दुआ और उस में रोने की रणनीति, यह पूरी बात नहीं है, जी हाँ! इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने दुआ के रूप में इरफ़ान बयान किया, आशूरा के वाक़ए के मक़सद को बचाने के लिए, उन्होंने बारबार इस वाक़ए को बयान किया और रोए लेकिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की रणनीति, इमामत की रणनीति है यानी इस्लाम को बयान करना, इमामत को बयान करना, इमामों के सच्चे मददगारों को इकट्ठा करना जो उस वक़्त के शिया थे।  इमाम ख़ामेनेई 26 सितम्बर 1986