एक देश जो युद्ध की स्थिति में है, वह एक ही समय में अपने अंदर एक नया संकट पैदा नहीं कर सकता और न ही करना चाहिए। ऐसा काम न तो तर्कसंगत है और न ही राष्ट्र को मंज़ूर होगा। अगर इस तरह के संकट आते हैं, तो यह मानना होगा कि कोई बाहरी तत्व या योजना काम कर रही है। पिछला अनुभव यह भी दिखाता है कि दुश्मन, ख़ासकर ज़ायोनी शासन, हमेशा जंगों में एक ही पैटर्न इस्तेमाल करता रहा है: टैक्टिक्स बदलकर “सरप्राइज़ कर देना”। बारह दिन के युद्ध में, उन्होंने बड़े पैमाने पर मिलिट्री ऑपरेशन से शुरुआत की और फिर, दूसरे और तीसरे दिन से, उन्होंने खुले तौर पर संकट को समाज में ट्रांसफर करने की कोशिश की। लोगों को सड़कों पर लाने के लिए सीधी अपील इसी स्ट्रेटेजी का हिस्सा थी: पहले मिलिट्री दबाव, फिर सामाजिक विद्रोह।

हालांकि, मौजूदा स्टेज पर, वही युद्ध एक अलग मोर्चेबंदी के साथ जारी है। इस बार, प्राथमिकता का क्रम बदल गया है: पहले सोशल संकट, फिर इसे मिलिट्री एक्शन से जोड़ने की कोशिश। यहां तक कि अमेरिकी अधिकारियों, ख़ासकर खुद डोनल्ड ट्रंप के कुछ जल्दबाज़ी में और साफ़ बयानों ने भी अनजाने में टैक्टिक्स में इस बदलाव को दिखा दिया; वही बात जिसका इससे पहले नेतन्याहू ने अपनी मीटिंग्स में सुझाव दिया था। सीधे शब्दों में कहें तो, दुश्मन को एहसास हो गया कि लोगों की मौजूदगी और सोशल एकजुटता के कारण पिछली टैक्टिक फ़ेल हो गई थी। इसलिए इस बार, उसने हमारे मज़बूत बिंदु को टारगेट किया: राष्ट्रीय एकता।

यहां एक साफ फ़र्क़ समझना होगा। इसमें कोई शक नहीं है कि देश गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है। रोज़ी-रोटी के दबाव ने समाज के एक हिस्से को विरोध करने पर मजबूर किया है और यह विरोध अपने आप में समझ में आता है। जैसा कि ताकीद की गयी है, सरकार और ज़िम्मेदार संस्थाओं को सुनना चाहिए, बैठकर बातचीत करनी चाहिए, और आर्थिक समस्याओं की जड़ को ख़त्म करने के लिए क़दम उठाना चाहिए। लेकिन साथ ही, हमें यह भी देखना चाहिए कि दुश्मन इस असली और जायज़ प्लेटफ़ार्म का कैसे ग़लत इस्तेमाल के लिए फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा है।

हाल के दिनों में जो हुआ है, उससे साफ़ पता चला है कि आर्थिक विरोध और हिंसक करतूतों के बीच एक साफ़ लाइन है। बाज़ार का विरोध जो ऊँची और अस्थिर कीमतों की बात करता है, वह एक बात है; हथियारों का इस्तेमाल, मोलोटोव कॉकटेल, आगज़नी, लूटपाट, और पब्लिक और लॉ एनफ़ोर्समेंट सेंटर पर हमले दूसरी बात है। इन्हें आर्थिक विरोध के तहत नहीं समझाया जा सकता। ये व्यवहार उन ग्रुप्स की गतिविधियों के संकेत हैं जिन्हें “अर्बन क्वासी-टेररिस्ट ग्रुप्स” कहा जा सकता है; ऐसे ग्रुप्स जिनके बारे में कुछ ज़ायोनी शासन के अधिकारियों ने पहले साफ़ तौर पर “ईरान के अंदर बनाए गए स्ट्रक्चर्स” पर निर्भर होने की बात कही थी।

इन कार्रवाइयों के टारगेट्स भी संयोगवश नहीं हैं। देश और धार्मिक पहचान की निशानियों को निशाना बनाया जाता है: राष्ट्रीय ध्वज, रेज़िस्टेंस के प्रतीक, मस्जिदें और हर वो चीज़ जो देश के गर्व और सांस्कृतिक एकता को दिखाती है। इसका मतलब है कि लक्ष्य सिर्फ़ आर्थिक नाराज़गी पैदा करना नहीं है; लक्ष्य समाज की सामूहिक भावना और पहचान के रिश्तों को तोड़ना है। दुकानों की लूटपाट और सर्विस सेंटरों को तबाह करना भी इस बात का सुबूत है कि समस्या इकॉनमी नहीं है; क्योंकि जो अपनी रोज़ी-रोटी की चिंता करता है, वह अपनी और दूसरों की रोज़ी-रोटी के इंफ्रास्ट्रक्चर को बर्बाद नहीं करता।

 

यह साफ़ तौर पर कहा जाना चाहिए: सुरक्षा संकट न सिर्फ़ समस्या का हल नहीं करता, बल्कि आर्थिक समस्याओं को और गहरा और जटिल भी बनाता है। जो समाज असुरक्षा में डूबा होता है, उसे अपने रोज़मर्रा के काम करने से भी रोका जाता है। ऐसी स्थिति न तो लोगों के लिए दया की बात है और न ही हमदर्दी की; बल्कि, यह एक ज़ुल्म से भरा व्यवहार है जो एक ही समय में देश की पहचान, सामाजिक एकता, धार्मिक विश्वासों और लोगों की रोज़ी-रोटी को निशाना बनाता है।

खुफ़िया सुबूतों और व्यवहार की समीक्षा के आधार पर, इस साज़िश में, अमरीका के सपोर्ट और गाइडेंस के साथ, ज़ायोनी शासन की मुख्य भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। बेशक, इसका मतलब अंदरूनी कमज़ोरियों और ख़ामियों को नज़रअंदाज़ करना नहीं है। अंदरूनी स्तर पर पृष्ठिभूमि मौजूद है और अगर इसे ठीक नहीं किया गया, तो इसका हमेशा ग़लत इस्तेमाल होगा। लेकिन बाहरी साज़िश को नकारना एक स्ट्रेटेजिक ग़लती होगी।

हालांकि, मेरा मानना है कि यह योजना भी फ़ेल हो जाएगी; ठीक वैसे ही जैसे पिछली योजना फ़ेल हो गयी थी। ईरानी समाज ऐसे समय में जल्दी से एकजुट हो जाता है जब उसकी राष्ट्रीय पहचान और सामूहिक पहचान ख़तरे में होती है। दुश्मन ने ईरानी राष्ट्र को ठीक से नहीं समझा है। उसे लगता है कि वह कुछ शहरी तनावों और आतंकवादी करतूतों से समाज को सिविल वॉर में घसीट सकता है और फिर विदेशी दख़लअंदाज़ी का रास्ता खोल सकता है। लेकिन वह दो हक़ीक़तों को नज़रअंदाज़ करता है: पहली, ईरानी राष्ट्र की अपार जागरुकता; और दूसरी, आर्म्ड फ़ोर्सेज़ की उच्चस्तरीय तैयारी।

देश की आर्म्ड फ़ोर्सेज़ आज पहले से ज़्यादा तैयार हैं और किसी भी विदेशी हमले का ज़बरदस्त जवाब दिया जाएगा। इसके अलावा, लोगों को जागरूक करने और उनसे बातचीत करने की भूमिका बहुत ज़रूरी है। मीडिया, सिविल ऑर्गनाइज़ेशन और अधिकारियों को हालात की असली तस्वीर बतानी चाहिए और ईरान इंटरनेशनल जैसे नेटवर्क द्वारा तोड़-मरोड़कर कही गई बातों को कि जिसे पुख़्ता रिपोर्टों के मुताबिक़, ज़ायोनी शासन ने बनाया है, समाज के मनोवैज्ञानिक माहौल में ज़हर घोलने की इजाज़त नहीं देनी चाहिए। दुश्मन की योजना को सपोर्ट करने वाले नेटवर्क, देश की बढ़ा-चढ़ाकर और टूटी हुई इमेज दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि हक़ीक़त ऐसी नहीं है।

इस बीच, एक ज़रूरी बात नहीं भूलनी चाहिए: स्वाधीनता। कोई भी विदेशी ताक़त ईरानी क़ौम की हमदर्द नहीं है। पहलवी दौर से लेकर इलाक़े के आज के उदाहरणों तक, पुराने अनुभव साफ़ दिखाते हैं कि स्वाधीनता पर सौदा करने से सब कुछ खोना पड़ता है। स्वाधीनता महंगी है, लेकिन इसके बिना राष्ट्रीय सम्मान बेकार है। इस स्वाधीनता का मतलब अकेलापन नहीं है; बल्कि, इसका मतलब है दुनिया के साथ बातचीत के दायरे में स्वतंत्र रूप से फ़ैसले लेने का अधिकार।

आख़िर में, इस समय, दो रास्ते एक साथ अपनाने होंगे: एक तरफ़, नुकसान पहुंचाने वाली योजनाओं के ख़िलाफ़ देश की सुरक्षा और एकता की रक्षा करना; और दूसरी तरफ़, इकॉनामी और गवर्नेंस के क्षेत्र में असली सुधार किया जाना चाहिए। लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी बात सुनी जा रही है और देश की इकॉनमी में उनका रोल है। सरकारी मालिकाना हक़ कम करने और अवाम को काम सौंपने के मामले में, सरकार को ब्यूरोक्रेटिक मामलों की स्थितियों को ठीक करने और लोगों को सुविधाएँ देने के लिए बड़े क़दम उठाने होंगे।

यह स्टेज उसी जंग का जारी रहना है, जिसमें तरीक़े अलग-अलग हैं। इससे निकलने के लिए उसी सतर्कता, ज़िम्मेदारी और एकजुटता की ज़रूरत होगी जो देश ने बारह दिन की जंग में दिखाई थी। अगर इस सोशल कैपिटल को बचाकर रखा जाता है, तो यह दौर, अपनी सभी मुश्किलों के साथ, देश के लिए परिपक्व और मज़बूत होने का एक मौक़ा भी बन जाएगा।