हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के शुभ जन्म दिवस के मौक़े पर अहलेबैत अलैहेमुस्सलाम के मद्दाहों और शायरों से मुलाक़ात में इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाह ख़ामेनी ने हज़रत ज़हरा की महानता को इंसान की समझ से परे बताया।
गुरूवार 11 दिसम्बर 2025 की सुबह इमाम ख़ुमैनी इमामबाड़े में होने वाली इस मुलाक़ात में इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने कहा कि हमें फ़ातेमी होना चाहिए और धर्म पर अमल, इंसाफ़ पसंदी, हक़ बात को बयान करने के जेहाद, दांपत्य जीवन और बच्चों की परवरिश के सभी मैदानों में हज़रत ज़हरा की पैरवी करनी चाहिए।
उन्होंने राष्ट्रीय रेज़िस्टेंस का मतलब, वर्चस्ववादियों के मुक़ाबले में दृढ़ता और ताक़त के साथ डटा रहना बताया और कहा कि कभी दबाव सैन्य स्वभाव का होता है और कभी आर्थिक, प्रचारिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक स्वभाव का होता है।
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने पश्चिमी मीडिया के एजेंटों और राजनैतिक व सैन्य अधिकारियों की ओर से किए जाने वाले हंगामे को दुश्मन के प्रचारिक दबाव का चिन्ह बताया और कहा कि क़ौमों और उनमें सबसे ऊपर ईरानी क़ौम पर वर्चस्ववादी सिस्टम की ओर से दबाव का लक्ष्य कभी भौगोलिक विस्तारवाद होता है जैसे आज कल अमरीकी सरकार, लैटिन अमरीका में जो कर रही है और कभी लक्ष्य भूमिगत स्रोतों पर क़ब्ज़ा करना होता है और कभी जीवन शैली को बदलना लक्ष्य होता है और इससे बढ़कर पहचान को बदलना, वर्चस्ववादियों के दबाव का मुख्य लक्ष्य होता है।
आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई ने ईरानी क़ौम की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतकि पहचान को बदलने की दुनिया की मुंहज़ोर ताक़तों की 100 साल से ज़्यादा की कोशिशों की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस्लामी इंक़ेलाब ने इन सभी कोशिशों को नाकाम बना दिया और हालिया दशकों में ईरानी क़ौम ने भी अपनी दृढ़ता से उन्हें धूल चटा दी है।
उन्होंने ईरान से क्षेत्रीय मुल्कों और कुछ दूसरे मुल्कों तक रेज़िस्टेंस के विचार के फैल जाने को एक हक़ीक़त बताया और कहा कि दुश्मन ने ईरान और ईरानी क़ौम के ख़िलाफ़ कुछ ऐसे काम किए कि अगर वह किसी दूसरे मुल्क और क़ौम के ख़िलाफ़ करता तो उनका नाम व निशान तक मिट जाता।
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने शहीदों की याद को अमर बनाने और मुल्क में रेज़िस्टेंस के विचार को बढ़ावा देने में मद्दाही के ज़ैनबी प्रभाव की ओर इशारा करते हुए कहा कि आज हम सैन्य झड़प से बढ़कर, जिसे आपने देखा, एक प्रचारिक और मीडिया वॉर के केन्द्र में हैं क्योंकि दुश्मन समझ गया है कि इस पाकीज़ा और अध्यात्मिक मुल्क और सरज़मीन को सैन्य दबाव से न तो झुकाया जा सकता है और न ही क़ब्ज़ा किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अलबत्ता कुछ लोग सैन्य टकराव दोहराए जाने की संभावना की बात करते हैं और कुछ जान बूझकर इस विषय को हवा देते हैं ताकि लोग शक और भ्रम में पड़े रहें फिर भी वे सफल नहीं होंगे।
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने दुश्मन की दिशा, उसकी ओर से ख़तरे और उसके लक्ष्य, इंक़ेलाब के लक्ष्य, विचार और प्रभाव को मिटाना और इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह की याद को मिटाना बताया और कहा कि अमरीका, इस विशाल व सरगर्म मोर्चे के केन्द्र में है और कुछ योरोपीय मुल्क उसका साथ दे रहे हैं जबकि कुछ पिट्ठू और वतन फ़रोश लोग, योरोप में दो पैसे हासिल करने के लिए इस मोर्चे के पियादे बने हुए हैं।
उन्होंने दुश्मन के लक्ष्य और उसकी मोर्चाबंदी की पहचान को ज़रूरी बताते हुए कहा कि सैन्य मोर्चे की तरह इस प्रचारिक टकराव में भी हमें दुश्मन की साज़िशों और लक्ष्य के मद्देनज़र मुनासिब मोर्चाबंदी करनी चाहिए और ऐसी बातों पर भरपूर ध्यान देना चाहिए जिन्हें दुश्मन ने टार्गेट कर रखा है, यानी इस्लामी, शीई और इंक़ेलाबी शिक्षाएं।
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता ने पश्चिम की प्रचारिक जंग और मीडिया वॉर के मुक़ाबले में दृढ़ता को सख़्त लेकिन पूरी तरह मुमकिन बताया और कहा कि इस राह में अहलेबैत की प्रशंसा करने वाले और उनकी शान में शेर कहने वाले शायर, अंजुमनों को इंक़ेलाब के मूल्यों की रक्षा के केन्द्र में बदल दें। अहलेबैत की शान में शेर पढ़ने की सभाएं और अंजुमन आज रेजिस्टेंस के साहित्य के संकलन, उसे फैलाने और नस्लों तक पहुंचाने के ज़रिए इस बहुत ही मौलिक ज़रूरत में मदद कर रहे हैं।
आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अपनी स्पीच के आख़िरी हिस्से में अहलेबैत के मद्दाहों और शायरों को कुछ नसीहतें की जिन में इमामों की ज़िंदगी को मद्देजऩर रखते हुए धार्मिक शिक्षाओं और रेज़िस्टेंस के साहित्य की व्याख्या, दुश्मन के कमज़ोर बिंदु पर हमला और साथ ही उसकी ओर से संदेह पैदा किए जाने की प्रभावी रोकथाम, सामाजिक और राजनैतिक मैदानों में क़ुरआन के विचारों की व्याख्या और दुश्मन से टकराने के तरीक़े जैसे बिन्दु उल्लेखनीय हैं।