल्कि दुनिया भर के बड़े सैन्य अधिकारियों और राजनेताओं के बयान को देखें; इन सबका ध्यान एक ही केन्द्र और एक ही टार्गेट की ओर है और वह क़ौमों की दृढ़ता और रेज़िस्टेंस को निशाना बनाना- और इसमें सबसे ऊपर ईरानी क़ौम की दृढ़ता है। आज स्थिति यही है। इसलिए यह दबाव कभी सैन्य आयाम का होता है, कभी आर्थिक, मिसाल के तौर पर पाबंदियों की शक्ल में, कभी मीडिया के ज़रिए, कभी सोशल मीडिया के मैदान में, कभी जासूस तैयार करके और कभी इस जैसे दूसरे तरीक़ों से।
इस दबाव का मक़सद भी अलग अलग हो सकता हैः कभी क्षेत्रीय विस्तारवाद, जैसा कि आज कल अमरीका लैटिन अमरीका के कुछ मुल्कों के साथ कर रहा है; कभी भूमिगत संसाधनों पर क़ब्ज़ा, मिसाल के तौर पर किसी मुल्क के तेल के स्रोतों पर हाथ डालने के लिए दबाव डालना; कभी सांस्कृतिक और धार्मिक मामलों; कभी जीवन शैली को बदलने की कोशिश, जो ज़्यादातर मीडिया के संसाधनों के ज़रिए अंजाम पाती है; और इन सबसे बढ़कर, राष्ट्रीय पहचान को बदलने की कोशिश। पिछले 100 साल से पश्चिमी ताक़तें- जो क़ाजारी दौर के आख़िरी दौर में ईरान में दाख़िल हुयीं- ईरानी क़ौम की पहचान को बदलने की कोशिश में लगी रही हैं: उसकी धार्मिक पहचान, उसकी ऐतिहासिक पहचान और उसकी सांस्कृतिक पहचान। रज़ा ख़ान ने इस दिशा में पहला क़दम उठाया, मगर कामयाब न हो सका; उसके बाद आने वालों ने ज़्यादा राजनैतिक महारत के साथ क़दम उठाए, मगर वे भी सफल न हो सके; फिर इस्लामी इंक़ेलाब आया और उन सबको बहा ले गया। यह सब ईरानी क़ौम की पहचान को बदलने का दबाव था। बहरहाल इन सभी स्थितियों में रेज़िस्टेंस अपरिहार्य है। हम ने कहा रेज़िस्टेंस क्या है? यानी बर्दाश्त, दृढ़ता, डट कर खड़े रहना, न झुकना और दबाव डालने वाले को नाकाम बनाना; यही रेज़िस्टेंस का मतलब है। आज जब हम बार बार रेज़िस्टेंस के मोर्चे की बात करते हैं तो इससे यही मुराद है। एक वक़्त था जब सिर्फ़ ईरान था; आज यह रेज़िस्टेंस क्षेत्र के मुल्कों तक बल्कि कुछ मौक़ों पर क्षेत्र से बाहर के मुल्कों तक फैल चुका है; रेज़िस्टेंस धीरे धीरे व्यापक रूप ले चुका है।
निश्चित तौर पर इस्लामी गणराज्य की स्थापना और इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी के आग़ाज़ ही से ईरान ने रेज़िस्टेंस का प्रदर्शन किया, डट कर खड़ा रहा और दुश्मन के दबाव के सामने सिर नहीं झुकाया। दुश्मन ने हर तरह के हथकंडे अपनाए, जिनका हम बार बार तफ़सील से उल्लेख कर चुके हैं, इसलिए दोहराना नहीं चाहता। कुछ ऐसे हथकंडे थे कि अगर वह किसी और क़ौम या मुल्क के ख़िलाफ़ अपनाए जाते तो वह तहस नहस हो जाता; मगर ईरानी क़ौम मज़बूती से खड़ी रही और इस्लामी गणराज्य पूरी दृढ़ता और भरपूर रेज़िस्टेंस के साथ अपने स्टैंड पर क़ायम रहा।
मद्दाही भी इंक़ेलाब के आग़ाज़ ही से इसी दिशा में आगे बढ़ी; अगरचे सब नहीं, मगर यह रुझान शुरू हो गया था और जंग के ज़माने में अपने चरम पर पहुंच गया। जंग के दिनों में हर एक शहीद, मद्दाहों के ज़रिए ईरानी क़ौम के लिए एक परचम बन गया। यह मद्दाह ही थे जिन्होंने यह रोल अदा किया। अगर शहीद की लाश आती और उसके साथ मद्दाह न होता, अगर वह शौर्य पर आधारित शायरी का माहौल न बनता और शायरी दिलों को अपनी ओर आकर्षित न करती तो वह शहीद भुला दिया जाता। उन्होंने हज़रत ज़ैनब का रोल अदा किया। जैसे हज़रत ज़ैनब ने कर्बला को इतिहास में ज़िंदा रखा, वैसे ही। यह अमल इंक़ेलाब के आग़ाज़ से शुरू हुआ, आज तक जारी है और आज भी मौजूद है। अगरचे मैं जानता हूं कि मद्दाही की सभी मजलिसें आज की इस जैसी न थीं और न हैं, लेकिन फिर भी हर मजलिस में किसी न किसी दर्जे में रेज़िस्टेंस के अर्थ और उसके व्यावहारिक रूप की ओर एक झुकाव, एक नज़र और एक हरकत ज़रूर पायी जाती है।
अब मेरी बात का ख़ुलासा यह है- और मैं बस यही एक जुमला अर्ज़ करना चाहता हूं- कि आज हम महज़ सैन्य टकराव के मरहले से आगे बढ़ चुके हैं; अगरचे वह मौजूद रहा है, आपने देखा है, और उसके दोबारा होने की चिंता भी बार बार ज़ाहिर की जाती है, बल्कि कुछ लोग जान बूझकर इस आग को हवा देते हैं ताकि अवाम को डर और बेचैनी का शिकार रखें- इंशाअल्लाह वह इसमें सफल नहीं होंगे। अस्ल बात यह है कि आज हमें एक गंभीर प्रचारिक और मीडिया वॉर का सामना है और यह जंग किस के साथ है? एक बड़े मोर्चे के ख़िलाफ़। हमें एक वैचारिक और आध्यात्मिक जंग का सामना है। दुश्मन यह बात समझ चुका है कि इस पाकीज़ा और आध्यात्मिक सरज़मीन पर सैन्य ताक़त और दबाव के ज़रिए क़ब्ज़ा मुमकिन नहीं। उस ने यह भी समझ लिया कि अगर उसे किसी तरह का हस्तक्षेप या सफलता हासिल करनी है तो दिलों को बदलना होगा, दिमाग़ और सोच को बदलना होगा; इसलिए वह इसी रास्ते पर चल पड़ा है। अगरचे हम उसके मुक़ाबले में मज़बूती से खड़े हैं, लेकिन आज ख़तरा यही है, मोर्चा यही है और दुश्मन का लक्ष्य यही है। दुश्मन का लक्ष्य हमारे मुल्क में इंक़ेलाबी अवधारणा की रौशन और चमकदार निशानियां मिटाना है; उसका लक्ष्य यह है कि धीरे धीरे लोगों को इंक़ेलाब की याद से, इंक़ेलाब के मक़सद से, इंक़ेलाब के कारनामों से और इंक़ेलाब लाने वाले इमाम ख़ुमैनी की याद से ग़ाफ़िल कर दे। इसी लिए वह सरगर्म है, इसलिए कोशिशें कर रहा है, अरबों ख़र्च कर रहा है- वह कहते नहीं, मगर हम जानते हैं। वह लेखकों, कलाकारों, उपन्यासकारों, हॉलीवुड और दूसरे साधनों को इस्तेमाल में ला रहा है, मुख़्तलिफ़ हथियारों और साधनों से काम ले रहा है ताकि ईरानी नौजवानों के मन को बदल सके। इस मैदान में हमारे मुक़ाबले में एक विशाल और सक्रिय मोर्चा है; जिसका केन्द्र अमरीका है, उसके साथ कुछ योरोपीय मुल्क हैं और उसके हाशिए में वे किराए के लोग, ग़द्दार, वतनफ़रोश तत्व हैं जो योरोप और दूसरे इलाक़ों में इकट्ठा होकर सिर्फ़ रोज़ी रोटी और फ़ायदे के लिए यह रास्ता अपनाए हुए हैं। हम इन सबके मुक़ाबले में खड़े हैं।
इसलिए इंक़ेलाब और रेज़िस्टेंस के ज़िम्मेदारों को दुश्मन की इस स्थिति को अच्छी तरह पहचानना चाहिए और दुश्मन की तैनाती और उसके लक्ष्य को मद्देनज़र रखते हुए अपनी मोर्चाबंदी करनी चाहिए। जैसे सैन्य मैदान में हमारी मोर्चाबंदी दुश्मन के लक्ष्य पर निर्भर होती है; जब हम देखते हैं कि दुश्मन किसी ख़ास बिंदु पर हमला करना चाहता है तो हम ऐसी सैन्य मोर्चाबंदी अख़्तियार करते हैं जो उसे नाकाम बना दे। यही काम प्रचार और मीडिया के मैदान में भी होना चाहिए। प्रचारिक मोर्चेबंदी का ध्यान उसी दिशा में होना चाहिए जिसे दुश्मन ने अपना टार्गेट बनाया है और वे हैं: इस्लामी शिक्षाएं, शिया मत की शिक्षाएं और इंक़ेलाबी शिक्षाएं। दुश्मन ने इन्हीं को टार्गेट बनाया है; इस लिए उनके मुक़ाबले में डट कर खड़ा होना ज़रूरी है। निश्चित तौर पर यह काम आसान नहीं, लेकिन ख़ुशक़िस्मती से आज हमारे पास धार्मिक शिक्षा केन्द्र में ऐसे बहुत से माहिर धर्मगुरू मौजूद हैं जिन्होंने इन विषयों पर बहुत विचार किया है, काम किया है और क़ीमती इल्मी संपत्ति इकट्ठा की है, जिससे मुल्क के मद्दाह हल्क़े भरपूर फ़ायदा उठा सकते हैं।
आप मद्दाह हज़रात जिन अंजुमनों से जुड़े हुए हैं, उन्हें इंक़ेलाब के मूल्यों और दूसरे इस्लामी मूल्यों से लगाव का केन्द्र बना सकते हैं; ख़ास तौर पर आज जबकि ख़ुशक़िस्मती से नौजवानों का रुझान अंजुमनों की तरफ़ बहुत बढ़ गया है। आज अंजुमनों से नौजवानों में लगाव बहुत ज़्यादा है; अतीत में ऐसा नहीं था। आज मुख़्तलिफ़ शहरों में नौजवान, जैसा कि हमें रिपोर्टों से, टेलीविज़न के ज़रिए या ख़बरों से मालूम होता है, बड़े शौक़ से इन सरगर्मियों में हिस्सा ले रहे और मेहनत कर रहे हैं। इस रुझान की क़द्र करनी चाहिए और नौजवान नस्ल को उस दुश्मन की योजनाओं से सुरक्षित करना चाहिए जो ज़िद्दी, मक्कार और बदक़िस्मती से बेपनाह साधनों से लैस है।
मेरी आप से सिफ़ारिश है कि अलहेबैत (अलैहेमुस्सलाम) की मद्दाही में इस्लामी शिक्षाओं को बयान करें। मेरे निकट मासूम इमामो ने मूल रप से दो बड़े काम अंजाम दिएः एक, शिक्षाओं की व्याख्या और वर्णन जिसके नतीजे में इस्लामी शिक्षाएं सुरक्षित रहीं; अगर वे इस्लामी शिक्षाओं को बयान न करते तो आज इस्लाम और इसकी मूल शिक्षाओं में से कुछ भी बाक़ी न रहता। दूसरा, संघर्ष और मुक़ाबला। इमाम मुसलसल संघर्ष करते रहे। इस विषय पर मैं बरसों से बात करता रहा हूं। अमीरुल मोमेनीन के बाद- चाहे इमाम हसन का दौर हो, इमाम हुसैन का दौर हो या बाद के इमामों का ज़माना हो- सब के सब किसी न किसी अंदाज़ में जद्दोजेहद करते रहे; ख़िलाफ़त के ख़िलाफ़, हक़ के दुश्मनों के ख़िलाफ़, हर एक अपने अपने तरीक़े से; अंदाज़ अलग थे, मगर मक़सद एक था। यह पहलू इमामों की सीरत और उनकी ज़िंदगी के बयान में उजागर होना चाहिए। इसलिए एक अहम सिफ़ारिश यह है कि धार्मिक शिक्षाओं के साथ साथ जिद्हो जेहद और इंक़ेलाबी शिक्षाओं को भी बयान किया जाए।
एक और सिफ़ारिश यह है कि दुश्मन के मुक़ाबले में सिर्फ़ उसकी ओर से पैदा किए गए संदेह का जवाब देना काफ़ी न समझें। जवाब देना निश्चित तौर पर ज़रूरी है और दुश्मन की ओर से पैदा किए गए संदेहों का जवाब देना भी अनिवार्य है, मगर दुश्मन के अंदर बहुत सी कमज़ोरियां भी हैं; उन कमज़ोरियों को निशाना बनाएं, उन पर हमला करें और शेर के सांचे में उसे ढाल कर उन पर धावा बोलें। ख़ुशक़िस्मती से आज कुछ भाइयों ने इस मैदान में भी अपनी अच्छी सलाहियतों का प्ररदर्शन किया है।
एक और सिफ़ारिश यह है कि मद्दाही के मिम्बर से इस्लाम की ताक़तों और मज़बूत पहलुओं को पेश करें, चाहे व्यक्तिगत ज़िंदगी के मामले हों, सामाजिक मामले हों, राजनैतिक मैदान हो या दुश्मन के साथ पेश आने का तरीक़ा। इस्लाम के पास इन सभी मैदानों में गहरी शिक्षाएं और ठोस बिंदु मौजूद हैं। आपकी बातचीत और आपके प्रोग्राम सुनने वाला शख़्स क़ुरआन और उसकी शिक्षाओं से भरपूर फ़ायदा उठाए। मद्दाही को धर्म के प्रचार, धार्मिक शिक्षाओं और इंक़ेलाबी विषयों को बढ़ावा देने का एक प्रभावी साधन बनाएं। यह काम इस वक़्त भी किसी हद तक हो रहा है; इसका दायरा और फैलाएं, मज़बूत करें, आम करें और हर जगह इसका चलन आम करें। कभी कभी एक अच्छी छंदरचना और अच्छे अर्थों वाला नौहा जो आप मिम्बर पर पढ़ते हैं, सुनने वाले के दिल पर तर्कशास्त्र और दर्शनशास्त्र की दलीलों और तर्क पर आधारित भाषणों से ज़्यादा गहरा असर छोड़ जाता है।
और अच्छी धुन की बात आयी है तो इस पहलू में भी बहुत ज़्यादा एहतियात की ज़रूरत है, ताकि ताग़ूती (शाही) दौर के नग़मे और धुने हमारे धार्मिक अर्थों में दाख़िल न होने पाएं; कभी कभार इंसान को ऐसे नमूने सुनने को मिल जाते हैं। इस से बचिए! मद्दाही की धुन, आपकी अपनी धुन होनी चाहिए, आपकी रचना और आपकी क्रिएटिवटी; वे धुनें जो आपके दुश्मनों की हैं, जिनके ख़िलाफ़ आपने संघर्ष किया और जिनके ग़लत सांस्कृतिक व वैचारिक सिस्टम के ख़िलाफ़ आपकी क़ौम उठ खड़ी हुयी, आपके कलाम और बयान में दाख़िल न होने पाए।
इसलिए जो बात में महसूस करता हूं और देखता हूं वह यह है कि ख़ुशक़िस्मती से मुल्क की तरक़्क़ी के अहम साधनों में मद्दाही का एक ख़ास और नुमायां मक़ाम है। आप लोग मेहनत कर रहे हैं, कोशिश में लगे हुए हैं और जैसा कि अर्ज़ किया, इस मैदान में रिसर्च की ज़रूरत है; इसकी कमज़ोरियों को चिन्हित किया जाना चाहिए, इसकी उन्नति के रास्ते तलाश किए जाने चाहिएं और इस मक़सद के लिए उचित विषय और धुनें भी तैयार की जानी चाहिएं। मद्दाही की रक्षा करें, इसे बाक़ी रखें, इसे उन्नति दें और इस संपत्ति से भरपूर फ़ायदा उठाएं।
आख़िर में अर्ज़ करना चाहता हूं कि अल्लाह की तौफ़ीक़ से इस्लामी गणराज्य तरक्क़ी की डगर पर आगे बढ़ रहा है। हमारे पास कमियां बहुत हैं; ख़ूज़िस्तान में गर्द व ग़ुबार की मुश्किल जिसका ज़िक्र किया गया, (2) उन में से एक मामूली सी मिसाल है; इससे कहीं बड़ी मुश्किलें भी मुल्क में मौजूद हैं। लेकिन इसके बावजूद मुल्क आगे बढ़ रहा है। ईरानी क़ौम दिन ब दिन इस्लाम की साख और आबरू में चार चाँद लगा रही है और यह साबित कर रही है कि इस्लाम का मतलब दृढ़ता है, इस्लाम का मतलब ताक़त है, इस्लाम का मतलब सच्चाई और ख़ुलूस है, इस्लाम का मतलब दूसरों की भलाई और न्याय व इंसाफ़ है। ईरानी क़ौम धीरे धीरे इन हक़ीक़तों को व्यवहारिक रूप में दुनिया के सामने पेश कर रही है। निश्चित तौर पर मुल्क में बड़े बदलाव तुरंत नज़र नहीं आते, क्योंकि वे धीरे धीरे होते हैं और लंबी मुद्दत में घटित होते हैं; वह एक लम्हे में अंजाम नहीं पाते कि तुरंत नज़र आने लगें। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूं कि अल्लाह की कृपा से हमारा समाज धीरे धीरे तरक़्क़ी कर रहा है। आज का नौजवान धार्मिक मसलों के संबंध में, इंक़ेलाब के आरंभिक दिनों को छोड़ कर, बीच के हर दौर की तुलना में कहीं ज़्यादा आगे है और इंशाअल्लाह भविष्य में भी और ज़्यादा आगे बढ़ेगा।
शहीदों की पाकीज़ा आत्माएं और महान इमाम ख़ुमैनी की पाकीज़ा आत्मा ख़ुश रहें जिन्होंने ईरानी क़ौम के लिए यह राह समतल की।
आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत हो।
(1) इस मुलाक़ात के आग़ाज़ में कुछ मद्दाहों और क़सीदा पढ़ने वालों ने अहलेबैत की प्रशंसा की और उनकी शान में क़सीदे पढ़े।
(2) ख़ूज़िस्तान के एक मद्दाह के शेर की ओर इशारा