लेबनान के हिज़्बुल्लाह संगठन के सेक्रेटरी जनरल शैख़ नईम क़ासिम, जाने-माने बहरैनी धर्मगुरू आयतुल्लाह शैख़ ईसा क़ासिम, इराक़ी संगठन कताएब हिज़्बुल्लाह वग़ैरह ने किसी भी ख़तरे के ख़िलाफ़ इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान और इस्लामी क्रांति के सुप्रीम लीडर के प्रति अपने सपोर्ट का एलान मज़बूत और ठोस शब्दों में किया है। सपोर्ट की यह लहर ईरान और उसके आस-पास के माहौल के बीच एक गहरे स्ट्रैटिजिक रिश्ते के मज़बूत होने का इशारा करती है।

इस सिस्टम में, ईरान कोई फ़ाइनेंशियल या पॉलिटिकल सपोर्टर नहीं है, बल्कि एक इनफॉर्मल सिक्योरिटी ऑर्डर का केन्द्रिय स्तंभ बन गया है और उसके ख़िलाफ़ कोई भी ख़तरा अपने आप इस पूरे स्ट्रक्चर के ख़िलाफ़ ख़तरा माना जाता है। एक ऐसा सिस्टम जो पिछले कुछ दशकों में अमरीका की सैन्य दख़लअंदाज़ी और ज़ायोनी शासन की अस्थिर करने वाली नीतियों के जवाब में बना है और अब मैच्योरिटी और ख़ुद की पहचान के स्तर पर पहुँच गया है। ऐसे फ़्रेमवर्क में, ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी ख़तरे को साफ़ तौर पर इस पूरे सिस्टम के लिए ख़तरा माना जाता है, जिससे जवाब का दायरा और किसी भी दुश्मनी भरी करतूत की क़ीमत बहुत बढ़ जाती है।

 ईरान के लिए घोषित सपोर्ट की “कलेक्टिव डिटरेंस” के विचार के हिस्सों के बतौर समीक्षा की जानी चाहिए। एक ऐसा डिटरेंस जो, क्लासिकल मॉडल के विपरीत, एक बिन्दु पर ताक़त के केन्द्रीयता पर निर्भर नहीं करता, बल्कि एक्टर्स, जियोग्राफ़ी और बहुवादी क्षमताओं के नेटवर्क पर निर्भर करता है। इस नेटवर्क ने दूर तक फैली हुई स्ट्रैटिजिक गहराई बनाई है जो अमरीका के सैन्य और राजनैतिक कैलकुलेशन को पहले की तुलना में बहुत ज़्यादा जटिल बनाती है; क्योंकि ईरान के ख़िलाफ़ कोई भी क़दम अब एक मोर्चे या ऐसे जवाब तक सीमित नहीं होगा जिसका अनुमान लगाया जा सके।

 इस हार्ड डायमेंशन के अलावा, इस इलाक़े में धार्मिक और सामाजिक हस्तियों का रुख़ इस डिटरेंस की सॉफ़्ट और आइडेंटिटी लेयर को हाईलाइट करता है। जब ईरान के ख़िलाफ़ ख़तरा किसी धार्मिक अथॉरिटी और राजनैतिक स्वाधीनता के सिंबल के ख़िताफ़ ख़तरे के रूप सामने आता है, तो यह मुद्दा सरकारों के बीच विवाद के स्तर से आगे बढ़कर पहचान की चुनौती बन जाता है। ऐसी स्थिति में, किसी भी सैन्य क़दम की राजनैतिक, सामाजिक और यहां तक कि नैतिक क़ीमत भी तेज़ी से बढ़ जाती है, क्योंकि रिएक्शन सिर्फ़ सरकारों या सशस्त्र ग्रुप्स की ओर से ही नहीं आएंगे, बल्कि बड़े सामाजिक ढांचे भी शामिल होंगे।

 ख़ास बात यह है कि यह रिश्ता वॉशिंगटन में प्रचलित आम सोच के उलट, “ऑर्डर” या “थोपने” का नतीजा नहीं है, बल्कि यह एकजुटता और एक आम ऐतिहासिक अनुभव का नतीजा है; एक ऐसा अनुभव जो जंगों, पाबंदियों, आर्थिक दबावों और सरकार को गिराने की साज़िश से आगे बढ़ चुका है और इस निष्कर्ष तक पहुंचा है कि ईरान को कमज़ोर करने का मतलब पूरे इलाक़े में बड़े पैमाने पर अस्थिरता के दरवाज़े को खोलना है। इसलिए, ईरान के लिए सपोर्ट के प्रतीकात्मक इशारे भी मज़बूत स्ट्रैटिजिक मैसेज देते हैं।

 कुल मिलाकर, ट्रंप की धमकियों पर क्षेत्रीय स्तर पर रिएक्शन यह बताते हैं कि ईरान को अब न सिर्फ़ एक नेशनल एक्टर के तौर पर देखा जा रहा है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन की धुरी के तौर पर भी देखा जा रहा है, एक ऐसा संतुलन जो ख़तरा ज़्यादा ज़ाहिर होने पर और ज़्यादा अपनी मज़बूती को ज़ाहिर करता है। यह हक़ीक़त सबसे अहम बदलाव है जो ईरान के साथ किसी भी टकराव या मामले के भविष्य को तय करेगा।