पृष्ठिभूमि
ईरान की संप्रभुता पर संयुक्त राज्य अमरीका और ज़ायोनी शासन की हालिया हिंसक आक्रामकता, इस्लामी गणराज्य ईरान के ख़िलाफ़ चल रही हाइब्रिड जंग को और तीव्र करने की एक नई पहल है। इस ऑपरेशन का एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में विश्लेषण किया जाना चाहिए, जो सैन्य आक्रमण और टार्गेट किलिंग, दमनकारी आर्थिक प्रतिबंधों, निरंतर मनोवैज्ञानिक ऑप्रेशन, व्यापक झूठी खबरों के प्रसार और फिर से सैन्य कार्रवाई की लगातार धमकियों और पिछली कार्रवाइयों पर आधारित है। ये साम्राज्यवादी रणनीतियाँ मिलकर ईरान के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अस्थिरता और तनाव का माहौल बनाती हैं; एक ऐसा माहौल जो लोगों के दैनिक जीवन और रोज़गार, साथ ही राष्ट्रीय एकता को गहराई से प्रभावित करता है।
सबसे ताज़ा चरण में, संयुक्त राज्य अमरीका ने ईरान के आंतरिक विरोध प्रदर्शनों को अपने नियंत्रण में करके और उनमें विकृति लाकर, जिनमें से कई की जड़ें प्रतिबंधों और नव-उदारवादी नीतियों से उत्पन्न आर्थिक स्थितियों पर जायज़ असंतोष में हैं, उन्हें सत्ता परिवर्तन की अपनी रणनीति के मुख्य हथकंडे में बदल दिया है।
व्यवहार में, यह साम्राज्यवादी कंट्रोल ईरानी अवाम के वैध विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के अधिकार को दबा देती है; एक ऐसा मामला जो हाल ही में दक्षिणी पार्स गैस रिफ़ाइनरी में श्रमिकों की सबसे बड़ी सभा में स्पष्ट रूप से देखा गया, जहां यूनियन नेताओं ने ईरान के श्रमिक दल को विदेशी ताकतों द्वारा कंट्रोल किए जाने और शोषण से रोका। हालाँकि, जो प्रदर्शन और विरोध समान स्तर की संगठनात्मक और राजनीतिक गतिविधि से संपन्न नहीं हैं, वे कहीं अधिक असुरक्षित हैं और उन्हें कंट्रोल किए जाने का ख़तरा है; इस तरह कि उनकी मुख्य माँगें अक्सर साम्राज्यवादी एजेंडे वाले बाहरी खिलाड़ियों के हस्तक्षेप की छाया में धुंधली और ग़ायब हो जाती हैं। पिछले कुछ हफ़्तों में, प्रशिक्षित तत्वों ने शांतिपूर्ण सभाओं के बीच छिपकर घुसपैठ की और हिंसा तथा अत्यधिक बर्बर कृत्यों को अंजाम दिया, जैसे कि पुलिसकर्मियों का सार्वजनिक रूप से सिर क़लम करना; साथ ही अस्पतालों, बैंकों और मस्जिदों सहित महत्वपूर्ण संस्थानों और असैन्य स्थलों पर हमले भी किए। ये कृत्य ईरान की संप्रभुता को कमज़ोर करने के एक समन्वित और व्यवस्थित प्रयास का हिस्सा हैं; ऐसी संप्रभुता जो पश्चिम एशिया में ज़ायोनियों के हाथों नस्ली सफ़ाए और उनके औपनिवेशिक विस्तारवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध के मुख्य स्तंभों में से एक के रूप में कार्य करती है और क्षेत्र में साम्राज्य-विरोधी फ़ोर्सेज़ और आंदोलनों को भौतिक सहायता प्रदान कर उनका समर्थन करती है।
इस विशाल अमरीकी-ज़ायोनी हस्तक्षेपों के बावजूद, इस्तेमाल की गई रणनीतियाँ किसी भी तरह से नई नहीं हैं। यह हिंसक ऑपरेशन ईरान को अस्थिर करने, उसके संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करने और उसकी राष्ट्रीय संपत्ति को लूटने के उद्देश्य से साम्राज्यवादी हस्तक्षेपों के लंबे इतिहास का एक नया अध्याय मात्र है; ऐसी कार्रवाइयाँ जो सीधे तौर पर उन्हीं आक्रमण और तख़्तापलट के पैटर्न से प्रेरित हैं जो पश्चिम द्वारा दशकों से इस देश के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।
ईरान की संप्रभुता के ख़िलाफ़ हाल के हिंसक ऑपरेशन का क़ानूनी लेहाज़ से मूल्यांकन ज़रूरी है, लेकिन साथ ही, ऐसी कार्रवाइयों के लिए किसी भी तरह के क़ानूनी औचित्य का दिखावा करने से स्पष्ट रूप से पीछे हटने को पहचानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अतीत में, साम्राज्यवादी ताकतें कम से कम अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के आधार पर अपने हस्तक्षेपों को उचित ठहराने का प्रयास करती थीं, भले ही कमज़ोर और सतही तर्कों के साथ। 7 अक्तूबर, 2023 से पहले, वे क़ानूनी मानदंडों का पालन करने की कोशिश करती प्रतीत होती थीं, भले ही इस दिखावे में झोल था। लेकिन "अल-अक़्सा तूफ़ान ऑपरेशन" के नाम से फ़िलिस्तीनियों के साम्राज्य-विरोधी ऑपरेशन ने दुनिया को एक बड़ा उपहार दिया: इस ऑपरेशन ने साम्राज्यवादी ताकतों के चेहरे से उदारवादी अधिकार का मुखौटा हटा दिया। संयुक्त राज्य अमरीका और उसकी ज़ायोनी प्रॉक्सी फ़ोर्स ने क़ानून के पालन के सभी दिखावे को छोड़ दिया है और पूरी तरह अपने फ़ासीवादी और साम्राज्यवादी चेहरे को उजागर कर दिया है। फिर भी, राजनीतिक और ऐतिहासिक कारणों से, ईरान की संप्रभुता के ख़िलाफ़ अमरीका और ज़ायोनी शासन के हस्तक्षेपों की वैधता की जांच अभी भी ज़रूरी है।
अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन
ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त राज्य अमरीका और उसके ज़ायोनी एजेंट द्वारा डिजाइन किया गया हालिया ऑपरेशन, अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के कई बुनियादी सिद्धांतों, विशेष रूप से "नॉन इंटर्वेन
्शन के सिद्धांत" का स्पष्ट उल्लंघन है। ये उल्लंघन न केवल ईरान की संप्रभुता की अवहेलना को दर्शाते हैं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था की सबसे बुनियादी आधारशिलाओं के तेज़ी से कमज़ोर होने का भी संकेत देते हैं।
"नॉन इंटर्वेन्शन का सिद्धांत", जो प्रचलित अंतर्राष्ट्रीय क़ानून का एक आधारस्तंभ है, इस बात पर ज़ोर देता है कि प्रत्येक स्वतंत्र राज्य को बाहरी हस्तक्षेप के बिना अपने आंतरिक और बाहरी मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार है। यह सिद्धांत सरकारों की संप्रभुता सीमा को परिभाषित करके उनकी क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। यह सिद्धांत संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 के खंड 4 और 7 में भी स्पष्ट रूप से निर्धारित है; जो क्रमशः किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनैतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल के प्रयोग या उसकी धमकी पर प्रतिबंध लगाता है और साथ ही संयुक्त राष्ट्र को उन मामलों में हस्तक्षेप करने से रोकता है जो अनिवार्य रूप से किसी राज्य के घरेलू अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इस नियम के एकमात्र अपवाद को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय 7 में पेश किया गया है, जो विशिष्ट परिस्थितियों में, जैसे अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरे की हालत में, बल प्रयोग की अनुमति देता है।
ईरान के मामले में, आंतरिक विरोध प्रदर्शनों में अमरीका और ज़ायोनी शासन का हस्तक्षेप नॉन इंटर्वेन्शन के सिद्धांत का सीधा और स्पष्ट उल्लंघन है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता, आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने स्पष्ट रूप से इस हस्तक्षेप की ओर इशारा किया है और अपने हालिया भाषण में ज़ोर देकर कहा: "[अमरीकी राष्ट्रपति] ने खुलकर कहा, खुलकर बात की, खुलकर उकसाया। हमारे पास लगातार ऐसे सबूत हैं कि उन्होंने मदद की; उन्होंने भी, ज़ायोनी शासन ने भी मदद की। हम अमरीकी राष्ट्रपति को मुजरिम मानते हैं; नुक़सान के लिए, क्षति के लिए, और ईरानी राष्ट्र पर लगाए गए आरोपों के लिए।"
दूसरी ओर, अमरीकी और ज़ायोनी अधिकारियों ने भी अपनी हस्तक्षेपपूर्ण करतूतों पर खुलकर गर्व जताया है। संयुक्त राज्य अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने एक ट्वीट में लिखा: "सड़कों पर उतरे सभी ईरानियों को नए साल की मुबारकबाद; और साथ ही उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे मोसाद के हर एजेंट को भी।" इसी तरह, ज़ायोनी शासन के एक मंत्री अमीख़ाई अलयाहू ने कहा: "हमारे लोग इस वक़्त भी वहाँ सक्रिय हैं।"
आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की इस स्पष्ट स्वीकारोक्ति ने इस देश की संप्रभुता का स्पष्ट उल्लंघन किया है और यह अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में नॉन इंटर्वेन्शन के बुनियादी सिद्धांत की अवहेलना का एक साफ़ उदाहरण है।
अमरीकी सरकार ने भी खुले तौर पर इस हस्तक्षेप का समर्थन किया है। अमरीकी राष्ट्रपति ने एक बयान में घोषणा की: "ईरान में नए नेतृत्व की तलाश का समय आ गया है" और सड़क की अशांति पर प्रतिक्रिया देते हुए, ईरान को धमकी दी कि संयुक्त राज्य अमरीका "उन [ईरान] पर बहुत कड़ी चोट करेगा"। यह भाषा न केवल ईरान की राजनैतिक स्वायत्तता पर हमला है, बल्कि स्पष्ट रूप से नॉन इंटर्वेन्शन के सिद्धांत का उल्लंघन है, एक संप्रभु राज्य के आंतरिक मामलों में दख़ल है, और एक संप्रभु सरकार में सत्ता परिवर्तन के लिए स्पष्ट रूप से आह्वान करके उसके अधिकारियों और नेतृत्व को सीधे निशाना बनाने की कोशिश है।
यह क़दम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का भी स्पष्ट उल्लंघन है, जो किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनैतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी पर रोक लगाता है। अमरीकी सरकार ने यह कहकर कि अगर ईरानी अधिकारी प्रदर्शनकारियों से निपटते हैं, तो वह "उन पर कड़ी चोट करेगी", स्पष्ट रूप से ईरान की संप्रभुता के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है। ये धमकियाँ ऐसे समय में दी जा रही हैं जब पहले भी जून में, चार्टर के इसी अनुच्छेद का घोर उल्लंघन करते हुए, ईरान के ख़िलाफ़ 12 दिनों का युद्ध लड़ा गया था, और साथ ही यमन, लेबनान, सीरिया और फ़िलिस्तीन के ख़िलाफ़ लगातार हमले, अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक संस्थानों में क़ानूनी कार्यवाही पूरी तरह नज़र अंदाज़ करके किए गए।
जबकि अमरीकी अधिकारी दावा करते हैं कि वे ईरानियों को उनकी सरकार से "बचाना" चाहते हैं, अमरीका के भीतर, इस देश के लोगों को सरकार द्वारा पूर्ण राजनैतिक अधिकारों वाले नागरिकों के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है। पूरे अमरीका की यूनिवर्सिटियों के छात्रों को उस नस्ली सफ़ाए के विरोध में, जिसे उनकी सरकार सक्रिय रूप से हथियार दे रही और फंडिंग कर रही है, व्यवस्थित रूप से दमन, निष्कासन और धमकी दी जा रही है। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की पुलिस द्वारा हत्या कर दी जाती है और प्रवासियों के ख़िलाफ़ पुलिस की नस्लभेदी हिंसा अमरीकी समाज की एक कड़वी वास्तविकता बन गई है। अमरीकी सरकार के व्यवहार में इस
हिंसा और व्यवस्थित दमन की व्यापक निंदा के बावजूद, कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है।
इसके अलावा, जबकि ईरानी सरकार को उखाड़ फेंकने की कोशिश के बाद अमरीकी अधिकारी ईरानियों को "स्वतंत्रता" का वादा करते हैं, इसी सरकार ने हाल ही में लूटे गए वेनेज़ोएला के तेल की 50 करोड़ डॉलर की बिक्री को अंतिम रूप दिया है; ऐसा क़दम जो वेनेजुएला के अवाम के ख़िलाफ़ सत्ता परिवर्तन के ऑपरेशन के केवल कुछ हफ़्तों बाद उठाया गया है।
अंतर्राष्ट्रीय क़ानून में एक नयी व्यवस्था
अंतर्राष्ट्रीय अधिकारों के मौजूदा संस्थानों की अमरीका द्वारा इस देश में हिंसा का विरोध करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ किए गए अपराधों के लिए उस पर मुकदमा चलाने और जवाबदेह ठहराने में अक्षमता, केवल क़ानून के क्षेत्र में एक सैद्धांतिक विफलता नहीं है; बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय क़ानून और साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक शक्तियों के बीच परस्पर संबंध का स्पष्ट नमूना है। नस्ली सफ़ाए से लेकर आक्रमण और हस्तक्षेप तक, अमरीका और ज़ायोनी शासन के अपराधों के विश्लेषण को केवल "ग़ैरक़ानूनी कृत्यों" के दायरे में सीमित करने से यह ख़तरा है कि जिन संरचनाओं की वजह से ये अपराध संभव होते हैं, वे इसे एक स्वाभाविक और आम बात न बना दें। जो बात ज़रूरी है, वह इस वास्तविकता को स्वीकार करना है कि मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था पूरे इतिहास में वर्चस्व का एक उपकरण रही है और वास्तविक मुक्ति केवल उस साम्राज्यवादी व्यवस्था से निकलने में निहित है जिसकी यह व्यवस्था रक्षक है।
ईरान की संप्रभुता के ख़िलाफ़ ईरान की सड़कों पर हुई हालिया हिंसा के गंभीर क़ानूनी मूल्यांकन में, मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था के ढांचे के भीतर, न केवल इन सच्चाइयों को पहचानना चाहिए, बल्कि उनका गंभीरता से सामना भी करना चाहिए:
(1) 1945 के बाद की अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था का पतन और पश्चिम का उससे औपचारिक रूप से बाहर निकल जाना;
(2) जवाबदेही, मुआवज़ा और अधिकारों की बहाली के लिए प्रभावी तंत्र बनाने में वर्तमान क़ानूनी व्यवस्था की संरचनात्मक अक्षमता। यह स्थिति (3) एक नई क़ानूनी व्यवस्था के गठन की तत्काल आवश्यकता को उजागर करती है जो ख़ास तौर पर उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी अपराधों के संबंध में जवाबदेही को, प्रमुखता दे।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता, आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने ईरानी राष्ट्र के ख़िलाफ़ किए गए अपराधों के लिए संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही और मुकदमे का मुतालबा किया है। हालाँकि, मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी संस्थानों में अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन के लिए संयुक्त राज्य अमरीका को जवाबदेह ठहराने और दंडित करने के लिए ज़रूरी संरचनात्मक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है।
यह तब है जब अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) ने नेतन्याहू और गैलेंट जैसे ज़ायोनी अपराधियों के ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों और मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों, जिनमें युद्ध की एक हथकंडे के रूप में भूख का उपयोग भी शामिल है, के आरोप में गिरफ़्तारी वारंट जारी किया है, लेकिन अमरीकी समर्थन से वे नस्ली सफ़ाए सहित अपने अपराध जारी रखने हुए हैं। यह ऐसी स्थिति में है जब संयुक्त राज्य अमरीका ने बिना किसी क़ानूनी औचित्य और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हुए, जिसमें विदेशी अधिकारियों की प्रतिरक्षा का स्पष्ट उल्लंघन भी शामिल है, वेनेज़ोएला के क़ानूनी राष्ट्रपति का अपहरण कर लिया है।
वास्तविक जवाबदेही हेग से नहीं हो पाएगी; यह ऐसी संस्था है जिसकी विश्वसनीयता और प्रभुत्व पर उसकी संरचनात्मक रूप से साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ परस्पर संबंध के कारण गंभीर रूप से दाग़ लग गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ), सरकारों की असहमति या उनकी ओर से कार्यकारी ज़िम्मेदारी न निभाए जाने की स्थिति में, अपने फ़ैसलों को लागू करने की ताक़त नहीं रखती और अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) उन अधिकार क्षेत्र की सीमाओं के ढांचे के भीतर काम करता है जो ठीक उन्हीं शक्तियों द्वारा आकार दिए गए हैं जो स्वयं नस्ली सफ़ाए में लिप्त और भागीदार हैं। जब तक इस्राईल संयुक्त राष्ट्र महासभा की सीट पर क़ब्ज़ा किए हुए है और अमरीकी वीटो ने सुरक्षा परिषद को बंधक बना रखा है, तब तक इन संस्थानों को न्याय के क्षेत्र में विश्वसनीय और निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं माना जा सकता। इसलिए, अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का मौलिक पुनर्निर्माण एक ज़रूरत है; एक ऐसी व्यवस्था जो वीटो संरचना को ख़त्म कर दे और उपनिवेशवाद के शिकार और उपनिवेशवाद से मुक्त लोगों की आवाज़ों को प्रमुख रूप से अहमियत दे।
यहीं पर सशस्त्र प्रतिरोध का चलन क़ानूनी और राजनैतिक रूप से अनिवार्य हो जाता है। आलोचना करने वाले विद्वानों ने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया है कि सबसे ज़्यादा ताक़तवर सरकारें भी अपनी हिंसा को क़ानून के दायरे और वैधता की भाषा में ढक लेती हैं। लेकिन 7 अक्तूबर एक फ़र्क़ क़ायम करने वाला मोड़ था; एक ऐसी घटना जिससे उदार-लोकतांत्रिक मुखौटा हट गया और साम्राज्यवाद का नग्न चेहरा उजागर हो गया। उसी समय से, एक निर्णायक सवाल उठा: क्या पश्चिम अपना क़ानूनी मुखौटा बनाए रखेगा, या खुद को वैसा ही प्रकट करेगा जैसा वह है - फ़ासीवादी, नस्ली सफ़ाया करने वाला और उसी औपनिवेशिक हिंसा में ढंका हुआ कि जिसे मिटाने का अंतर्राष्ट्रीय क़ानून दावा करता था? व्यवहार में, जवाब स्पष्ट हो गया: मुखौटा गिर गया।
इस संदर्भ में, पश्चिमी एशिया में प्रतिरोध आंदोलनों को, फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध के नेतृत्व में और ईरान की भौतिक और लॉजिस्टिक सहायता के साथ, न केवल वैध कार्रवाई के रूप में क़ानूनी माना जाना चाहिए, बल्कि इसे मानवता के पूर्ण विनाश के ख़िलाफ़ वैश्विक रक्षक बलों के रूप में पहचाना जाना चाहिए; ऐसा विनाश जिसे संयुक्त राज्य अमरीका और क्षेत्र में उसकी सैन्य प्रॉक्सी ताक़तों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। ये आंदोलन एक ओर क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ प्रतिरोध करने के आमजन के अधिकार और दूसरी ओर नस्ली सफ़ाए को रोकने की सामूहिक ज़िम्मेदारी को पूरा करते हैं। ईरान की संप्रभुता के ख़िलाफ़ सभी आक्रामकताओं का भी इसी रूपरेखा में विश्लेषण किया जाना चाहिए।
ईरान, फ़िलिस्तीन, हिज़्बुल्लाह, अंसारुल्लाह और हमास न केवल अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के ढांचे के वैध प्लेयर हैं, बल्कि उनका अस्तित्व ज़रूरी है। इस मोर्चे का प्रतिरोध एक नई अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी व्यवस्था के गठन की नींव बनाता है; एक ऐसी व्यवस्था जिसे न्यूयॉर्क में सुरक्षा परिषद के हॉल में नहीं, बल्कि ग़ज़ा पट्टी, बेरूत, सनआ, तेहरान और हर उस स्थान पर अनुमोदित किया जाता है जहाँ लोग विनाश के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं और साम्राज्यवाद की बर्बरता के सामने जीवन का एलान करते हैं।
लेखकः हेलिए दोताक़ी, अंतर्राष्ट्रीय क़ानून और अधिकारों की रिसर्च स्कॉलर