परमाणु ऊर्जा

निश्चित रूप से कुछ बरस बाद देश के परमाणु बिजलीघर, देशों में ऊर्जा के सबसे अहम स्रोतों में से एक होंगे। जिस दिन तेल ख़त्म हुआ या तेल के लिए कुछ दूसरी संभावनाएं पैदा हो गईं, उस दिन परमाणु बिजलीघर जो अधिक स्वस्थ, अधिक साफ़ और ज़्यादा सस्ते हैं, देशों में प्रचलित हो जाएंगे। हमें उस दिन ज़रूरत होगी, यूरेनियम का संवर्धन उस दिन शुरू नहीं किया जा सकता, आज ही से शुरू करना चाहिए ताकि हमारी तैयारी रहे, संभावना रहे और वे यही नहीं चाहते, साम्राज्यवादी पश्चिमी यह नहीं चाहते।

2021 July
इन हालिया वार्ताओं के बारे में भी एक बात कहता चलूं, आप लोग भी समस्याओं को जानते ही हैं। इन्हीं वार्ताओं में, जो हाल ही में जारी थीं, हमारे कूटनयिकों ने बड़ी मेहनत की, हमारे कुछ कूटनयिक तो इस मामले में सच में बड़ी अच्छी तरह से उभर का सामने आए, लेकिन अमरीकी, अपने शत्रुतापूर्ण रुख़ पर बुरी तरह से अड़े रहे और उन्होंने एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ाया। वे काग़ज़ पर या अपने वादों में कहते हैं कि हां हम पाबंदियां हटा लेंगे लेकिन उन्होंने नहीं हटाईं और नहीं हटाएंगे। वे शर्त रखते हैं और कहते हैं कि अगर आप चाहते हैं कि पाबंदियां ख़त्म हो जाएं तो अभी, इसी समझौते में एक जुमला बढ़ा दीजिए जिसका अर्थ यह हो कि इन विषयों के बारे में हम आपसे बाद में बात करेंगे और समझौता करेंगे। अगर आपने यह जुमला नहीं बढ़ाया तो इस वक़्त एक दूसरे से सहमति नहीं कर सकते। यह जुमला क्या है? यह जुमला एक बहाना है अगले हस्तक्षेपों के लिए, ख़ुद परमाणु समझौते के लिए और परमाणु समझौते की समय सीमा बढ़ाने के लिए, अन्य मामलों में हस्तक्षेप के लिए, मीज़ाइल के लिए और क्षेत्र के लिए कि अगर बाद में आपने कहा कि नहीं, हम इस बारे में बात नहीं करेंगे, मिसाल के तौर पर देश की नीति या संसद इस बात की इजाज़त नहीं देती तो वे कहेंगे, ठीक है, आपने उल्लंघन किया है इस लिए सब कुछ ख़त्म! कोई समझौता नहीं! इस वक़्त उनकी नीति और उनका तरीक़ा यह है, वे पूरी तरह से कायरतापूर्ण और दुष्टतापूर्ण रवैया अपनाते हैं और उन्हें अपने वादों को तोड़ने में भी किसी तरह की कोई शर्म नहीं है, बिलकुल भी नहीं।
28/07/2021
February
वे कहते हैं कि हम परमाणु हथियार के विरोधी हैं, झूठ बोलते हैं, यह भी उनकी समस्या नहीं है, शायद उनमें से बहुत से या वे सभी जानते हैं कि हम एटमी हथियार नहीं बनाना चाहते, वे तो हमारे पारम्परिक हथियारों के भी ख़िलाफ़ हैं, हमारे प्रतिरक्षा साधनों के भी विरोधी हैं, वे चाहते हैं कि शक्ति के साधनों को ईरान से छीन लें वरना देश के लिए यूरेनियम के संवर्धन की ज़रूरत एक पूरी तरह स्पष्ट बात है। निश्चित रूप से कुछ बरस बाद देश के परमाणु बिजलीघर, देशों में ऊर्जा के सबसे अहम स्रोतों में से एक होंगे। जिस दिन तेल ख़त्म हुआ या तेल के लिए कुछ दूसरी संभावनाएं पैदा हो गईं, उस दिन परमाणु बिजलीघर जो अधिक स्वस्थ, अधिक साफ़ और ज़्यादा सस्ते हैं, देशों में प्रचलित हो जाएंगे। हमें उस दिन ज़रूरत होगी, यूरेनियम का संवर्धन उस दिन शुरू नहीं किया जा सकता, आज ही से शुरू करना चाहिए ताकि हमारी तैयारी रहे, संभावना रहे और वे यही नहीं चाहते, साम्राज्यवादी पश्चिमी यह नहीं चाहते। ये चाहते हैं कि जिस दिन ईरान को एटॉमिक एनर्जी की ज़रूरत हो, उस दिन वह इनका मोहताज हो ताकि ये अपनी शर्तें उस पर थोप सकें, ताकि ज़ोर-ज़बरदस्ती कर सकें, ग़ुंडा टैक्स वसूल कर सकें, ये लोग यह चाहते हैं।
22/02/2021
दुनिया पर जिस चीज़ का राज था, वह वर्चस्ववादी व्यवस्था थी। वर्चस्ववादी व्यवस्था का क्या मतलब? यानी दुनिया को दो भागों में बांट दिया जाता है। एक भाग, वर्चस्ववादियों का और दूसरा भाग वर्चस्व को स्वीकार करने वालों का। वर्चस्ववादी को हावी होना चाहिए, उसकी नीति को भी, उसकी संस्कृति को भी, उसकी अर्थव्यवस्था को भी। वर्चस्व स्वीकार करने वालों को वर्चस्ववादी के सामने सिर झुकाए रहना चाहिए। दुनिया के देशों को वर्चस्ववादी और वर्चस्व स्वीकार करने वाले जैसे दो हिस्सों में बांट दिया जाता था, यह दुनिया में एक प्रचलित प्रथा थी। दुनिया को बांट दिया गया था, दुनिया का एक भाग अमरीका के हाथ में और एक भाग उस समय के सोवियत यूनियन के हाथा, एक हिस्सा दूसरे दर्जे की शक्तियों के हाथ में भी था जो इनके पिट्ठू थे, दुनिया की हालत यह थी। इस्लामी गणराज्य, इस्लामी व्यवस्था और इस्लामी क्रांति ने इस व्यवस्था को ठुकरा दिया। यह साम्राज्य की ज़िंदगी की सबसे अहम नस थी, वर्चस्ववादी व्यवस्था की प्रथाएं, साम्राज्य के जीवन की नसें थीं, साम्राज्य का जीवन इसी पर निर्भर था, इस्लामी गणराज्य ने इसे ही ठुकरा दिया, इस्लामी व्यवस्था ने इसे ठुकरा दिया, ये लोग उसके मुक़ाबले में खड़े हो गए। अलबत्ता इसके लिए वह हमेशा कोई न कोई बहाना बनाते थे। कभी मानवाधिकार का मामला, कभी विभिन्न रूपों में धर्म के अत्यधिक प्रभुत्व को बुरा बताना, कभी परमाणु मामला, कभी मीज़ाइल की समस्या, कभी इलाक़े में उपस्थिति की बात, ये सब बहाने हैं, अस्ल बात यह है कि यह इस्लामी व्यवस्था, वैश्विक वर्चस्ववादी व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं है और वर्चस्ववाद या वर्चस्व स्वीकार करने में उनका साथ देने के लिए तैयार नहीं है। इस्लामी व्यवस्था डटी हुई है, वह ज़ुल्म के ख़िलाफ़ है, वर्चस्ववाद की विरोधी है।
17/02/2021
2018 May
दूसरा अनुभव, ईरान व इस्लामी गणराज्य से अमरीका की गहरी दुश्मनी का है। यह दुश्मनी बड़ी गहरी है, साधारण दुश्मनी नहीं है। विरोध परमाणु मामले जैसे किसी मामले के आधार पर नहीं है, यह बात सभी समझ चुके हैं, मामला इससे कहीं बढ़ कर है। बात यह है कि ये लोग उस व्यवस्था के कट्टर विरोधी हैं जिसने इस संवेदनशील इलाक़े में सिर उठाया है, खड़ी हुई है, डटी हुई है, उसने तरक़्क़ी की है, अमरीका के अत्याचारों का विरोध करती है, अमरीका के संबंध में किसी भी तरह का संकोच नहीं करती, इलाक़े में प्रतिरोध की भावना को बढ़ा रही है, इस्लाम का परचम हाथ में उठाए हुए है। उनकी समस्या यह है कि यह इस्लामी व्यवस्था और इस्लामी गणराज्य नहीं होना चाहिए, न सिर्फ़ यह कि यह व्यवस्था नहीं होनी चाहिए बल्कि वे लोग भी इस व्यवस्था का समर्थन करते हैं, यानी ईरानी राष्ट्र, उससे भी अमरीकी सरकारों के सरग़ना नफ़रत करते हैं। अमरीका के एक उपराष्ट्रपति ने, इस सरकार के नहीं बल्कि एक पिछली सरकार के उपराष्ट्रपति ने खुल कर कहा था कि हमें ईरानी राष्ट्र की, इस्लामी गणराज्य की नहीं, ईरानी राष्ट्र की जड़ खोद देनी चाहिए। तो इस्लामी गणराज्य से अमरीका की समस्या, परमाणु मामले या मीज़ाइल के मामले या इसी तरह के दूसरे किसी अन्य मामले की नहीं है, इन सबकी तो एक अलग ही कहानी है, यानी इन पर जो वे उंगली रखे हुए हैं वह, शायद मैं इस बात को पहले भी कह चुका हूं, इस लिए है कि वे इस्लामी गणराज्य की शक्ति के साधनों को तबाह करना चाहते हैं। ये इस्लामी गणराज्य की ताक़त और ईरानी राष्ट्र की शक्ति के साधन हैं और इसी वजह से ये इन चीज़ों के पीछे पड़े हुए हैं। यह भी एक अनुभव है और इस अनुभव की अनदेखी नहीं की जा सकती। हमें याद रहना चाहिए कि अमरीका, ईरानी राष्ट्र और इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था का दुश्मन है और उसकी दुश्मनी बड़ी गहरी है। परमाणु मामले वग़ैरा की कोई बात ही नहीं है, अस्ल बात इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था की है।
23/05/2018