यह कमिटमेंट इतना गहरा था कि जब रश्त में इमाम सज्जाद (अलैहिस्सलाम) क्लिनिक में आग लग गई, तब भी वह अपने मरीज़ों के साथ खड़ी रहीं। इसी वफ़ादारी ने उनका नाम शहीद के तौर पर अमर कर दिया। मैं मरज़िया नबवी निया की बात कर रहा हूँ; रश्त की एक युवा नर्स जो दंगाइयों की नफ़रत और ग़ुस्से की आग की भेंट चढ़ गयीं, लेकिन उनकी याद का दिया आज भी जल रहा है।

यह 18 जनवरी का दिन था। दंगाई अमरीकी अधिकारियों के खुले सपोर्ट और सैन्य दख़लअंदाज़ी के वादे के सहारे सड़कों पर उतर आए थे। उन्हें सब कुछ तबाह करने का ऑर्डर दिया गया था। उनके लिए मरीज़, हॉस्पिटल और नर्स में कोई फ़र्क नहीं था। ग़ज़ा पट्टी में जुर्म करने वाले अपने आक़ा की तरह, जो हॉस्पिटल और एम्बुलेंस पर भी रहम नहीं करता, उन्होंने रश्त में इमाम सज्जाद (अ स) मेडिकल सेंटर पर भी धावा बोल दिया और उसे आग लगा दी।

मर्ज़िया, जो एक समर्पित नर्स थीं, इस डरावने मंज़र के बीच में थीं। जब आग और धुएं ने सब कुछ घेर लिया था, तब भी उन्होंने वहीं रहना पसंद किया। उन्होंने अपने मरीज़ों से अलग होने और ख़ुद को बचाने से मना कर दिया। कहा जाता है कि आग उनके ऑफ़िस तक पहुँच गई और भागने का रास्ता बंद हो गया। बेरहम और निर्दयी आग ने उन्हें हिलने का कोई मौक़ा नहीं दिया। मर्ज़िया दुश्मन की नफ़रत की आग में ज़िंदा जल गई और शहीद हो गई। शहीद की बहन, दुख और गर्व से भरे दिल से, खुलेआम अमरीकी राष्ट्रपति को इस जुर्म का ज़िम्मेदार और गुनहगार मानती हैं और कहती है: ट्रम्प, मेरी बहन का क़ातिल है।

इमाम ख़ामेनेई ने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लललाहो अलैहि वआलेही वसल्लम की पैग़म्बरी के एलान की सालगिरह "ईदे बेसत" पर समाज के विभिन्न वर्गों के अवाम से मुलाक़ात में कहा: “इस फ़ितने की ख़ास बात यह थी कि अमरीकी राष्ट्रपति ने ख़ुद इस फ़ितने में दख़ल दिया, बात की, कमेंट किए, धमकी दी और दंगाइयों को उकसाया; उन्होंने अमरीका से उन लोगों को मैसेज भेजा जिनके बारे में मैं आपको बाद में बताऊंगा, वे कौन थे, कि आगे बढ़ो, डरो मत; उन्होंने कहा कि हम तुम्हारा साथ देंगे, हम मिलिट्री सपोर्ट देंगे; यानी अमरीकी राष्ट्रपति ख़ुद फ़ितने में शामिल हो गया और वह इस फ़ितने का हिस्सा है।

ईरान के उतार चढ़ाव से भरे इतिहास में, दुश्मनों ने हमेशा इस्लामिक रिपब्लिक को महिला अधिकारों की रक्षा के झूठे नारों से निशाना बनाया है। लेकिन उनके कामों की असलियत इस दावे के बिल्कुल उलट है। क्या एक क्लिनिक पर हमला करना और एक महिला नर्स और माँ को जलाकर मार डालना महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है? हम अभी तक यह नहीं भूले हैं कि तीन साल पहले, वे उन्हीं फ़ेमिनिस्ट लगने वाले नारों के साथ सड़कों पर उतरे थे, लेकिन उनकी हिंसा ने सिस्टम को पलटने के लक्ष्य को उजाकर कर दिया था। हर बार जब इस्लामिक रिपब्लिक के ख़िलाफ़ लड़ाई का कोई नया मोर्चा खुलता है, तो वे “महिलाओं के अधिकारों” के मुद्दे को इसके एक मुख्य हिस्से के तौर पर पेश करते हैं। ईरान में अशांति के इन दिनों में, विदेशी दर्शकों के बीच एक दिलचस्प कहानी घूम रही थी: “जब भी पश्चिमी लोग अचानक मिडिल ईस्ट की महिलाओं के बारे में चिंतित हो जाते हैं, तो समझिए इन महिलाओं पर बमबारी होने वाली है।” हम कैसे विश्वास कर सकते हैं कि पश्चिम में मानवाधिकारों के झूठे दावेदार, जिनका ख़ुद देश और विदेश में महिलाओं के अधिकारों को नज़रअंदाज़ करने का एक लंबा इतिहास रहा है, हमारी महिलाओं के प्रति हमदर्दी रखते हैं?

जैसा कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने भी कहा था: “औरतों के इस मामले में, दुनिया के पूंजीपति और दुनिया के राजनेता… दुनिया के सबसे असरदार मीडिया को अपने पास रखते हैं – और वे मीडिया की भाषा जानते हैं। उनका जज़्बा, औरतों के मामले में दुनिया के कैपिटलिस्ट और उपनिवेशवादियों के दख़ल का जज़्बा, किसी थ्योरेटिकल और फ़िलॉसॉफिकल नज़रिए पर आधारित नहीं है… न ही यह कोई इंसानी भावना है; ऐसा नहीं है कि उन्हें लगता है कि दुनिया में कुछ मामलों में औरतें कमज़ोर हैं, वे उनका साथ देना चाहते हैं, उनकी इंसानी भावनाएँ उबल पड़ती हैं; नहीं, ऐसा भी नहीं है। यह कोई सामाजिक और लोकाधिकारवादी ड्यूटी पूरी करना नहीं है… उनका जज़्बा, पॉलिटिकल और उपनिवेशवादी दख़लअंदाज़ी का है। वे दख़ल इसलिए देते हैं ताकि यह उनके अपने असर के दायरे को और बढ़ाने, और दख़ल देने और आगे बढ़ाने के लिए एक शुरुआत और कवर बन जाए।”

न तो वेस्टर्न मीडिया की फ़ौज, जिसने इन दिनों ईरानी औरतों के अधिकारों की रक्षा का झंडा उठाया है और न ही ईरानी शहरों में उनके आतंकवादी सिस्टम के पियादे, औरतों के अधिकारों को लेकर परेशान हैं। अगर ऐसा होता, तो कम से कम मर्ज़िया नबवी निया को ज़िंदा जलाने पर तो वे रिएक्ट करते और कम से कम वे उस शासन के सपोर्टरों के औरतों के हक़ के दावे को नहीं मानते जिसने ढाई साल के दौरान हज़ारों औरतों को मार डाला है और लाखों दूसरी औरतों का जीना मुश्किल कर दिया है।

लेकिन मर्ज़िया नबवी निया की उनकी कहानियों में कोई जगह नहीं है क्योंकि वह उन लाखों मुस्लिम औरतों में से एक हैं जिन्होंने हिजाब और सोशल आज़ादी के मुद्दे पर इस्लाम की लॉजिक को मानकर, इस्लामिक रिपब्लिक के राज वाले देश में पढ़ाई की, माँ बनीं, काम किया और क़ुर्बानी दी। मर्ज़िया नबवी निया ईरानी औरतों के वेस्टर्न नरेटिव को पूरा नहीं करतीं, इसलिए पश्चिम को लगता है कि उनका नाम भूल जाना चाहिए।

लेकिन मर्ज़िया नबवी निया इस ज़मीन की बहादुर औरतों की लंबी चेन में एक चमकती हुई कड़ी हैं। मर्ज़िया हदीदची (दब्बाग़) से लेकर, जिन्होंने तानाशाह से लड़ने के दिनों में क्रांति को ज़िंदा रखने के लिए हथियार उठाए थे, आज वतन में मर्ज़िया नबवी निया तक, जिन्होंने नर्सिंग यूनिफ़ॉर्म में सेवा के मोर्चे को नहीं छोड़ा। हम भी उनके नाम को नहीं भूलेंगे, बल्कि ज़ोर से कहेंगे: "मर्ज़िया नबवी निया"