उन्होंने चालीस पैंतालीस साल से ईरान से अमरीका की दुश्मनी के कारण की ओर इशारा करते हुए कहाः अमरीका, ईरान को निगलना चाहता है लेकिन ईरानी क़ौम और इस्लामी गणराज्य रुकावट बने हुए हैं और ईरानी क़ौम का जुर्म यह है कि उस ने अमरीका से कहा है कि तुमने हिम्मत कैसे की?!

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने तेल, गैस, खदानों, रणनैतिक और भौगिलक स्थिति जैसे अनेक आकर्षणों को अमरीका जैसी हमलावर और लालची ताक़तों की लालच का सबब बताया और कहाः वे ईरान पर क़ब्ज़ा करना और उस के संसाधनों, तेल, राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क पर पहलवी दौर की तरह कंट्रोल हासिल करना चाहते हैं। उनकी दुश्मनी की वजह यह है और जो वह मानवाधिकार का बात करते हैं, वह उनकी बकवास है।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने बल दियाः ईरानी क़ौम अमरीका की ललचायी नज़रों के मुक़ाबले में सीना तान कर खड़ी है और डटी रहेगी और उन्हें इस बात की ओर से निराश कर देगी कि वे ईरान को तक़लीफ़ और पीड़ा दे सकें।

उन्होंने जंग के बारे में अमरीकियों की धमकी और फ़ुलां फ़ाइटर जेट के इस्तेलाम जैसी बातों की ओर इशारा करते हुए कहाः यह कोई नई बात नहीं है और अतीत में भी उन्होंने बार बार धमकी दी कि सभी विकल्प मेज़ पर हैं; अब यह जनाब (अमरीकी राष्ट्रपति) बार बार इस तरह के दावे कर रहे हैं कि हम युद्धपोत ले आए हैं।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने कहाः ईरानी क़ौम को इन चीज़ों से नहीं डराना चाहिए; ईरानी क़ौम पर इन बातों का असर नहीं होता। अलबत्ता हम जंग की शुरूआत नहीं करेंगे और न ही किसी पर ज़ुल्म और न ही किसी मुल्क पर हमला करना चाहते हैं लेकिन ईरानी क़ौम उस शख़्स के मुंह पर भरपूर मुक्का मारेगी जो उस की ओर ललचायी नज़र से देखे, हमला करे या पीड़ा दे।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने बल दियाः अलबत्ता अमरीकी यह बात जान लें कि अगर इस बार उन्होंने कोई जंग छेड़ी तो क्षेत्रीय जंग होगी।

उन्होंने अपनी स्पीच के दूसरे भाग में, हालिया दंगों पर अमरीकी और ज़ायोनी रंग चढ़े होने पर बल देते हुए, दंगाइयों को सरग़नाओं और प्यादों पर आधारित बताया और कहाः सरग़नाओं ने जिन में से बहुत से गिरफ़्तार हो गए हैं, इस बात को माना है कि उनकी करतूतों के लिए उन्हें पैसे मिले थे और उन्होंने इंस्टीट्यूशंस पह हमले करने, नौजवानों को इकट्ठा करने और हरकत में लाने की ट्रेनिंग ली थी लेकिन दंगाइयों का दूसरा भाग, उन उत्तेजित जवानों का था जिन से हमें कोई ख़ास प्रॉब्लम नहीं है।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अमरीकी राष्ट्रपति की बातों को हालिया फ़ितने पर अमरीकी और ज़ायोनी रंग चढ़े होने की साफ़ निशानी बताया और कहाः वह साफ़ तौर पर उन दंगाइयों से जिन्हें उन्होंने ईरानी अवाम कहा, कह रहे थेः "आगे बढ़ो मैं भी आ रहा हूं!" अलबत्ता उनकी नज़र में कुछ हज़ार दंगाई, ईरानी अवाम थे लेकिन 12 जनवरी 2026 को दसियों लाख की तादाद में पूरे मुल्क में इकट्ठा होने वाले लोग, ईरानी अवाम नहीं हैं!

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने इस्लामी गणराज्य के विचार, उसके नए रास्ते और दुनिया के मुंहज़ोरों के हितों से उसके टकराव को, उनकी दुश्मनी के जारी रहने का सबब बताया और कहाः यही वजह है कि हालिया फ़ितना जो तेहरान में पहला फ़ितना नहीं था और यह आख़िरी भी नहीं होगा, मुमकिन है भविष्य में दोबारा सिर उठाए।

उन्होंने कहाः यह दुश्मनियां उस वक़्त तक जारी रहेंगी यहाँ तक ईरान स्थिरता, दृढ़ता और मामलों पर पूरी तरह कंट्रोल से दुश्मनों को मायूस कर दे, और हम उस बिंदु पर भी पहुंचेंगे।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने इस बात पर बल दिया कि देश के अधिकारी, अवाम की क़द्र को समझें। उन्होंने कहाः अलबत्ता यह फ़ितना अचानक या सुनियोजित रूप में ऐसे वक़्त हुआ जब सरकार और अधिकारी देश की हालत को बेहतर बनाने के लिए आर्थिक पैकेज और मंसूबा बना रहे हैं।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने हालिया फ़ितने की आख़िरी ख़ुसूसियत, उस पर दाइश की हिंसा का रंग चढ़ा होना बताया।

उन्होंने मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति की उन के पहले कार्यकाल में, दाइश को बनाने में अमरीकी सरकार के हाथ होने की स्वीकारोक्ति की ओर इशारा करते हुए कहाः हालिया फ़ितने में भी अमरीकियों ने, दाइशियों को वजूद दिया कि जिनकी करतूतें दाइश की तरह थीं। दाइश, लोगों पर अधर्मी होने का इल्ज़ाम लगाकर उनकी गर्दन मारता था और ये लोग, लोगों को धर्म पर अमल करने की वजह से मार रहे थे, बहुत ही निर्दयता से लोगों को ज़िंदा आग में जलाया और लोगों की गर्दनें काटीं।

उन्होंने अपनी स्पीच के अंतिम भाग में 1 फ़रवरी को बेमिसाल और ऐतिहासिक दिन बताया और 1 जनवरी 1979 को अवाम द्वारा इमाम ख़ुमैनी के बेमिसाल रूप से किए गए स्वागत की ओर इशारा किया और कहाः इमाम (ख़ुमैनी) हर तरह के ख़तरों के बीच, हिम्मत और ताक़त के साथ तेहरान पहुंचे; उन्होंने अवाम के विशाल और हैरतअंगेज़ स्वागत को, नए सिस्टम का गठन करने वाले तत्व में बदल दिया और उसी दिन शाही सरकार के पतन का एलान किया।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने ज़ालिम और निरंकुश सरकार को, ऐसी सरकार में बदलना जिसमें अवाम सब कुछ हैं और पहलवी के मद्देनज़र धर्म विरोधी प्रक्रिया को इस्लामी प्रक्रिया में बदलने को, इमाम और क़ौम के संघर्ष के नतीजे में वजूद में आने वाले सिस्टम की दो ख़ुसूसियत गिनवाया और कहाः अगर सभी अधिकारी अपने फ़रीज़े पर अमल करते तो सरकार वाक़ई धार्मिक होती लेकिन कुल मिलाकर यह कि धार्मिक और इस्लामी प्रक्रिया में हम आगे बढ़े हैं।

उन्होंने मुल्क को असके अस्ली मालिक यानी क़ौम के हवाले करने और ईरान से अमरीका की पैठ ख़त्म कर देने की इस्लामी गणराज्य की दूसरी ख़ुसूसियत बताया और कहाः इस ख़ुसूसियत से अमरीका नाराज़ हो गया और उसी दिन से वह क़ौम और सिस्टम का दुश्मन हो गया।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने सरकार के अवामी होने के आयाम की व्याख्या में, क़ौम में आत्म विश्वास की भावना पैदा होने की ओर इशारा किया और कहाः तत्वदर्शी इमाम ने, क़ौम को उसकी बड़ी सलाहियतों और मूल्यों से आगाह किया और "नहीं कर सकते" की भावना को "हम कर सकते हैं" जैसे बहुत अहम विश्वास में बदल दिया।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने क़ाजारी और पहलवी शासन की नीतियों, अपनी पहचान के छोड़ने और दूसरों पर निर्भरता के नतीजे को, एक क़ौम को जिसका संस्कृति और सभ्यता के लेहाज़ से बहुत ही उज्जवल अतीत था, अपमानित और पिछड़ी क़ौम में बदलना बताया और कहाः उस दौर में, इल्म, टेक्नॉलोजी, राजनीति, जीवन शैली, अंतर्राष्ट्रीय साख, क्षेत्रीय समीकरण और दूसरे क्षेत्रों में हम पिछड़ गए थे लेकिन इमाम ख़ुमैनी ने क़ौम में आत्म विश्वास की भावना जगायी और रास्ते को 180 डिग्री बदल दिया।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने तेहरान के हालिया फ़ितने की घटनाओं और अपराधों को, 20 जून 1981 के अपराधों जैसा बताया कि जिसके दौरान मुनाफ़िक़ तत्व, दरी काटने वाले चाक़ू लेकर दूसरों पर टूट पड़े। उन्होंने कहा कि इन सभी घटनाओं में विदेशी हाथ ख़ास तौर पर अमरीका और ज़ायोनी शासन का हाथ साफ़ तौर पर नज़र आता है।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने हालिया फ़ितने को नाकाम बनाने में अवाम के योगदान की ओर इशारा करते हुए कहाः अगर मुल्क को कभी ऐसे हालात का सामना हुआ तो अल्लाह इस अवाम को उस से निपटने के लिए नियुक्त करेगा और अवाम सब कुछ ठीक कर देंगे।

उन्होंने हालिया अमरीकी फ़ितने की ख़ुसूसियत की व्याख्या में, व्यापारियों के एतेराज़ के पीछे, दंगाइयों के छिपे होने को इसकी पहली ख़ुसूसियत बताया और कहाः फ़ितना करने वाले, उन अपराधियों की तरह जो शहरों पर हमले में औरतों और बच्चों को अपनी ढाल बनाते हैं, व्यापारियों की भीड़ में जिनकी बातें तर्कपूर्ण थीं और वे सड़कों पर आए थे, छिप गए ताकि पहचानें न जाएं।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने हालिया फ़ितने की दूसरी ख़ुसूसियत को उसके तख़्तापलट जैसा होना बताया और कहाः यह फ़ितना, तख़्तापलट जैसा था और मुल्क को चलाने में अहम और प्रभावी सेंटरों को ध्वस्त किया जाना, जैसे पुलिस, आईआरजीसी के सेंटरों, कुछ सरकारी केन्द्रों, बैंकों और मस्जिदों पर हमला और क़ुरआन का अनादर, इस सच्चाई का पता देता है।

उन्होंने फ़ितने की योजना के विदेश में तैयार किए जाने और उसके भीतरी सरग़नाओं को, सैटलाइट के ज़रिए सूचना दिए जाने जैसी मुख़्तलिफ़ सहूलतों के ज़रिए दिशा निर्देश को, जनवरी महीने के दंगों की दूसरी ख़ुसूसियत गिनवाया और कहाः प्राप्त सूचना के मुताबिक़, सरकार में प्रभावी एक अमरीकी तत्व ने बताया है कि सीआईए और मोसाद, इस वाक़ए में अपने सारे साधन मैदान में ले आए।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने लोगों की हत्या को दंगों की दूसरी ख़ुसूसियत बताया और कहाः दंगाइयों ने सैन्य और पुलिस सेंटरों पर आधुनिक हथियारों से हमला किया ताकि सुरक्षा बल की जवाबी कार्यवाही में कुछ लोग मारे जाए, अलबत्ता लोगों की हत्या करने में दंगाइयों ने अपने पियादों पर भी रहम नहीं किया, बल्कि उन्हें भी निशाना बनाया।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने मारे जाने वालों की तादाद को 10 गुना बताने की दुश्मन की कोशिश की ओर इशारा करते हुए कहाः वे चाहते थे कि मारे जाने वालों की तादाद इससे ज़्यादा हो, अलबत्ता जितने लोग मारे गए हैं बहुत दुख की बात है।

उन्होंने दुश्मन का मुख्य लक्ष्य मुल्क की सुरक्षा स्थिति को बिगाड़ना बताया और कहाः जब सुरक्षा नहीं होगी तो कुछ नहीं बचेगा इस लिए जिन लोगों ने मुल्क की सुरक्षा को बनाए रखा, उनका सारे अवाम की गर्दन पर हक़ है।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने बल दिया कि दंगाई, अवाम को सिस्टम के मुक़ाबले में लाना चाहते थे लेकिन 12 जनवरी को अवाम ने दसियों लाख की तादाद में बाहर निकल कर दुश्मनों की योजना पर पानी फेर दिया और ईरानी क़ौम की हक़ीक़त को ज़ाहिर कर दिया।

आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अपनी स्पीच के अंतिम भाग में, विभिन्न क्षेत्रों में मुल्क की तरक़्क़ी का ज़िक्र करते हुए कहाः कौन सोच सकता था कि ईरानी क़ौम एक दिन ऐसे मक़ाम पर पहुंच जाएगी कि अमरीकी, उसके बनाए हुए हथियारों की कॉपी करेंगे? ये उसी आत्म विश्वास, उम्मीद और महत्वकांक्षा का नतीजा है जिसे इमाम ख़ुमैनी ने जो उम्मीद और आत्मविश्वास का प्रतीक थे, क़ौम में जगाया और अवाम को हरकत और कोशिश की राह पर ले आए।