हज़रत अली फ़रमाते हैं कि अगर मुसलमान मर्द इस ग़ैरत से, इस दुख से मर जाए, कि शाम के दुष्ट और बदमाश, घरों में घुस रहे हैं और मुसलमान और ग़ैर मुसलमान महिलाओं का उत्पीड़न करें वह दुख से मर जाए तो उसकी मलामत नहीं की जा सकती, बल्कि मेरे निकट मर जाना बेहतर है।