इंसानियत को मुक्तिदाता की ज़रूरत
"इंसानियत की तारीख़ में शायद ही कोई ऐसा दौर गुज़रा हो जब समाज का हर शख़्स, पूरी दुनिया में मानव समाज में, इंसानियत के मुक्तिदाता की ज़रूरत को इतना महसूस किया गया हो जितना आज महसूस किया जा रहा है...एक मुक्तिदाता की ज़रूरत का एहसास, इमाम महदी की ज़रूरत के एहसास, अल्लाह की हिमायत रखने वाली एक ताक़त का एहसास, एक मासूम इमाम की ज़रूरत का एहसास, इसमत (हर गुनाहों व ऐबों से पाक होने) और अल्लाह की ओर हिदायत की ज़रूरत का एहसास; इतिहास में कम ही दौर ऐसे होंगे जब इंसान में इस आला हक़ीक़त की ज़रूरत के ये सब जज़्बे मौजूद रहे हों।" (20 अप्रैल 2020)
इंतेज़ार यानी ज़िंदगी की मौजूदा हालत पर रुके न रहना
इस नज़र से, "इंतेज़ार यानी इंसान की ज़िंदगी की मौजूदा स्थिति को पर्याप्त न समझना, क़ुबूल न करना और वांछित स्थिति तक पहुंचने के लिए कोशिश करना है। ज़ाहिर है यह वांछित स्थिति अल्लाह के वली हज़रत हुज्जत इमाम महदी अलैहिस्सलाम (अल्लाह उन्हें जल्ज से जल्द ज़ाहिर करे) के ताक़तवर हाथों से ही हासिल होगी।" (17 अगस्त 2008) इंतेज़ार, इमाम महदी के ज़ाहिर होने के अक़ीदे का अभिन्न हिस्सा है, इसी से धर्म को समझने और इस्लामी उम्मत की इस्लाम के उच्च मक़सद की ओर मौलिक, सार्वजनिक और सामाजिक हरकत के बुनियादी विचार निकलते हैं; इंतेज़ार यानी निगरानी करना, तैयार रहना उस हक़ीक़त के लिए जिसका आना निश्चित है; इंतेज़ार का यह मानी है। इंतेज़ार यानी यह भविष्य निश्चित है, पक्का है; ख़ास तौर पर एक ज़िंदा और हाज़िर हस्ती का इंतेज़ार; यह बहुत अहम विषय है। (9 जुलाई 2011)
इमाम महदी के ज़ाहिर होने का अक़ीदा, इस्लाम की उच्च शिक्षाओं का भाग
इसी बात को जारी रखते हुए, कहना चाहिए कि "इमाम महदी के ज़ाहिर होने का विषय उच्च धार्मिक शिक्षाओं की ज़ंजीर और क्रम के कुछ अहम विषयों में है; मिसाल के तौर पर नबूव्वत की तरह, इमाम महदी के विषय की अहमियत को इस नज़र से देखना चाहिए। क्यों? इसलिए कि इमाम महदी जिस चीज़ की ख़ुशख़बरी लाएंगे, वह वही चीज़ है जिसके लिए सभी पैग़म्बर आए और वह तौहीद पर आधारित दुनिया क़ायम करना, न्याय पर आधारित उसकी संरचना होना और उन सभी सलाहियतों का इस्तेमाल होना है जिन्हें अल्लाह ने इंसान के वजूद में दिया है; हज़रत इमाम महदी के ज़ाहिर होने का दौर (अल्लाह उन्हें जल्द ज़ाहिर करे) ऐसा दौर होगा। तौहीद पर आधारित समाज का दौर है, तौहीद की संप्रभुता का दौर है, इंसान की पूरी ज़िंदगी पर सही अध्यात्म और धर्म की संप्रभुता का दौर है और न्याय के उसके सही व संपूर्ण अर्थ में क़ायम होने का दौर है।" (9 जुलाई 2011)
इमाम महदी का जन्म, दुनिया के सभी पाक और आज़ाद इंसानों की ईद
इस आधार पर इमाम महदी कुछ लोगों या किसी गिरोह से मख़सूस नहीं हैं। "इमाम महदी का शुभ जन्म दिवस (हमारी जानें उस मिट्टी पर क़ुर्बान जिस पर उनके क़दम पड़ें) हक़ीक़त में दुनिया के सभी पाक और आज़ाद इंसानों की ईद है। इस दिन मुमकिन है सिर्फ़ वे लोग ख़ुश न हों जो या तो ज़ुल्म के आधारों का हिस्सा या दुनिया के ज़ालिमों और सरकशों को मानने वालों का हिस्सा होंगे, वरना कौन आज़ाद इंसान है जो पूरी दुनिया में न्याय क़ायम होने और ज़ुल्म के ख़त्म होने से ख़ुश न हो और उसकी आरज़ू न करे।" (24 नवम्बर 1999) पंद्रह शाबान का दिन, उम्मीद का दिन है। यह उम्मीद, सिर्फ़ शियों या मुसलमान उम्मत से मख़सूस नहीं है। क़रीब क़रीब दुनिया में सभी धर्म, इंसानियत के एक उज्जवल भविष्य की उम्मीद और जिसका वादा किया गया है उसके ज़ाहिर होने, एक मुक्तिदाता और पूरी दुनिया में न्याय क़ायम करने वाली एक ताक़त के ज़ाहिर होने के विषय पर एकमत हैं। (17 अगस्त 2008)
सभी धर्मों का इमाम महदी के ज़ाहिर होने पर अक़ीदा
इस लिए "सिर्फ़ शिया नहीं हैं जो इमाम महदी (सलामुल्लाह अलैह) के ज़ाहिर होने का इंतेज़ार कर रहे हैं, बल्कि मुक्तिदाता और इमाम महदी का संबंध सारे मुसलमानों से है। शियों और दूसरों में फ़र्क़ यह है कि शिया इस मुक्तिदाता को नाम, निशानी और मुख़्तलिफ़ ख़ुसूसियतों से पहचानते हैं, लेकिन मुक्तिदाता पर अक़ीदा रखने वाले दूसरे मुसलमान, मुक्तिदाता को नहीं पहचानते; फ़र्क़ यहाँ पर है, इमाम महदी के ज़ाहिर होने के विषय पर सभी मुसलमान एकमत हैं। दूसरे धर्म भी अपने अक़ीदे में, ज़माने के अंत के क़रीब एक मुक्तिदाता के इंतेज़ार में हैं; उन्होंने भी इस मसले के एक भाग को सही समझा है, लेकिन इस मसले के मुख्य बिन्दु यानी ख़ुद मुक्तिदाता की पहचान के संबंध में वे ग़लती कर गए हैं। शिया अपनी ठोस और पक्की ख़बर से, मुक्तिदाता को नाम, निशानी, ख़ुसूसियतों और जन्म दिवस के साथ पहचानते हैं। (20 सितम्बर 2005) इस परिप्रेक्ष्य में, "इमाम महदी के ज़ाहिर होने का अक़ीदा, इतिहास के किसी दौर में शियों से मख़सूस नहीं है, सभी मुसलमान चाहे शिया हों या सुन्नी, इस अर्थ में अक़ीदा रखते हैं, बल्कि ग़ैर मुसलमान भी एक तरह से अक़ीदा रखते हैं। इस में शियों की विशिष्टता यह है कि इंसानियत को मुक्ति देने वाली इस शख़्सियत को वे नाम, निशान और ख़ुसूसियत के साथ पहचानते हैं और उनका मानना है कि वह अल्लाह के हुक्म के लिए हर दम तैयार और हाज़िर हैं। जब भी अल्लाह उन्हें हुक्म देगा वह उस महान काम को शुरू कर देंगे जो मानवता और इतिहास को बदल कर रख देगा।" (22 अक्तूबर 2002)
इमाम महदी के इंतेज़ार का जज़्बा उम्मीद जगाने और ताक़त देने वाला है
इसी वजह से, "इंतेज़ार का जज़्बा और ज़माने के सरपरस्त (हमारी जानें उन पर क़ुर्बान) से संपर्क का जज़्बा और उनके ज़ाहिर होने और उस दिन के होने का इंतेज़ार करना, इस्लामी समाज के लिए मुश्किलों के दूर होने का सबसे बड़े दरवाज़ा है। हम मुश्किलों के दूर होने का इंतेज़ार कर रहे हैं, यह इंतेज़ार अपने आप में दुखों को दूर करता है। ख़ुद यह इंतेज़ार, मुश्किलों के दूर होने की खिड़की है, उम्मीद देने वाला है, ताक़त देने वाला है; निरर्थक एहसास, बर्बाद होने के एहसास, निराशा और भविष्य के संबंध में भटकने से रोकता है; उम्मीद जगाता है, दिशा देता है। इमाम महदी (हमारा सलाम हो उन पर) का विषय यह है।" (11 जून 2014)
इमाम महदी के ज़ाहिर होने का दिल से अक़ीदा, आत्मिक और सामाजिक दुखों का इलाज
इसी तरह "इमाम महदी (जिन पर हमारी जानें क़ुर्बान) का जन्म दिवस और इस बड़ी याद से हमें सबक़ लेना चाहिए। जज़्बा, बहुत अच्छा है, ये जज़्बे इंसानों के बहुत से भले कर्मों का आधार हैं, पूरी दुनिया को मुक्ति देने वाली इस हस्ती के वजूद पर ईमान और दिल से अक़ीदा, बहुत सी आत्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक बीमारियों का इलाज है लेकिन इन सबसे बढ़कर अहम बिंदु यह है कि हमें इस याद और अज़ीम घटना से सबक़ लेना चाहिए।" (12 नवम्बर 2000) इस आधार पर इमाम महदी के ज़ाहिर होने का विषय और उनके इंतेज़ार का विषय, तर्कसंगत है। "कोई यह न सोचने लगे कि इमाम महदी के ज़ाहिर होने का विषय, सिर्फ़ एक जज़्बाती मसला है; बिल्कुल नहीं, इमाम महदी के ज़ाहिर होने का वैचारिक आधार, बहुत मज़बूत और ठोस है। इस विचार के विरोधियों और दुश्मनों ने लोगों के मन में जो मुख़्तलिफ़ भ्रांतियां पैदा की हैं, उनका ठोस जवाब है। अंत में यह कि ...इस विचार का तार्किक और मानसिक आयाम बहुत ही ज़ाहिर है, साथ ही शियों के इस अक़ीदे का भावनात्मक, आध्यात्मिक और ईमानी आयाम भी बहुत अहम है।" (28 जनवरी 1994)
इमाम महदी के ज़ाहिर होने के लिए तैयारी
हज़रत इमाम महदी के वैश्विक आंदोलन की अहमियत के मद्देजऩर हमें अपने फ़र्ज़ को सही तरह से अंजाम देना चाहिएः "हमें ख़ुद को तैयार करना चाहिए, हर वह शख़्स जो यह महसूस करे कि उस पर फ़रीज़ा है, उसे ख़ुद को तैयार करना चाहिए; यह तैयारी आध्यात्मिक है, आत्मिक है, ईमान के लेहाज़ से तैयारी है। हर शख़्स को चाहिए कि अपने भीतर उम्मीद, ईमान और पाकीज़गी की विशाल संपत्ति पैदा करे ताकि उनके (इमाम महदी) के निकटवर्ती, उन के ख़ास लोगों, उस महान हस्ती के मददगारों और उनके वैश्विक आंदोलन में सहयोगियों में क़रार पाए।" (28 जनवरी 1994)