दुश्मन के हमले की स्थिति में ईरान की रणनीति क्या होगी?
सदाए ईरान अख़बार के संपादकीय में इस सवाल का जवाब पेश है।
दुश्मन पूरी ताक़त के साथ मैदान में आ गया है; क्षेत्र में सैन्य उपकरण भेजने से लेकर धमकियों और राजनीतिक बड़बोलेपन तक, और शायद इन सबसे व्यापक और जटिल मनोवैज्ञानिक और मीडिया युद्ध का अथक और व्यापक हमला है। तरीक़े और रणनीतियाँ अलग-अलग हैं और एक-दूसरे को कवर करती हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है; साम्राज्यवादी नीतियों को थोपना और ईरान को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करना। वही चीज़ जिसका अमरीकी राष्ट्रपति ने 12-दिवसीय युद्ध के बीच 'टोटल सरेंडर' का नाम लेकर घोषित किया था और उसका सपना देखा था, लेकिन अंत में हमारे देश की आर्म्ड फ़ोर्सेज़ के साहसिक प्रतिरोध और ईरानियों के राष्ट्रीय प्रतिरोध और एकजुटता के कारण, दुश्मन को पीछे हटना पड़ा और लड़ाई रुक गयी।
अब एक बार फिर दुश्मन लालची हो गया है और उसे लगता है कि वह धमकी और डराने-धमकाने और शायद सैन्य हमले से अपनी पिछली विफलता की भरपाई कर सकता है और अपने बुरे सपनों को साकार कर सकता है।
इस्लामी गणराज्य ईरान ने बार-बार और स्पष्ट रूप से कहा है कि वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अगर दुश्मन एक बार फिर इस विकल्प को लागू करना चाहता है, तो ईरान युद्ध से भागेगा नहीं और हर स्थिति के लिए तैयार है। हमने अब तक दुश्मन की शरारतों और आक्रमणों के जवाब में संयम का एक स्तर दिखाया है, लेकिन इस बार मामला अलग होगा और एक क्षेत्रीय युद्ध हमलावरों और उनके समर्थकों और मेज़बानों के इंतेज़ार में होगा। ऐसे युद्ध में, पिछली लाल रेखाएं गंभीर रूप से बदल जाएंगी और युद्ध का मैदान पहले से कहीं अधिक व्यापक होगा। लक्ष्यों का दायरा विस्तृत होगा और अगर ईरान की सरज़मीन और ईरानियों की जान अमरीकी शरारत और हमले की ज़द पर होनी है, तो अमरीकियों के हित और जानें भी कहीं भी सुरक्षित नहीं रहेंगी।
12-दिवसीय जंग में, क्षेत्र में ईरान के समर्थक मैदान में नहीं उतरे और इस्लामी गणराज्य ने अकेले ही ज़ायोनी और अमरीकी हमलावरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की, लेकिन अगले संभावित युद्ध में, यह समीकरण बदल जाएगा और दुश्मन का सामना युद्ध के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न और विविध मोर्चों से होगा।
अमरीकी राष्ट्रपति घरेलू स्तर पर विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और ईरान के साथ युद्ध की आग भड़काने से उनकी आज की परेशानी विस्फोटक रूप से बढ़ जाएगी और वह अपमानजनक हार में बदल जाएगी। ट्रम्प, अगर ऐसा सोचते हैं, जैसा कि कुछ अमरीकी मीडिया का कहना है कि वे एक सीमित हमले के साथ बातचीत की मेज़ पर दबाव डाल सकते हैं और ईरान को अपनी लाल रेखाओं और राष्ट्रीय हितों से पीछे हटने के लिए मजबूर कर सकते हैं, तो वे कैलकुलेशन में गंभीर ग़लती कर रहे हैं और इस ग़लती की उन्हें भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी।
ऐसी लड़ाई में, ईरान ज़ायोनी शासन और अमरीका को अलग-अलग नहीं मानता है और इस बार यह शासन पिछले अनुभव से भी अधिक कठोर रूप से ईरान के करारे थप्पड़ का मज़ा चखेगा।
पवित्र रमज़ान का महीना, हज़रत अली (अ) का महीना है। वही कमांडर जिन्होंने फ़रमाया; "अगर पहाड़ हिल जाएं, तो तुम स्थिर रहो। दांतों को भींच लो और अपने सिर को अल्लाह को सौंप दो और पैरों को ज़मीन में कील की तरह मज़बूती से गाड़ दो और जंग के मैदान के आख़िरी छोर पर निगाह रखो और भयानक दृश्यों को अनदेखा कर दो और जान लो कि विजय, पाक व पाकीज़ा अल्लाह का वादा है।"
इस में कोई आश्चर्य की बात नहीं अगर ईरान के दुश्मन इन निर्देशों को समझने में असमर्थ हैं, जिन में ईरान की ज़ुल्फ़िक़ारी सेना की भावना ढली हुयी है।