इस्लामी गणराज्य ईरान के विदेश मंत्री डॉ. अब्बास इराक़ची ने KHAMENEI.IR के ऑनलाइन अख़बार #सदाए ईरान के लिए लिखे अपने एडिटोरियल में देश के हालिया फ़ितने में अमरीका की खुली दख़लअंदाज़ी की क़ानूनी लेहाज़ से जवाबदेही की व्याख्या की है।
इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के ख़िलाफ़ 12 दिन की थोपी गई जंग के क्रम में हुए हालिया घटनाक्रम और संगठित आतंकवादी करतूतों ने एक बार फिर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के संबंध में अमरीकी सरकार के व्यवहार का असली रूप दिखाया है, लेकिन इससे भी आगे, इसने इंटरनेशनल रिलेशन के क्षेत्र में जनमत के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है: क्या सरकारें बिना क़ीमत चुकाए दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में खुले तौर पर दखल देना जारी रख सकती हैं?
ज़मीनी स्तर पर पक्के सुबूत और आधिकारिक बयान साफ़ बताते हैं कि 8-10 जनवरी के दरमियान आतंकवादी कृत्य कोई अचानक घटने वाली अशांति नहीं थी, बल्कि अमरीका और ज़ायोनी शासन के इंटेलिजेंस, मीडिया और ऑपरेशनल सपोर्ट वाली एक टारगेटेड साज़िश का हिस्सा था। क्रिमनल लोगों को ट्रेनिंग देना, उन्हें तैयार करना और गाइड करना, सीधे तौर पर हिंसा को बढ़ावा देना और ईरान की अंदरूनी सिक्योरिटी को अस्थिर करने की कोशिश करना, ये सभी ऐसी बातें हैं जिन्होंने इन घटनाओं को एक शांतिपूर्ण घरेलू विरोध के दायरे से निकाल कर एक आतंकवादी ऑप्रेशन के अलावा, इंटरनेशनल लॉ का एक गंभीर मुद्दा बना दिया है।
घरेलू तबाही से लेकर डिप्लोमेटिक मिशन पर हमले तक
नुक़सान का दायरा सिर्फ़ लोगों की जान और प्रॉपर्टी तक ही सीमित नहीं था। मस्जिदों, एजुकेशनल सेंटर, बैंकों, अस्पतालों, बिजली के इंफ़्रास्ट्रक्चर और जनरल स्टोर को नुक़सान पहुंचाना, साथ ही सिक्योरिटी फ़ोर्स के जवानों की शहादत और बेगुनाह लोगों की जान जाना, यह दिखाता है कि दंगाइयों का लक्ष्य पब्लिक ऑर्डर को कमज़ोर करना और सामाजिक स्तर पर आतंक पैदा करना था। इसके अलावा, कुछ देशों में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के राजनैतिक और वाणिज्यिक मिशन पर हमले 1961 और 1963 के कूटनैतिक और वाणिज्यिक अधिकारों पर वियना कन्वेंशन के उल्लंघन और डिप्लोमेसी की रेड लाइन को पार करने का साफ़ संकेत हैं।
अमरीकी अधिकारियों के आधिकारिक और प्रमाणित रुख़ और बयान, ख़ास कर दंगाइयों के लिए सपोर्ट और ईरान के ख़िलाफ़ बल प्रयोग की धमकी, इंटरनेशनल क़ानून और बाध्यकारी नियमों के माने हुए सिद्धांतों के उल्लंघन की साफ़ मिसालें हैं, जिसमें देशों के अंदरूनी मामलों में दख़ल न देने का सिद्धांत, और बल प्रयोग या धमकी पर रोक का सिद्धांत, यूनाइटेड नेशंस चार्टर का आर्टिकल 2, पैराग्राफ़ 4, 24 अक्टूबर, 1970 को पारित किया गया यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली का प्रस्ताव 2625, साथ ही 1981 के अल्जीरिया घोषणापत्र और आतंकवाद से लड़ने के क्षेत्र में उस सरकार की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।
इस बीच, सुप्रीम लीडर के ख़िलाफ़, जिन्हें एक आज़ाद देश का सबसे बड़ा सरकारी अधिकारी माना जाता है, अमरीकी राष्ट्रपति की साफ़ तौर पर दी गयीं बार-बार धमकियां ऐसी करतूत है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उनकी धमकियां देशों के अंदरूनी मामलों में दख़ल न देने के सिद्धांत और राष्ट्राध्यक्षों पर हमला न करने के सिद्धांत की अनदेखी का साफ़ उदाहरण हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक आम मान्य सिद्धांत है और निश्चित तौर पर इसके बड़े पैमाने पर क़ानूनी और राजनीतिक परिमाण होंगे।
ईरान का क़ानूनी क़दम; इंटरनेशनल सिस्टम के लिए एक साफ़ मैसेज
ईरानी विदेश मंत्रालय, अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करते हुए और ईरानी क़ौम के अधिकारों की रक्षा के दायरे में, 12 दिन के थोपे गए युद्ध और हालिया आतंकवादी ऑपरेशनों के लिए अमरीकी सरकार की जवाबदेही के लिए कानूनी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से कोशिश कर रहा है। दख़लअंदाज़ी और दुश्मनी भरी करतूतों का डॉक्यूमेंटेशन चल रहा है, और दावों को घरेलू और इंटरनेशनल स्तर पर ज़िम्मेदार विभागों के सामने पेश करने के लिए ज़रूरी क़ानूनी तैयारी कर ली गई है। इस दिशा में गंभीरता से कोशिश जारी रहेगी। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान का विदेश मंत्रालय ईरानी क़ौम के किसी भी शख़्स के अधिकारों से समझौता नहीं करेगा और आतंकवाद के सपोर्ट को इंटरनेशनल सिस्टम में एक बिना क़ीमत चुकाने वाली प्रक्रिया नहीं बनने देगा। अमरीका को अपनी करतूतों के लिए जवाबदेह होना पड़ेगा।