इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई ने 17 जनवरी 2026 को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि वआलेही वसल्लम की पैग़म्बरी के एलान की ईद की सालगिरह पर, जिसे ईदे बेसत कहते हैं, अपने बहुत अहम ख़ेताब में, बेसत के बहुत अहम पहलुओं पर रौशनी डाली। उन्होंने मुल्क में फ़ितना और दंगे की घटनाओं और उसमें अमरीका के रोल के बारे में बात की।
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता का ख़ेताब इस प्रकार हैः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
अरबी ख़ुतबे का अनुवादः सारी तारीफ़ पूरी कायनात के पालनहार के लिए है और दुरूद व सलाम हो हमारे सरदार और पैग़म्बर अबुल क़ासिम मुस्तफ़ा मोहम्मद और उनकी सबसे पाक, पाकीज़ा और चुनी हुयी नस्ल पर ख़ास कर ज़मीनों पर अल्लाह के ज़रिए बाक़ी रखी गई हस्ती पर।
यहाँ मौजूद सभी अज़ीज़ भाइयो और बहनो, पूरी ईरानी क़ौम, दुनिया के तमाम मुसलमानों और दुनिया के स्वतंत्रता प्रेमियों की सेवा में बेसत की इस पाकीज़ा और अज़ीम ईद की बधाई पेश करता हूं। इंशाअल्लाह इस दिन की याद, दिल को रौशन करे, हमें रास्ता दिखाए और हम बेसत की हक़ीक़त से फ़ायदा उठा सकें।
पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही वसल्लम की बेसत का दिन बहुत अहम दिन है, यानी मानव इतिहास में इस से ज़्यादा अहम दिन कोई नहीं है। बेसत का दिन हक़ीक़त में क़ुरआन का जन्म दिवस है, वह क़ुरआन जो साकार तत्वदर्शिता और प्रकाश है, अमीरुल मोमेनीन के शब्दों में यह "चमकने वाले प्रकाश" का दिन है। आप फ़रमाते हैं, "अन्नूरुस सातेअ" (1) यह संपूर्ण इंसान की तरबियत का दिन है, यानी इसी दिन से संपूर्ण इंसान की तरबियत का प्रोग्राम, जिसकी बेहतरीन मिसाल, 12 इमाम हैं, मुहैया हुआ। यह इस्लामी सभ्यता का रोडमैप तैयार होने का दिन है, यानी हक़ीक़त में इसी दिन इस्लामी सभ्यता का आग़ाज़ हुआ और इसका अज़ीम, ऐतिहासिक और स्थायी प्रोग्राम जो आज भी हमारी और आपकी पहुंच में है, इसी दिन वजूद में आया। यह दिन न्याय, समानता और भाईचारे का परचम ऊंचा करने का दिन है और इसी तरह की दूसरी अहम ख़ुसूसियतें। बेसत के दिन की महानताओं को हम लोग बयान नहीं कर सकते, यानी हमारी अक़्ल, हमारी ज़बान, हमारा दिल इससे कहीं छोटा, अक्षम है कि हम पैग़म्बरे इस्लाम की बेसत की अहमियत को बयान कर सकें। हाँ, अमीरुल मोमेनीन बयान कर सकते हैं और उन्होंने बयान भी किया है। आप 'नहजुल बलाग़ा' पढ़ें, नहजुल बलाग़ा का दूसरा ख़ुतबा, पैग़म्बरे इस्लाम की बेसत के बारे में है कि अल्लाह ने उन्हें कैसे पैग़म्बरी के लिए नियुक्त किया, कैसे हालात में और किस स्थिति में नियुक्त किया। नहजुल बलाग़ा के कुछ दूसरे ख़ुतबों में भी ये चीज़ें बयान हुयी हैं।
मैं बेसत के बारे में सिर्फ़ एक बात अर्ज़ करुंगा जो आज, हमारी दूसरी बातों से ज़्यादा हमारे काम की है और वह यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम की बेसत, वास्तविक मानव सभ्यता का प्रतीक है, यानी अगर इंसानियत बेहतरीन तरीक़े से ज़िंदगी गुज़ारना चाहती है तो उसे बेसत में पेश किए गए प्रोग्राम के मुताबिक (ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए) इसी प्रोग्राम के ज़रिए वह अच्छी ज़िंदगी गुज़ार सकती है।
यह वाक़ेया, यह घटना कहाँ हुयी? बेसत कहाँ और कैसे हालात में (हुयी)? बेसत जितने बुरे हालात की आप कल्पना कर सकते हैं, ऐसे हालात में हुयी, ऐसे लोगों के बीच हुयी जो नैतिक, व्यवहारिक, वैचारिक और मानसिक लेहाज़ से तत्कालीन समाजों में सब से बुरे, सब से दुर्भाग्यशाली, सब से ज़िद्दी, सब से ज़्यादा पक्षपाती,(2) सब से ज़ालिम और सब से मुंहज़ोर लोग समझे जाते थे, अरब प्रायद्वीप ऐसा ही था। अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम उस वक़्त के हालात के बारे में फ़रमाते हैं कि "हिदायत बेअसर और गुमराही आम थी"(3) मार्गदर्शन की मशाल बिलकुल बुझी हुयी थी, यानी सृष्टि की पाकीज़ा हक़ीक़तों की ओर कोई मार्गदर्शन नहीं था, गुमराही आम थी, यानी अमीरुल मोमेनीन मक्के और मदीने के लोगों की ऐसी हालत का चित्रण करते हैं जहाँ पैग़म्बरे इस्लाम भेजे गए। वे लोग जाहिल थे, अनपढ़ थे, ज़िद्दी थे, पक्षपाती थे, भ्रष्ट थे, घमंडी थे, इन सभी बुराइयों के साथ जो उन में मौजूद थीं, घमंड भी था, वे ज़ालिम थे, उन में वर्ग भेद था। उन का बड़ा भी बुरा था, छोटा भी बुरा था, उनका ज़ालिम भी, उनका मज़लूम भी, उन का ग़ुलाम भी, उन का आक़ा भी। एक ऐसे माहौल में बेसत हुयी, इस्लाम ने जन्म लिया, क़ुरआन नाज़िल हुआ, एक ऐसे माहौल में।
इस्लाम की बुनियाद अक़्ल और ईमान है। सभी इस्लामी प्रोग्रामों को अक़्ल और ईमान की कसौटी पर परखना, समझना और अमल में लाना चाहिए। उन के पास न अक़्ल थी, न ईमान। पैग़म्बरे इस्लाम उस समाज में आए, यानी अल्लाह के पैग़ाम को, अल्लाह की वहि को, अल्लाह के कलाम को इस तरह के लोगों के सामने पेश किया और 13 साल की मुद्दत में और 13 साल (कोई लंबी) मुद्दत नहीं है, उन्होंने उन्हीं लोगों में से अम्मार बनाया, अबूज़र बनाया, मेक़दाद बनाया, उन्हीं लोगों में से!
कोई टीचर ऐसी क्लास में पहुंचे, जहाँ सारे बच्चे सरकश, ग़ाफ़िल, ध्यान न देने वाले, बुद्धू, पढ़ाई में रुचि न लेने वाले हों और फिर वह एक निर्धारित मुद्दत में शिष्ट, तैयार, शिक्षित, समझदार बच्चे तैयार कर दे, आप इस चीज़ की कलपना करें, फिर उसे हज़ार गुना बढ़ा दें, तो पैग़म्बरे इस्लाम की बेसत और मक्के की हालत बन जाती है, यानी इस्लाम की ताक़त, अल्लाह के धर्म की ताक़त, अल्लाह के हुक्म और शिक्षाओं की ताक़त इतनी है कि वह इस तरह के इंसानों में से, ऐसी बेमिसाल हस्तियों को वुजूद में ला सकता है। अबूज़र आम इंसान नहीं हैं। यही अबूज़र जाहेलियत के ज़माने में उस तरह के थे, अम्मार एक दूसरी तरह के थे, कोई दूसरा, एक और तरह का था।
यह बात हमारे आज और इस वक़्त के लिए अहम है। मैं यह दावा करना चाहता हूं, यह कहना चाहता हूं कि आज भी इस्लाम में यही ताक़त मौजूद है। आज भी मानव समाज उन्हीं बुराइयों का शिकार है, बस एक दूसरी तरह से और दूसरे अंदाज़ से, वही ज़ुल्म जो उस वक़्त था, आज भी है, वही घमंड आज भी है, वही भ्रष्टाचार, आज भी है।
आप पिछले कुछ महीनों से दुनिया की ख़बरों में सुनते ही हैं: बेलगाम यौन संबंध का द्वीप बनाना (4) कोई मामूली बात है? नैतिक भ्रष्टाचार, व्यावहारिक बुराइयां, ज़ुल्म, मुंहज़ोरी, ताक़त का इस्तेमाल, दख़लअंदाज़ी, जो मिले उसे मार देना, जहाँ पर उन का बस चल जाए, जहाँ मुमकिन हो पंजे मारना, इंसान वही इंसान है बस उसका अंदाज़ बदल गया है, उसका ज़ाहिरी रूप बदल गया है। आज वह ख़ुशबू, टाई, कोट, पतलून और ख़ूबसूरत लेबास के साथ मैदान में आता है, वही लोग हैं, उनमें कोई फ़र्क़ नहीं आया। आज इंसानियत, अलबत्ता यह जो मैं कह रहा हूं, वह पूरी इंसानियत के बारे में नहीं है, बहुत से समाज, ख़ास तौर पर पश्चिमी समाज इसका शिकार है, हक़ छीना जाता है, कमज़ोरों को दबाया जाता है।
वह अबू जहल आज भी है, वही इब्ने मुग़ैरा मख़ज़ूमी आज भी है। "उसने सोचा और एक बात तजवीज़ की।" यह इबने मुग़ैरा के बारे में है; "उसने सोचा और एक बात तजवीज़ की।" "वह ग़ारत हो, उसने कैसी बात तजवीज़ की?" (आयत में इस्तेमाल हुआ शब्द) 'क़ुतेला' यानी उस पर लानत हो या वह ग़ारत हो। "वह ग़ारत हो उसने कैसी बात तजवीज़ की?" "फिर वह ग़ारत हो उसने कैसी बात तजवीज़ की?" "फिर उसने देखा।" "फिर उस ने त्योरी चढ़ाई और मुंह बनाया।" (5) अंत तक। (सूरए मुद्दस्सिर, आयत-18-22)
आज भी वही लोग हैं; वही लोग हैं जो करोड़ों लोगों पर हुकूमत कर रहे हैं, अपने अधीन लोगों को अपने साथ नरक में ले जा रहे हैं। क़ुरआन फ़िरऔन के बारे में फ़रमाता हैः "क़यामत के दिन वह अपनी क़ौम के आगे आगे होगा और इस तरह उन्हें नरक की आग में पहुंचा देगा..." (सूरए हूद, आयत-98) (6) फ़िरऔन क़यामत के दिन, जैसा इस दुनिया में अपनी क़ौम का सरग़ना था, वहाँ भी सरग़ना है, अगुवा है, उसे नरक की ओर ले जाया जाएगा और उसके पीछे चलने वालों को (भी) नरक में ढकेल दिया जाएगा। ये लोग ख़ुद नरक की ओर जा रहे हैं, ये लोग ख़ुद, सही मानी में, परालौकिक अर्थ में नरक में हैं और अपनी क़ौम को भी नरक की तरफ़ ले जा रहे हैं। तो यह आज की दुनिया है।
इस्लाम वही इस्लाम है, यह इस्लाम, आज की दुनिया को पूरी तरह बदल सकता है, निश्चित तौर पर बदल सकता है। हम कर सकते हैं, हम का मतलब सिर्फ़ मैं और आप नहीं, ये इस्लाम के सपोर्टर, इस्लाम पर अमल करने वाले, इस्लाम पर ईमान रखने वाले, दुनिया को निरंकुशता और बुराई की ढलान से भलाई, नजात और सम्मान की चोटियों की तरफ़ ला सकते हैं, नरक की तरफ़ से स्वर्ग की ओर ला सकते हैं, यह आज भी मुमकिन है। आज भी मुमकिन है लेकिन एक शर्त हैः "ऐ मुसलमानो! कमज़ोरी न दिखाओ और ग़मगीन न हो, तुम ही ग़ालिब व बरतर रहोगे...", "तुम ही ग़ालिब व बरतर रहोगे।" यही हैः आप दुनिया को अपने पीछे चला सकते हैं, लेकिन कब? "अगर तुम मोमिन हो।" (सूरए आले इमरान, आयत-139) (7) ईमान ज़रूरी है। तो मैं और आप बेहम्दिल्लाह कुछ ईमान रखते हैं, अल्लाह का शुक्र, लेकिन यह ईमान, अबूज़र का ईमान नहीं है, हमें अपने कर्म को सही करना होगा, अपने काम को सही करना होगा, अपने दिल को ठीक करना होगा। अगर हम यह काम कर सकें, क़ुरआन की नसीहत, इस्लाम की नसीहत, पैग़म्बरे इस्लाम की नसीहत पर अमल कर सकें, नहजुल बलाग़ा को अहमियत दे सकें और उस पर अमल कर सकें, तो हमारे पास भी वही चीज़ होगी जो उस दिन पैग़म्बरे इस्लाम के पास थी, वही काम कर सकेंगे जो पैग़म्बरे इस्लाम ने उस दिन किया था, हम दुनिया को भलाई और अच्छाई की ओर मोड़ सकते हैं, उन बुरे लोगों के चंगुल में फंसे हुए समाजों को, इंसान का निर्माण करने वाले समाजों में बदल सकते हैं, अगर इंशाअल्लाह "अगर तुम मोमिन हो" व्यावहारिक हो जाए। हमें होशियार रहना चाहिए, जो कुछ हम जानते हैं उस पर अमल करें, पाप से बचें। आज हमारा ईमान, अबूज़र बनाने वाला ईमान नहीं है। अलबत्ता अल्लाह की कृपा से इस्लामी गणराज्य में व्यक्तिगत तौर पर, अबूज़र जैसे लोग रहे हैं; जैसे यही महान, मशहूर और कुछ गुमनाम शहीद, ये हैं लेकिन समाज को बदलना होगा, नेकी और भलाई को पूरे समाज पर छा जाना चाहिए।
तो बेसत का दिन ऐसा दिन है, ऐसा ईमान पेश किया गया और जिन्होंने उसे क़ुबूल किया, उन में से एक अमीरुल मोमेनीन थे, अली बिन अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) ने यह ईमान क़ुबूल किया, जनाब ख़दीजा ने यह ईमान क़ुबूल किया, पहले दर्जे में उनके अलावा कोई दूसरा नहीं था। तो यह कुछ बातें बेसत के बारे में थीं जो मैंने पेश कीं।
मैं इस हालिया फ़ितने के बारे में कुछ बातें पेश करना चाहता हूं। एक फ़ितना सामने आया, उस ने अवाम को पीड़ा दी, तकलीफ़ दी, मुल्क को नुक़सान पहुंचाया, फ़ितना ऐसा ही होता है, फिर अल्लाह की कृपा से अवाम के ज़रिए और समय की नब्ज़ पहचानने वाले और अपना काम अच्छी तरह जानने वाले अधिकारियों और सुरक्षा बलों के ज़रिए, बेहम्दिल्लाह यह फ़ितना कुचल दिया गया। फ़ितने को पहचानिए। मैं यहाँ कुछ बातें पेश करना चाहता हूं: सब से पहले यह कि हम फ़ितने के स्वभाव को समझें, आख़िर यह फ़ितना क्या था? क्यों वजूद में आया था? दूसरे यह कि इस फ़ितने को अंजाम देने वाले तत्व क्या थे, कौन लोग थे, ज़ाहिर में देखें तो एक नौजवान है, लेकिन अस्ल मामला क्या है? और एक बात उस बारे में (है) कि उस काम के मुक़ाबले में जो हमारे दुश्मन ने हमारे साथ किया, हम क्या स्टैंड लेते हैं और क्या क़दम उठाते हैं। इन बातों को संक्षेप में पेश करुंगा।
सब से पहले फ़ितने के स्वभाव की बात, यह एक अमरीकी फ़ितना था। बहुत साफ़ ज़ाहिर था। अमरीकियों ने साज़िश तैयार की, काम किया, अमरीकियों का लक्ष्य, यह बात मैं पूरे यक़ीन से, खुल कर और इस्लामी गणराज्य में अपने चालीस साल से ज़्यादा के तजुर्बे की बुनियाद पर कह रहा हूं, अमरीका का लक्ष्य ईरान को निगलना है।
इंक़ेलाब के आग़ाज़ से अब तक, उस वर्चस्व को जो इस मुल्क पर उनका था, जो अवाम के हाथों, जवान नस्ल के हाथों, अवाम के एक एक सदस्य के हाथों महान इमाम के नेतृत्व में ख़त्म हुआ, पहले दिन से वे इसे पलटाने की सोच में हैं। यानी ईरान को उनके सैन्य कंट्रोल में, उनके राजनैतिक वर्चस्व के तहत, उनके आर्थिक वर्चस्व में क़रार दें। इस का संबंध सिर्फ़ मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति (8) से नहीं है! इस का संबंध उस शख़्स से नहीं है जो इस वक़्त राष्ट्रपति है। इस का संबंध अमरीका की नीति से है। अमरीका की नीति यह है। एक ऐसे मुल्क को जिस की ये विशेषताएं हैं, एक ऐसे संवेदनशील भौगोलिक केन्द्र में, इन सुविधाओं के साथ, इतनी बड़ी सरज़मीन के साथ, इतनी आबादी के साथ, ऐसे मुल्क को वे लोग बर्दाश्त नहीं कर सकते; ऐसी तरक़्क़ी के साथ, वैज्ञानिक लेहाज़ से, मुख़्तलिफ़ विभाग में टेक्नॉलोजी के लेहाज़ से इतनी तरक़्क़ी कर रहा है, इसे अमरीकी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।
हम अमरीकी राष्ट्रपति को मुजरिम मानते हैं, मौतों की वजह, नुक़सान की वजह से और ईरानी क़ौम पर इल्ज़ाम लगाने की वजह से। वही "उस ने सोचा और एक बात तजवीज़ की।" "वह ग़ारत हो उस ने कैसी बात तजवीज़ की?" उस ने बैठकर सोचा कि क्या करे। वे लोग यह बात बर्दाश्त नहीं कर सकते। तो यह उन के बारे में बात हुयी।
अलबत्ता अतीत में इस तरह के फ़ितने में जैसा कि अनेक फ़ितने मुल्क में हुए मुख्य रूप से अमरीकी प्रिंट मीडिया से जुड़े लोग और अमरीका या योरीपीय देशों के दूसरे दर्जे के नेता दख़लअंदाज़ी करते थे इस फ़ितने की ख़ुसूसियत ये थी ख़ुद अमरीकी राष्ट्रपति ख़ुद वह इस फ़ितने का हिस्सा था, उसने बयान दिया, विचार व्यक्त किए, धमकी दी दंगाइयों को उकसाया। अमरीका से उन लोगों को, बाद में बताउंगा कि वे कौन लोग थे, संदेश दिया आगे बढ़ो, आगे बढ़ो डरो नहीं। कहा मैं तुम्हारी मदद करुंगा फ़ौजी मदद करुंगा। यानी ख़ुद अमरीकी राष्ट्रपति इस फ़ितने में शामिल हो गया फ़ितने का भाग है।
कुछ लोग, जिन्होंने विध्वंसक करतूत की, आग लगायी, अवैध करतूतें कीं, इंसानों का क़त्ल किया, इन लोगों को ईरानी क़ौम कहा, यानी ईरानी क़ौम पर बहुत बड़ा इल्ज़ाम लगाया। उसने कहा कि यह ईरानी क़ौम है और मैं ईरानी क़ौम की रक्षा करना चाहता हूं। यह जुर्म है, यह अपराध है। जो दलीलें मैं ने अर्ज़ कीं, वे ठोस हैं, यानी इस में गुप्त कोई बात ही नहीं है, उस ने खुल्लम खुल्ला कहा, साफ़ साफ़ कहा, खुल्लम खुल्ला उकसाया। एक के बाद एक ऐसे सुबूत हैं कि उन्होंने भी मदद की, ज़ायोनियों ने भी मदद की मदद की जिस के बारे में संक्षेप में बताउंगा। हम अमरीकी राष्ट्रपति को मुजरिम मानते हैं जानी नुक़सान के लिए, माली नुक़सान के लिए, ईरानी राष्ट्र पर इल्ज़ाम लगाने के लिए।
दूसरी बात फ़ितने में शामिल लोगों के बारे में है और जो लोग मैदान में आए थे कि वे कौन थे? ये दो तरह के लोग थेः एक वह जिन्हें अमरीका और इस्राईल के ख़ुफ़िया संगठनों ने बहुत सोच समझ कर चुना था, इन्हें तलाश किया था, उन में से ज़्यादातर को विदेश ले गए थे, कुछ को यहीं मुल्क के अंदर ट्रेनिंग दी थी कि किस तरह आगे बढ़ना है, किस तरह आग लगानी है, किस तर डर पैद करना है, किस तरह पुलिस से बचना है। उन्हें काफ़ी ज़्यादा पैसे भी दिए गए थे। एक तरह के लोग तो ये थे जो उस भीड़ के सरग़ना थे, वे अपने आप को 'लीडर' कहते हैं, हम उन लोगों के लीडर हैं, सरग़ना, एक तो ये लोग थे। बेहम्दिल्लाह उनकी बड़ी तादाद पकड़ी जा चुकी है, गिरफ़्तार हो गए हैं, पुलिस और सुरक्षा बलों ने इस सिलसिले में अच्छा काम किया है। इन दुष्ट और अपराधी तत्वों की, ये लोग अपराधी हैं, बड़ी तादाद गिरफ़्तार हो गयी।
दूसरी तरह के लोग वे हैं जिन का ज़ायोनी सरकार के किसी ख़ुफ़िया संगठन से कोई संबंध नहीं था, एक अपरिपक्व नौजवान है, उससे बात करते हैं, उसे प्रभावित करते हैं, उस के लिए उत्तेजना पैदा कर देते हैं, जवान तो उत्तेजित होते ही हैं, नौजवान में उत्तेजना पायी जाती है, वे आकर मैदान में दाख़िल हो जाते हैं, ऐसे काम करते हैं जो उन्हें नहीं करने चाहिए, ऐसे ग़लत काम करते हैं जो उन्हें नहीं करने चाहिए। ये पियादे हैं, उनका काम यह है कि जा कर किसी जगह पर हमला करें, एक पुलिस चौकी, एक घर, एक ऑफ़िस, एक बैंक, एक औद्योगिक केन्द्र, बिजली घर, ऐसी जगहों पर हमले करें, उन्हें ये काम दिया गया है। वह सरग़ना इन्हें इकट्ठा करता है, उन में से हर एक, दस, बीस, पचास लोगों को इकट्ठा करता है, उन्हें हुक्म देता है कि "उस जगह जाओ, यह काम करो और जुर्म करो।" और अफ़सोस कि वे करते हैं। बहुत ज़्यादा जुर्म किए गए। इस फ़ितने में इन्हीं नादान और अनभिज्ञ लोगों ने उन दुष्ट और ट्रेंड एजेंटों की अगुवाई में बुरे काम किए, बड़े अपराध किए। 250 मस्जिदों को तबाह किया, 250 से ज़्यादा शैक्षणिक और वैज्ञानिक सेंटरों को नुक़सान पहुंचाया, तबाह कर दिया, बिजली उद्योग को नुक़सान पहुंचाया, बैंकों को नुक़सान पहुंचाया, इलाक के केन्द्र को नुक़सान पहुंचाया, अवाम की बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों और राशन की दुकानों को नुक़सान पहुंचाया, अवाम को नुक़सान पहुंचाया। उन्होंने कई हज़ार लोगों को क़त्ल किया, कुछ को बहुत ही अमानवीय तरीक़े से, बिल्कुल बर्बर तरीक़े से, क़त्ल किया। एक मस्जिद पर हमला करते हैं, कुछ नौजवान उस मस्जिद की रक्षा के लिए अंदर जाते हैं, वे मस्जिद का दरवाज़ा बंद कर देते हैं, मस्जिद को आग लगा देते हैं, मस्जिद और वे कुछ नौजवान आग में जल जाते हैं! मैं अर्ज़ करुंगा कि ये ख़ुद साज़िश है, काम की तफ़सील पहले से तैयार की गयी आम साज़िश का हिस्सा हैं, जिस में पहले से तय है कि इस तरह काम करना और इस तरह आगे बढ़ना है। गली, बाज़ार के आम लोगों, बेगुनाह लोगों को, तीन साल की बच्ची (9) को, मर्द को निहत्थी और बेक़ुसूर औरत को क़त्ल किया। उन के पास हथियार थे, न सिर्फ़ फ़ायर आर्म्स, बल्कि (तलवार, कुल्हाड़ी और चाक़ू) जैसे आम हथियार भी थे, उन्हें दिए गए थे। ये हथियार बाहर से आए थे, इसीलिए आए थे कि दंगाइयों में बांटे जाएं और ये जुर्म किए जाएं। तो ये हुए फ़ितने के तत्व, फ़ितने के तत्व ये हैं।
इस बात में शक नहीं कि ईरानी क़ौम ने फ़ितने की कमर तोड़ दी। ईरानी क़ौम ने 12 जवनरी को दसियों लाख की तादाद में बाहर आकर, जो 11 फ़रवरी की तरह ऐतिहासिक दिन बन गया। यानी 12 जनवरी को ईरानी क़ौम ने (ऐतिहासिक दिन) बना दिया। अपने कारनामों में एक और कारनामे का इज़ाफ़ा किया। ईरानी क़ौम ने तेहरान में दसियों लाख की तादाद में, दूसरे शहरों में बड़ी तादाद में निकलकर, बड़बोले दावेदारों के मुंह पर ज़ोरदार मुक्का मारा। बेहम्दिल्लाह यह काम किया, फ़ितने को दबा दिया। ईरानी क़ौम का कारनामा था।
अलबत्ता दुनिया में ज़ायोनी मीडिया में, जिन में ज़्यादातर न्यूज़ एजेंसियां ज़ायोनियों की हैं, इन मामूली गिनती वाले बलवाइयों को बड़ा करके दिखाया गया और कहा गया कि यही ईरानी अवाम हैं, (लेकिन) तेहरान और दूसरे शहरों में बड़ी तादाद में निकलने वाले अवाम का तो कुछ ने नाम ही नहीं लिया, कुछ ने कहा कुछ हज़ार लोग! उनकी आदत यही है, उन्हें (ऐसा ही) करना पड़ता है , कोई बात नहीं। हक़ीक़त कुछ और है, हक़ीक़त वही है जो आप अपनी आँखों से देख रहे हैं, अपने शहर में या तेहरान में देख रहे हैं।
जहाँ तक हमारे रवैये की बात है तो ईरानी क़ौम ने अमरीका को शिकस्त दी। अमरीकियों ने बड़ी तैयारी से, इस फ़ितने को भड़काया, बड़े लक्ष्य के लिए कि जिसकी ओर मैंने पहले इशारा किया। यह फ़ितना बड़े लक्ष्य की पृष्ठिभूमि था, ईरानी क़ौम ने नाकाम बना दिया। कुछ महीने पहले कुछ दिन की जंग में उसने अमरीका और ज़ायोनियों को शिकस्त दी। इस बार भी ईरानी क़ौम ने अल्लाह की कृपा से अमरीका को शिकस्त दी। यह सही है लेकिन यह काफ़ी नहीं है। जी हाँ हम ने फ़ितने को ख़ामोश कर दिया, लेकिन यह काफ़ी नहीं हैं। अमरीका को जवाबदेह होना चाहिए। विदेश मंत्रालय से लेकर दूसरे तंत्रों सहित मुख़्तलिफ़ तंत्रों को इस काम से संबंधित तंत्रों को, इस मसले के पीछे लगना चाहिए। हम मुल्क को जंग की ओर नहीं ले जाएंगे, हम मुल्क को जंग की ओर ले जाने का इरादा नहीं रखते, लेकिन देश के भीतर के मुजरिमों को छोड़ेंगे नहीं।भीतरी मुजरिमों से कहीं ज़्यादा बुरे अंतर्राष्ट्रीय मुजरिम हैं।उन्हें भी नहीं छोड़ेंगे।इस काम में इससे मख़सूस तरीक़े से, सही शैली में पीछे लगा जाए, पैरवी की जाए, अल्लाह की तौफ़ीक़ से ईरानी क़ौम ने जिस तरह फ़ितने की कमर तोड़ दी, उसी तरह फ़ितना करने वालों की कमर भी तोड़े।
मेरी आख़िरी बात। इस वाक़ए में, इस अमरीकी और ज़ायोनी फ़ितने के मुक़ाबले में पुलिस, सुरक्षा बल, आईआरजीसी और बसीज (स्वयंसेवी बल) के ज़िम्मेदारों ने बड़ी जान लगा दी, हक़ीक़त में बड़ी जान लगायी, रात को रात और दिन को दिन नहीं समझा, उन से जहाँ तक मुमकिन था इस फ़ितने को, जो दुश्मन की तरफ़ से बहुत पैसों और तैयारियों के साथ पैदा किया गया था, पूरी तरह दबा दिया और ख़त्म कर दिया। मुल्क के अधिकारियों ने भी पूरा साथ दिया। ईरानी क़ौम ने आख़िरी काम किया और निर्णायक तौर पर फ़ितने को ख़त्म कर दिया लेकिन एकात के साथ। मैं अपनी हमेशा की सिफ़ारिश फिर से दोहराना चाहता हूं: पहली बात तो यह कि अवाम के बीच एकता बनी रहनी चाहिए, दलीय, राजनैतिक, वैचारिक और दूसरे विवाद अवाम में फैलने न पाएं। आपस में एकजुट रहिए, इस्लामी सिस्टम की रक्षा में, ईरान की रक्षा में, अज़ीज़ ईरान की रक्षा में, सब एक साथ रहिए, एक दूसरे के साथ रहिए।
अधिकारियों ने भी, मुख़्तलिफ़ विभागों के अधिकारियों ने वाक़ई काम किया। सम्मानीय राष्ट्रपति (10) और न्यायपालिका और विधिपालिका के अध्यक्षों ने काम किया, वे मैदान के बीच में थे और उन्होंने काम किया। ऐसा न हो कि चूंकि मुझे दूसरे के काम की ख़बर नहीं है तो मैं बस निरंतर एतेराज़ करता रहूं कि जनाब ऐसा क्यों और वैसा क्यों है, नहीं, सब ने काम किया। मैं इस बात से कि ऐसे अहम अंतर्राष्ट्रीय और आंतरिक हालात में मुल्क के अध्यक्षों, सम्मानीय राष्ट्रपति और दूसरों का अपमान किया जाए, सख़्त परहेज़ करता हूं और ऐसा नहीं होने देता और मना करता हूं। लोगों को रोकता हूं, वे संसद में हो सकते है, संसद के बाहर हो सकते हैं, कहीं भी हो सकते हैं। हम इनकी क़द्र करें, उन अधिकारियों की क़द्र करें जो जब मुल्क पर ऐसा वक़्त पड़ता है तो अवाम से दूर नहीं रहते। कभी हमारे अतीत में ऐसा हुआ है कि अवाम मैदान में थे, अधिकारी तमाशा देख रहे थे, कभी अवाम के ख़िलाफ़ कोई बात भी कर देते थे। लेकिन इस बार नहीं, अधिकारी अवाम के साथ थे, अवाम के बीच में थे, अवाम के साथ चले, उसी मक़सद के लिए कोशिश की, काम किया। इस की क़द्र होनी चाहिए, यह बहुत अहम है।
राष्ट्रपति के संबंध में मेरी सिफ़ारिश है,दूसरी पालिकाओं के प्रमुखों और मुल्क के दूसरे प्रमुखों के संबंध में मेरी सिफ़ारिश है, इन्हें काम करने दीजिए, इन्हें कोशिश करने दीजिए। उन पर जो बड़ी ज़िम्मेदारी है, उसे अंजाम दें। इस बात में शक नहीं कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है अवाम की आर्थिक स्थिति वाक़ई अच्छी नहीं, मैं इस बात को समझता हूं। उन्हें भी इस संबंध में दुगुना काम करना चाहिए। बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों, पशुपालन से जुड़े संगठनों की ज़रूरत की चीज़ों ज़रूरी खाद्य पदार्थ, आम लोगों की ज़रूरत की चीज़ों के लिए अधिकारियों को चाहिए हमेशा ज़्यादा से ज़्यादा काम करें, ज़्यादा गंभीरता से काम करें।
इस में कोई शक नहीं है। उनके कुछ फ़रीज़े हैं, हम अवाम के भी कुछ फ़रीज़े हैं, हम सब को अपनी ज़िम्मेदारियों पर अमल करना चाहिए। अगर हम ने अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा किया, तो अल्लाह हमारे काम में बरकत देगा। परवरदिगार! हमारे काम में बरकत अता फ़रमा।
आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत और बरकत हो।
1-नहजुल बलाग़ा
2- सब से पक्षपाती
3-नहजुल बलाग़ा
4- अमरीका के वर्जिन द्वीप समूह का एक निजी द्वीप जो नौजवान औरतों और नाबालिग़ लड़कियों की तस्करी और उनके यौन शोषण की जगह के तौर पर इस्तेमाल होता था। इस के मालिक के बहुत से मेहमान दुनिया भर से और समाज से एलीट वर्ग से होते थे।
5-सूरए मुद्दस्सिर
6-सूरए हूद
7-सूरए आले इमरान
8-डोनल्ड ट्रम्प
9 किरमानशाह की तीन साल की बच्ची मलीना असदी जो सशस्त्र आतंकियों के हाथों शहीद हुयी।
10- डॉक्टर मसऊद पेज़ेश्कियान