एप्सटीन द्वीप पर सुनियोजित अपराध के केस सिर्फ़ एक यौन रुसवाई या कुछ पैसे वालों के यौन दुराचार का मामला नहीं है, बल्कि यह केस अब पश्चिमी मानवाधिकार के नज़रिए की कभी न भुलाई जाने वाली आलोचना में एक संपूर्ण दस्तावेज़ बन चुका है। जहाँ पश्चिम के राजनेता, पूंजीपति, मीडिया सेलिब्रेटीज और विद्वानों का एक नेटवर्क, जो बरसों तक ख़ुद को मानवाधिकार और महिला अधिकार का संरक्षक बताता रहा है, आज यौन उत्पीड़न, लड़कियों की स्मगलिंग और यौन दासता की सबसे घिनौनी पृष्ठिभूमि में से एक में, उन का नाम सीधे तौर पर या इंडायरेक्ट तौर पर सामने आ चुका है। जो कुछ दस्तावेज़ प्रकाशित हुए हैं, फ़्लाइट्स की लिस्ट और बाक़ी तस्वीरों से ज़ाहिर होता है, वह सिर्फ़ यौन भ्रष्टाचार का एक नेटवर्क नहीं बल्कि उस सिस्टम की वास्तवकि तस्वीर है जो कई दशकों से महिला अधिकार और आज़ादी के संरक्षक होने का दावेदार रहा है।
औरतों के झूठे हमदर्दः द्वीप में शैतान के ग़ुलाम
इस केस का सब से अहम पहलू औरतों के मामले में पश्चिम के "नैतिक नेतृत्व" का संपूर्ण रूप से अंत है। बरसों से, कथित राजनेता, मीडिया और मानवाधिकार के संगठन सरकारी प्लेटफ़ार्म से "औरतों की हालत" के सिलसिले में इस्लामी गणराज्य ईरान और दूसरे स्वाधीन मुल्कों की निंता करते रहे हैं। वही राजनेता जो एप्सटीन नेटवर्क से सहयोग और लेन देन कर रहे थे, वही मीडिया जिस ने इस मुक़दमे का या बाइकाट कर दिया या फिर उसे नज़रअंदाज़ कर दिया, वही धनवान, जिन के गंदे पैसों से मानवाधिकार संगठन क़ायम हुए, कई दशकों से "पीड़ित ईरानी महिला" को प्रोजेक्ट बनाकर उस का प्रचार कर रहे है। यह वही प्रोजेक्ट है जिस के नाम पर, ईरान में विद्रोह, अशांति और असुरक्षा को आख़िरी लक्ष्य के तौर पर हासिल किए जाने की कोशिश की जा रही है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, मानवाधिकर संगठनों की आड़ में काम करने वाले सुरक्षा विभागों से जुड़े संगठनों को भारी बजट दिया गया और आज़ादी का नुस्ख़ा उन थिंक टैंकों में तैयार किया गया जो मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉन्पलेक्स की सेवा में हैं। मीडिया को एक नरेटिव बनाने के लिए अपने कंट्रोल में लिया गया और हर उस आवाज़ को, जो इस जटिल झूठे और साज़िश के नेटवर्क के ख़िलाफ़ उठती है, फ़ौरन दबा दिया गया। झूठ, ख़ुफ़िया तौर पर गतिविधियां, साज़िश और लोगों को गुमराह करना, यह इन अपराधियों के शैतानी हथकंडे रहे हैं ताकि वे अपनी तमाम योजनाओं को व्यावहारिक कर सकें। एप्सटीन के द्वीप से लेकर तेहरान की सड़कों तक। इस्लामी इंक़ेलाब के नेता के लफ़्ज़ों में: "इस्लामी गणराज्य के दुश्मन बहुत जल्द समझ गए कि हार्डवेयर के रास्ते से इंक़ेलाब को शिकस्त नहीं दी जा सकती। वे साफ़्टवेयर के हथकंडे इस्तेमाल करने लगे। वे समझ गए कि जंग, बमबारी, फ़ितना फैलाने वाली फ़ोर्सेज़ और नस्लपरस्ती वग़ैरह से इस्लामी ईरान को वे तोड़ नहीं सकते, उसे झुका नहीं सकते। तो वे सॉफ़्ट हथकंडे इस्तेमाल करने लगे। सॉफ़्ट हथकंडे प्रोपैगंडा है, उकसाना है, झूठ बोलना है जो उन के नारों में पाया जाता है जिसे इंसान देखता है। नाम रखते हैं, औरत की रक्षा से जोड़ते हैं, महिला समाज की रक्षा के नाम पर, औरतों के एक गुट की रक्षा के नाम पर, एक औरत की रक्षा के नाम पर किसी मुल्क में उपद्रव करा देते हैं।"(1) यह रुसवाई पश्चिम वालों के दोग़ले रवैये को ज़ाहिर करने और पश्चिमी विद्वानों के नेतृत्व के अंत के लिए एक निर्णायक मोड़ है। जिस तरह से कि पूरे इतिहास में उन्होंने जंग, मुल्कों को बांटने, अशांति फैलाने और शोषण को "महिला की आज़ादी" के ख़ूबसूरत नारे की आड़ में फैलाया है।
इस बीच ज़ायोनी सरकार के सरग़नाओं और इस्राईली लाबियों के रोल की ओर से ग़ाफ़िल नहीं रहना चाहिए। एप्सटीन स्कैंडल और इस यौन रुसवाई के सार्वजनिक होने से बरसों पहले, "इंसान के अंगों की स्मगलिंग के मूल केन्द्र" के रूप में ज़ायोनी सरकार का नाम सामने आ चुका था।(2) और अब इस केस में ज़ायोनी शासन की नागरिकता वाले प्रभावी लोगों के नाम इस हद तक दोहराए जा रहे हैं कि शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रहतीः उस दस्तावेज़ों के तमाम पन्नों में, ज़ायोनी शासन के हितों की रक्षा के निशान देखे जा सकते हैं। ये सब कुछ ऐसी स्थिति में है कि इमाम ख़ामेनेई ने बरसों पहले इस बारे में सचेत किया थाः "दुनिया में बहुत तेज़ रफ़्तारी से बढ़ने वाला व्यापार, महिलाओं का व्यापार और उनकी स्मगलिंग है। इस सिलसिले में कुछ मुल्क बहुत बुरे हैं, जिस में ज़ायोनी सरकार भी है। औरतों और लड़कियों का काम दिलाने, शादी कराने और इसी तरह के दूसरे बहानों से ग़रीब और निर्धन मुल्कों से, लैटिन अमरीका से, एशिया के कुछ मुल्कों से, योरोप के कुछ ग़रीब मुल्कों से इकट्ठा करते हैं और उन्हें ले जाकर बहुत ही दयनीय स्थिति में उन केन्द्रों के हवाले कर देते हैं जिनकी कल्पना और उन के नाम से ही इंसान कांपने लगता है। ये सब कुछ इस ग़लत दृष्टिकोण का नतीजा है जो समाज में औरत के स्थान और मक़ाम के सिलसिले में क़ायम कर लिया गया है।"(3)
मुसलमान महिलाओं को नजात दिलाने की योजनाः एक लाइलाज बीमारी का सुरक्षा तंत्र
इस मसले की मनोवैज्ञानिक समीक्षा से एक बहुत ही गहरी हक़ीक़त से पर्दा उठता है। क्लिनिकल साइकॉलोजी में प्रोजेक्शन एक ऐसा रक्षात्मक मेकैनिज़म है जिस में इंसान अपने ऐब की वजह से पैदा होने वाली बेचैनी से बचने के लिए, अपने उस ऐब को दूसरे के सिर मढ़ने की कोशिश करता है और दूसरों में उस ऐब के ख़िलाफ़ जंग करता है। मानो मुसलमान औरत को आज़ाद कराने पर पश्चिम का इसरार, हक़ीक़त में ख़ुद अपनी नजात और अपनी बर्बाद हो चुकी पहचान को बहाल करने की पश्चिम की इच्छा है।
यह मानसिक उकसावा, इस सच्चाई को छिपाने का एक रक्षात्मक मेकैनिज़्म है कि पश्चिमी सिस्टम, अपनी सीमाओं में महिलाओं का सपोर्ट करने में अक्षम है। "पीड़ित मुसलमान औरत" की छवि को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया जाता है ताकि जनमत का ध्यान एप्सटीन द्पीव में बलि चढ़ने वाली अमरीकी महिला से हटा दी जाए। हक़ीक़त में वे मुसलमान औरतों की आज़ादी नहीं चाहते बल्कि वे अपनी अशांत अंतर्रात्मा को शांत करना चाहते हैं, ऐसा ज़मीर जो अपनी ही महिलाओं के ख़िलाफ़ किए गए अपराधों से उन्हें कचोके लगा रहा है।
ये विरोधाभास और साज़िशें किस चीज़ को बेनक़ाब करती हैं?
ऐसी स्थिति में, यह बात अच्छी तरह ज़ाहिर हो जाती है कि "महिलाओं के अधिकारों की रक्षा" उस घिनौने नेटवर्क का हिस्सा बनने के लिए कभी तैयार न होने वाले समाजों के ख़िलाफ़ नरेटिव की जंग में एक साम्राज्यवादी हथियार है। भला यह कैसे मुमकिन है कि जो लोग हमेशा ख़ुद को दूसरी क़ौमों की महिलाओं के बारे में चिंतित ज़ाहिर करने का हक़दार समझते थे, वे अपने ही समाजों में बच्चों की यौन दासता के नेटवर्क्स को बर्दाश्त करें और उन्हें चलाने वालों का साथ दें? जो लोग अपने मुल्क के बच्चों और महिलाओं को यौन अपराधों के नेटवर्क से बचाने में नाकाम रहे, वे अचानक मुसलमान महिलाओं को नजात दिलाने के लिए क्यों चिंतित हो गए? यह विरोधाभास एक वैचारिक सिस्टम की अस्लियत को बेनक़ाब करता है। पश्चिमी सिस्टम "धर्म पर आधारित नैतिकता" को किनारे रख कर उसकी जगह "मुनाफ़ा और अय्याशी के उसूल" को अपना कर, न सिर्फ़ यह कि महिलाओं की रक्षा की सलाहियत नहीं रखता बल्कि मजबूरन यौन शोषण का सबसे बड़ा कार्टेल बन गया है। जब 'आज़ादी' धनवानों की कभी न ख़त्म होने वाली अय्याशी और वासना का हथकंडा बन जाए तो उसी सिस्टम के हाशिये पर बेहसारा लड़कियां उपभोग का हिस्सा बन जाती हैं। ऐसा सिस्टम, मुसलमान ईरानी महिलाओं के लिए, जो पाकीज़ा शरीअत और अल्लाह के क़ानून के सुरक्षित दायरे में ज़िंदगी गुज़ार रही हैं, किस तरह से कोई नुस्ख़ा पेश कर सकता है? नैतिक नेतृत्व करना उसका हक़ है जो कमज़ोर की रक्षा कर सके, उस का नहीं जो निजी द्वीप में सब से कमज़ोर लोगों को अपनी हैवानी इच्छाओं का शिकार बना दे।
लेखिकाः ज़हरा शाफ़ई
सांस्कृतिक मामलों की रिसर्च स्कॉलर