क़ुद्स दिवस की रैली इस बात का भी सबूत है कि ईरानी क़ौम अपने अज़ीम सियासी और बुनियादी लक्ष्यों पर अडिग और दृढ़ है। ऐसा नहीं है कि फ़िलिस्तीन के समर्थन का नारा देकर एक-दो साल बाद भूल जाए। 40 से अधिक वर्षों से ईरानी राष्ट्र क़ुद्स दिवस पर रैलियां निकालता आ रहा है।
अमरीकी, योरोपीय और उन जैसे दूसरे राजनेता जो एक बड़ी ग़लती करते हैं वह यह है कि क्षेत्र में रेज़िस्टेंस के सेंटरों को ईरान की प्रॉक्सी फ़ोर्सेज़ कहते हैं। फ़िलिस्तीन पर नाजायज़ क़ब्ज़े के वक़्त से ही उसके ख़िलाफ़ खड़े होने वालों की अग्रिम पंक्ति में जो मुल्क थे, उनमें से एक यमन था।
अमेरिकियों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि ईरान के मामले में धमकियों से कुछ हासिल नहीं होगा। अगर उन्होंने ईरान के अवाम के ख़िलाफ़ कोई दुष्टता की, तो उन्हें सख़्त जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
अगर ईरानी क़ौम और मुसलमान क़ौमें इस महान इंसान और पैग़म्बरे इस्लाम के बाद सबसे श्रेष्ठ हस्ती से फ़ायदा उठाना चाहती हैं तो नहजुल बलाग़ा ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ें।
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अपने नौरोज़ के पैग़ाम में पिछले हिजरी शम्सी साल के अहम वाक़यों का ज़िक्र किया और नए हिजरी शम्सी साल में कोशिशों और योजनाओं की दिशा निर्धारित करने के लिए नारा तय फ़रमायाः "उत्पादन के लिए पूंजीनिवेश"
ग़ज़ा पर क़ाबिज़ ज़ायोनी शासन का दोबारा हमला, बहुत बड़ा अपराध और त्रासदी को जन्म देने वाला है। पूरी दुनिया में आज़ाद प्रवृत्ति के लोग इस करतूत का मुक़ाबला करें।
बेशक परहेज़गार लोग बहिश्तों और चश्मों में होंगे (51:15) और उनका परवरदिगार जो कुछ उन्हें अता करेगा वह वे ले रहे होंगे बेशक वे इस (दिन) से पहले ही (दुनिया में) नेकूकार थे। (51:16) ये लोग रात को बहुत कम सोया करते थे (51:17)और सहर के वक़्त मग़फ़ेरत तलब किया करते थे। (51:18) और उनके मालों में से सवाल करने वाले और सवाल न करने वाले मोहताज सबका हिस्सा था।(51:19) और ज़मीन में यक़ीन करने वालों के लिए (हमारी क़ुदरत की) निशानियां हैं। (51:20)
भारतीय शायर का कलाम सुनने के बाद इस्लामी इंक़ेलाब के नेता की टिप्पणीः यह बात अहम है कि एक शख़्स जिसकी मातृ भाषा फ़ारसी न हो वह इतनी साफ़ सुथरी ज़बान में शेर कहे। फ़ारसी में बात करना एक कला है और फ़ारसी में शेर कहना दूसरी कला है।
अमरीकी राष्ट्रपति ने, इसी शख़्स ने पूरी हो चुकी, मुकम्मल हो चुकी वार्ता, दस्तख़त हो चुके समझौते को मेज़ से उठाकर फेंक दिया, फाड़ दिया। इस इंसान से किस तरह वार्ता की जा सकती है? वार्ता में इंसान को यक़ीन होना चाहिए कि सामने वाला पक्ष उस चीज़ पर अमल करेगा जिसका उसने वादा किया है हम जानते हैं कि वह अमल नहीं करेगा तो फिर किस लिए वार्ता हो?
इंसान दुआ से, अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाकर, रोज़े से ख़ुद को भूल जाने की इस ग़फ़लत से मुक्ति पा सकता है और अगर यह ग़फ़लत दूर हो जाए तो उस वक़्त इंसान को अल्लाह का सवाल याद आता है और हम ध्यान देते हैं कि अल्लाह हमसे सवाल करेगा।
हम बैठे, कई साल बातचीत की; इसी शख़्स ने, बातचीत पूरी होने, समझौते पर दस्तख़त होने के बाद, समझौते को मेज़ से उठाकर फेंक दिया, फाड़ दिया। ऐसे शख़्स के साथ बातचीत कैसे की जा सकती है?
उन्होंने अल्लाह को भुला दिया तो अल्लाह ने भी ऐसा किया कि वे अपने आप को ही भूल गए, यानी ख़ुद फ़रामोशी का शिकार हो गए। व्यक्तिगत स्तर पर इंसान के ख़ुद को भुल जाने का मतलब यह है कि इंसान अपने पैदा होने के मक़सद को भूल जाता है।
कुछ बदमाश सरकारें, वार्ता पर इसरार कर रही हैं,उनका वार्ता पर इसरार मसले के हल के लिए नहीं बल्कि हुक्म चलाने के लिए है। वार्ता करें ताकि मेज़ की दूसरी ओर जो पक्ष बैठा है उस पर अपनी इच्छा थोपें।
रमज़ान का महीना ज़िक्र का महीना है, क़ुरआन का महीना है और क़ुरआन ज़िक्र की किताब है। 'ज़िक्र' का क्या मतलब है? ज़िक्र, ग़फ़लत और फ़रामोशी की ज़िद्द है।
अब तीन योरोपीय देश, विज्ञप्ति जारी कर रहे हैं, बयान दे रहे हैं कि ईरान ने परमाणु समझौते जेसीपीओए में अपने वचन पर अमल नहीं किया! कोई उनसे यह पूछे कि आपने अमल किया?!आपने पहले दिन से अमल नहीं किया! अमरीका के निकल जाने के बाद, आपने वादे किया था कि किसी न किसी तरह भरपाई करेंगे, आप अपने वादे से फिर गए, फिर कुछ और वादा किया, उस दूसरे वादे से भी फिर गए।
क़ुरआन से "उंस की महफ़िल" में क़ुरआन के क़ारियों को इस्लामी इंक़ेलाब के नेता की नसीहतः क़ुरआन की तिलावत के वक़्त ख़ुद को अल्लाह के सामने महसूस करें। क़ुरआन के मानी पर ध्यान देने का असर होता है।
अगर क़ुरआन की सही तरीक़े से तिलावत हो और ध्यान से सुना जाए तो हर बीमारी दूर हो जाती है। क़ुरआन की अच्छे तरीक़े से तिलावत हो और हम उसे सुनें और उस पर अच्छी तरह ध्यान दें तो हमें बहुत बड़े नतीजे हासिल होंगे।
अभी एक महीना -कुछ कम या ज़्यादा- का समय मेरे ईरान के सफ़र और इस्लामी इंक़ेलाब के नेता से मुलाक़ात को नहीं गुज़रा था कि फ़िलिस्तीन का इंतेफ़ाज़ा आंदोलन भड़क उठा।
हम जब भी इस्लामी इंक़ेलाब के नेता की सेवा में पहुंचते और क्षेत्र के हालात के बारे में उनसे बात करते तो वे मुस्कुराते थे और कहते थे कि हमें रेज़िस्टेंस के रास्ते को जारी रखना होगा और इंशाअल्लाह समझौते की साज़िश सफल नहीं होगी।
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता के प्रतिनिधियों ने, जो शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह और शहीद सैयद हाशिम सफ़ीउद्दीन के अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए लेबनान पहुंचे थे, आज दोपहर को सूर शहर के दैर क़ानून अन्नहर इलाक़े में बहादुर व बलिदानी मुजाहिद सैयद हाशिम सफ़ीउद्दीन के पाकीज़ा शव के अंतिम संस्कार में शिरकत की।
हम सबके सब अज़ीज़ सैयद की शहादत पर दुखी और सोगवार हैं। अलबत्ता हमारी सोगवारी अवसाद, मानसिक परेशानी और निराशा के मानी में नहीं है। यह शहीदों के सरदार इमाम हुसैन बिन अली अलैहेमस्सलाम की अज़ादारी जैसी है।
हिज़्बुल्लाह और शहीद सैयद ने ग़ज़ा की रक्षा और मस्जिदुल अक़्सा के लिए जेहाद और क़ाबिज़ व ज़ालिम शासन पर वार करके पूरे क्षेत्र की निर्णायक सेवा में क़दम बढ़ाया। अल्लाह का सलाम हो शहीद रहनुमा नसरुल्लाह पर।
हज़रत सैयद हसन नसरुल्लाह (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) आज इज़्ज़त की चोटी पर हैं। उनका पाकीज़ा शरीर अल्लाह की राह में जेहाद करने वालों की सरज़मीन में दफ़्न होगा लेकिन उनकी रूह और राह हर दिन ज़्यादा से ज़्यादा कामयाबी का जलवा बिखेरेगी इंशाअल्लाह और रास्ता चलने वालों का मार्गदर्शन करेगी।
दुश्मन जिस रास्ते से अवाम के मन में पैठ बनाना चाहता है, उस रास्ते को बंद करें, दुश्मन के मुक़ाबले में डट जाएं, कंटेन्ट बनाएं, विचार पेश करें, आज के बुद्धिजीवियों का यह काम, हार्डवेयर से रक्षा से ज़्यादा अहम है।
दुनिया के साम्राज्यवादी, दुनिया की इम्पीरियल ताक़तें और दुष्ट तत्व, इस्लामी गणराज्य से इस वजह से क्रोधित हैं कि इस्लामी गणराज्य बाक़ी रह गया, डटा रह गया, इन्हें मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत दिखा सका।
अपने जवानों, अपने वैज्ञानिकों, अपने टेक्नॉलोजी के माहिरों की कोशिश की बर्कत से, आज हार्ड डिफ़ेंस के लेहाज़ से, दुश्मन के सैन्य ख़तरों से निपटने के लेहाज़ से, हमें कोई चिंता और परेशानी नहीं है।
जल्द ही फ़िलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हमास की नेतृत्व परिषद के प्रमुख मोहम्मद इस्माईल दरवीश का Khamenei.ir को दिया गया ख़ुसूसी इंटरव्यू पेश किया जाएगा।
अल्लाह ने क़ुरआन मजीद की इस आयत को "ख़ुदा के हुक्म से कई छोटी जमाअतें बड़ी जमाअतों पर ग़ालिब आ जाती हैं..." (सूरए बक़रह, आयत-249) आपके ज़रिए पूरी दुनिया के सामने मिसाल के तौर पर पेश किया।