स्पीचः

बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम

अरबी ख़ुतबे का अनुवादः सारी तारीफ़ पूरी कायनात के मालिक के लिए, दुरूद व सलाम हो हमारे सरदार व रसूल हज़रत अबुल क़ासिम मुस्तफ़ा मोहम्मद और उनकी सबसे पाक, सबसे पाकीज़ा, सबसे चुनी हुयी नस्ल और ख़ास तौर पर ज़मीनों पर अल्लाह के ज़रिए बाक़ी रखी गई हस्ती पर।

अगर वक़्त गुज़र न गया होता तो मैं चाहता था कि जिन साहब का आपने नाम लिया और इसी तरह कुछ दूसरे लोगों से जो इस महफ़िल में मौजूद हैं और मैं उनके कोमल ज़ौक़ और उनकी ठोस तथा अर्थ से भरपूर शायरी से वाक़िफ़ हूं, फ़ायदा उठाता। लेकिन वक़्त गुज़र चुका है और इंसान जब थक जाए, आप तो अभी जवान हैं, इतनी जल्दी नहीं थकेंगे लेकिन हमारी उम्र में इंसान जल्दी थक जाता है, जब थका हो तो शेर से उस तरह लुत्फ़ नहीं ले पाता जिस तरह होना चाहिए।

अलहम्दो लिल्लाह इंक़ेलाबी और मज़हबी ज़िम्मेदारी के एहसास पर आधारित शायरी तरक़्क़ी कर रही है। आज की रात मेरे लिए ख़ुशख़बरी वाली थी। जो शेर यहाँ पढ़े गए, आम तौर पर बहुत अच्छे शेर थे। अलबत्ता सभी शेर एक स्तर के नहीं थे। कुछ बेहतर थे, कुछ अच्छे। शेर पढ़ने के अंदाज़ और शायरी के बिन्दुओं पर ध्यान से पता चलता है कि ये शेर, शायरी की शुरूआत में कहे जाने वाले शेर नहीं हैं बल्कि शायर के दिल की आवाज़ हैं और उनका स्रोत शायर का दिल है।

यानी अलहम्दो लिल्लाह मुल्क में मंझे हुए शायरों की तादाद में दिन ब दिन इज़ाफ़ा हो रहा है। अलबत्ता मुझे रिपोर्ट दी है कि जारी ईरानी साल में, संबंधित सेंटरों की ओर से अंजाम पाने वाले टेस्ट में इंक़ेलाबी और मज़हबी ज़िम्मेदारी के एहसास वाली शायरी करने वाले शायर बहुत कामयाब रहे हैं।

शायरी को बढ़ावा मिलने की यह लहर ख़ास तौर पर नौजवानों में, बहुत आशाजनक है। शायरी अहम है, शायरी एक बेमिसाल आर्ट है। मुख़्तलिफ़ तरह के मीडिया साधन, शायरी की प्रभावी प्रचारिक हैसियत और उसके असर को कम नहीं कर सके। शायरी हक़ीक़त में प्रचार का एक प्रभावी ज़रिया है। इसलिए शायरी में जितनी तरक़्क़ी हो और अच्छे शायरों की तादाद जितनी बढ़े, उतनी ही अच्छी बात है।

अंजुमनें काफ़ी तादाद में हो गयी हैं जो बहुत अच्छी बात है, हमें उम्मीद है कि क्वालिटी भी उसी लेहाज़ से बेहतर होगी। इस वक़्त हमारे अच्छे नौजवान शायरों की क्वालिटी की तुलना में क्वांटिटी ज़्यादा है लेकिन मैं जो सलाहियत उनमें देख रहा हूं, अगर मेहनत करें और आगे बढ़ें तो उनके शेरों का स्टैंडर्ड भी बहुत अच्छा हो जाएगा। हमारे यहाँ अच्छे शायरों की अलहम्दो लिल्लाह कमी नहीं है। यानी अच्छे और बड़े शायर जिनसे हमें अपेक्षा थी कि ऊपर जाएंगे, वे ऊपर गए हैं और अलहम्दो लिल्लाह हमारे शायरों में इंक़ेलाबी और मज़हबी ज़िम्मेदारी के एहसास वाली शायरी करने वाले कम नहीं हैं। लेकिन मैंने बारंबार कहा है और बारंबार ताकीद की है कि कोई भी चाहे शायरी हो या कोई और मैदान, अपने भीतर तरक़्क़ी देखकर उस पर संतुष्ट न हो जाए। आप अगर देखें कि आपके शेर अच्छे हो गए हैं, आपकी क्षमता निखर गयी और आपका काम बेहतरीन हो गया है, तो उस पर संतुष्ट न हो जाएं। क्योंकि आप अब भी हाफ़िज़ से दूर हैं, सादी से दूर हैं और नेज़ामी से काफ़ी फ़ासले पर हैं। मैं समझता हूं कि हमारा दौर सादी पैदा कर सकता है।

यह लंबी बहस है कि वे तत्व क्या हैं जो शायर को शायर बनाते हैं और उसके भीतर यह क्षमता पैदा करते हैं कि लफ़्ज़ उसके सामने हाथ बांधे खड़े रहें और वह सही संयुक्त शब्द और शब्दावली का चयन करे। इस सिलसिले में, मैं बात नहीं करना चाहता। बहरहाल यह दौर, शायरों का हौसला बढ़ाने का दौर है। इसमें और इस बात में कोई विरोधाभास नहीं है कि शायरों ने हर दौर में शिकवे किए हैं। हमेशा यही रहा है। ईरान में शायरी शुरू होने के बाद से ही यानी हज़ार बरस से कुछ पहले से, हर दौर में शायरों ने हमेशा गिला किया। आप हमारे बड़े शायरों को देखें, बादशाहों के दरबार में इतनी आवभगत थी और इस तरह पैसे लेकर प्रशंसा करते थेः

मैंने सुना है कि चांदी की देग बनायी है

उंसुरी के लिए सोने का संगीत वाद्य बनाया है (2)

इसके बावजूद वे गिला शिकवा करते थे और हमेशा ज़िंदगी से गिला रहता था। यह चीज़ है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता और यह ख़त्म नहीं होगा। इसकी वजह यह है कि ज़िंदगी की परेशानियां और मसले ख़त्म नहीं होते। अलबत्ता दूसरे उन्हें नहीं देखते, शायर उन्हें देखता है। दूसरों में बयान करने वाली ज़बान नहीं होती, शायर के पास यह ज़बान होती है। वजह यह है। इसमें कोई हरज भी नहीं है। लेकिन शायरों के साथ सामाजिक सुलूक, मेरी मुराद भौतिक मसले नहीं हैं, इस हैसियत से कि वे शायर हैं, महान कलाकार हैं, उनका सम्मान होता है।

हमने तानाशाही के दौर में बड़े शायरों को देखा है जो वाक़ई बड़े शायर थे, लेकिन कोई उन्हें अहमियत नहीं देता था। मिसाल के तौर पर अमीर फ़ीरूज़कूही बहुत बड़े शायर थे। मेरी नज़र में अपने दौर में ग़ज़ल के सबसे अच्छे शायर थे लेकिन उन पर कोई ध्यान नहीं देता था, लोग उनसे कोई सरोकार ही नहीं रखते थे। वे सड़क पर, अपने घर की सड़क पर चलते थे, कोई उन्हें सलाम तक नहीं करता था, उन्हें कभी भी किसी टीवी या रेडियो प्रोग्राम में नहीं बुलाया गया। अलबत्ता उस ज़माने में इस चीज़ का रवाज भी नहीं था। यहाँ तक कि प्रिंट मीडिया में भी उन्हें और उन जैसे लोगों को नहीं बुलाया जाता था। सिर्फ़ यह होता था कि अगर किसी अख़बार में जगह ख़ाली रह जाती थी तो पेज भरने के लिए रही की कोई ग़ज़ल या कभी अमीरी या किसी और शायर की कोई ग़ज़ल छाप दिया करते थे। उन पर कोई ध्यान नहीं देता था। आज शायर टीवी पर, रेडियो पर मुख़्तलिफ़ प्रोग्रामों में शिरकत करते हैं। इसलिए आज सादी बनने का रास्ता समतल है। नेज़ामी बनने के लिए लिए मैदान समतल है। आगे बढ़ा जा सकता है। ख़ास तौर पर आज हमारे शायरों ने जो ज़बान तलाश की है वह बेमिसाल है। यानी जो शेर आपने यहाँ सुनाए, उनकी ज़बान बेमिसाल है। यह इंक़ेलाब के दौर की ज़बान है। इसकी तारीफ़ क्या है, इस पर काम और सोच विचार की ज़रूरत है। अलबत्ता कुछ लोगों ने इस सिलसिले में काम किया है लेकिन मेरे लिए ज़्यादा स्पष्ट और रौशन नहीं है, फिर भी ज़बान नई है। न ख़ुरासान की पुरानी शायरी की ज़बान है और न ही इराक़ी ग़ज़लों की ज़बान है और न ही ‘सब्के हिंदी’ की ग़ज़लों की ज़बान है। इनमें से हर एक की कुछ बातें हैं और कुछ बातें बिल्कुल नई हैं जो आज की शायरी से मख़सूस हैं। यह अपने आप में एक अहम बात है जो हमारे दौर की ऊंची चोटियां फ़र्ज़ की जा सकती हैं। इंशाअल्लाह यह काम होना चाहिए।

शायर के अंतर्मन की उसके शेरों पर छाप होती है। इसलिए कि आप जो कहते हैं वह आपके भीतर से उबलता है। आपका अंतर्मन जितना पाक और साफ़ होगा, आपकी शायरी भी उतनी ही पाकीज़ा और साफ़ होगी। इस पर ज़रूर ध्यान होना चाहिए। इसके नमूने हमने देखे हैं, अपने ख़ास एहसास और जज़्बात के साथ शायरी करने वालों के शेरो में उनके कोमल ज़ौक़ और जज़्बात महसूस किए जा सकते हैं। इसलिए जहाँ तक हो सके, तक़वा, शरीअत सहित मज़हबी शिक्षाओं पर पाबंदी करें और अपनी सोच को ज़्यादा इस्तेमाल करें। यही वजह है कि आप क़ुरआन मजीद के सूरए शोअरा के आख़िर में देखते हैं कि कहा जाता है कि "सिवाए उनके जो ईमान लाए और नेक अमल किए और बकसरत अल्लाह का ज़िक्र किया...।" (3) (सूरए शोअरा, आयत-227) "बकसरत अल्लाह का ज़िक्र किया" क्यों? सभी को ज़्यादा ज़िक्र करना चाहिए। लेकिन ख़ुसूसियत के साथ शायर के लिए कहा जाता है कि "बकसरत अल्लाह का ज़िक्र किया" तो ज़ाहिर है कि शायर को इस ज़्यादा ज़िक्र की ज़रूरत है। यानी उसे अल्लाह को ज़्यादा याद करना चाहिए।

मेरी एक गुज़ारिश यह है कि फ़ारसी साहित्य के ख़ज़ाने से ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाया जाए। हमने कहा कि हमारी शायरी की शैली, सादी की शायरी की शैली से अलग है, लेकिन सादी की शायरी, कला का एक विशाल भंडार है, उसके बाद हाफ़िज़ और कुछ दूसरे शायर भी इसी तरह हैं। सचमुच उनके जैसे नज़र नहीं आते। उनकी शायरी, शायरी की कला के लेहाज़ से उत्कृष्ट है। उनकी शायरी के एक एक हिस्से और एक एक तत्व में ऐसे बिन्दु मौजूद हैं जिनसे फ़ायदा उठाया जा सकता है। आप जो अच्छी पसंद रखते हैं, आप नौजवान हैं, आप कुछ ऐसी बातें भी देखते हैं जो हम जैसे लोग नहीं देखते, आप बहुत सी बातों से बहुत अच्छी तरह फ़ायदा उठा सकते हैं। गुज़ारिश है कि उनसे फ़ायदा उठाया जाए।

एक और बिन्दु आशेक़ाना शायरी और आशेक़ाना ग़ज़ल के बारे में है। कभी कभी मैं इस महफ़िल में देखता हूं, पिछले बरसों में भी ऐसा ही था कि जैसे आशेक़ाना ग़ज़ल जुर्म है या नकारात्मक चीज़ है। जी नहीं, बहरहाल शायर के भीतर ऐसे एहसास पैदा होते हैं जो मोहब्बत और इश्क़ को बयान करते हैं, इसमें कोई बुराई नहीं है। इसलिए आशेक़ाना शायरी में कोई हरज नहीं है। आला और पाकीज़ा अर्थ के लिए कहे जाने वाले शेरों के साथ आशेक़ाना शेर भी कहे जाएं। इसमें कोई हरज नहीं है। लेकिन अहम बात यह है कि पारंपरिक फ़ारसी शायरी में आशेक़ाना शेर में हमेशा चरित्रता और शराफ़त को मद्देनज़र रखा गया है, इसलिए हमारा कहना सिर्फ़ यह है कि आशेक़ाना शायरी इन सीमाओं में ही रहें। आशेक़ाना शायरी में बेपर्दगी, नग्नता और बेहयाई ठीक नहीं है। सरकश (शाही) शासन के दौर में शायरों में कुछ ऐसे थे जो जान बूझकर यह काम करते थे। एक बार मैंने उनके नाम लिए हैं, दोबारा नहीं लेना चाहता, लेकिन चरित्रता और शराफ़त वग़ैरह के पहलुओं को निशाना बनाने वाली बातों की ओर कोई इशारा किए बिना अच्छे आशेक़ाना शेर कहे जा सकते हैं। यह एक अहम बिन्दु है जिसका ज़िक्र ज़रूरी था।

एक और बात यह है कि किस तरह से नए विचारों को पेश किया जाए। हालाँकि जो शेर यहाँ पढ़े गए, वे बहुत अच्छे विषयों पर आधारित थे और उनमें यह बात दिखाई देती है कि नए विचारों को कैसे पेश किया गया है और किस अंदाज़ में बयान किया गया है। एक ही बात को कई तरीक़ों से कहा जा सकता है। आप उसी बात को, जिसे आपसे पहले सौ शायर कह चुके हैं, नए अंदाज़ में कह सकते हैं,

 

येक उम्र मी तवान सुख़न अज़ ज़ुल्फ़े यार गुफ़्त

(एक उम्र तक यार की ज़ुल्फ़ों पर बात की जा सकती है।)(4)

आप नई शैली और नए ढांचे में उसे बयान कर सकते हैं। यह मज़मून-आफ़रीनी (विषय-विस्तार) है। सब्के हिंदी शैली(5) की शायरी में विषयों की गहराई होती है। हालाँकि सब्के हिंदी की शायरी में जो विशेषताएँ हैं, ऐसा नहीं है कि वे अन्य शैलियों की शायरी में नहीं मिलतीं लेकिन वे उस तरह नहीं हैं जिस अंदाज़ में सब्के हिंदी की शायरी में उन्हें प्रस्तुत किया गया है।

शादम के अज़ रक़ीबान, दामन कशान गुज़श्ती

(मैं खुश हूँ कि तू रक़ीबों से दामन बचाकर गुज़र गया)

गो मुश्ते-ख़ाके मा हम बर्बाद रफ़्ते बाशद

(चाहे हमारी मुट्ठी भर ख़ाक भी हवा में उड़ गई हो।)(6)

 

क्या यह बात पहले किसी ने नहीं कही? क्यों नहीं, इस विचार के शायद दस शेर मिल सकते हैं लेकिन कहने का यह तरीक़ा कि "दामन कशान गुज़श्ती" (तू दामन बचाकर गुज़र गया) मज़मून-आफ़रीनी है। साएब की शायरी में ऐसे असाधारण विचार बहुत मिलते हैं। उनके शेर शुरू से लेकर आख़िर तक इसी तरह के हैं। साएब के अनुयायी शायरों, जैसे हज़ीन लाहीजी वगैरा में भी यह बात पाई जाती है और इसका चरम बेदिल की शायरी में देखने को मिलता है। बेदिल की शायरी काफ़ी कठिन है और मेरी नज़र में यह ज़रूरी भी नहीं कि हम भी उनकी तरह ऐसी मज़मून-आफ़रीनी करें जिसे समझाने और विस्तार से बयान करने की ज़रूरत पड़ जाए। अलबत्ता बहरहाल बेदिल का दर्जा बहुत ऊँचा है और वे शायरी में भी, शब्दों के चयन में भी और बात को सुंदर ढंग से कहने में भी, बेजोड़ हैं लेकिन बहुत ज़रूरी नहीं है कि उन्हीं की तरह की शायरी की जाए मगर मज़मून-आफ़रीनी हर हाल में ज़रूरी है। अच्छी भाषा और उचित शब्दों का इस्तेमाल ज़रूरी है। बाज़ारू भाषा, ख़ास तौर पर निचले स्तर की प्रचलित बोली से बचना ज़रूरी है। अगर इन बिंदुओं पर ध्यान दिया जाए तो शायरी का स्तर ऊपर उठेगा, शेर बहुत ऊंचे हो जाएँगे। मैंने यहाँ नोट किया है कि "कोमल और नाज़ुक शायराना भावनाओं के साथ शिक्षाप्रद विचार और मीठी व सरल भाषा" अगर ये तीनों गुण हों, तो शेर वास्तव में उच्च स्तर का हो जाएगा।

एक और अहम बात हमारे समय के विचारों और भावनाओं से संबंधित है। मेरी नज़र में प्रेरणादायक और उत्साह बढ़ाने वाले जितने अहम सामाजिक विचार आज मौजूद हैं, वे बहुत कम युगों में देखे गए हैं। आप देख सकते हैं कि इसी आज की महफ़िल में शहीद सुलैमानी की बात की गई, शहीद रईसी की बात आई और शहीद सिनवार व शहीद नसरुल्लाह का ज़िक्र हुआ। निश्चित रूप से यहां मौजूद कई सम्मानीय लोग भी इस बात का इंतेज़ार कर रहे थे कि इनका उल्लेख किया जाए या शायद कुछ लोग इन्हीं पर शेर कह रहे हैं। निस्संदेह ऐसा ही है, क्योंकि मैंने जनाब मलिकियान(7) और कुछ दूसरे दोस्तों से इस सिलसिले में बहुत अच्छे शेर सुने हैं। ये बहुत अहम विषय हैं। ये वास्तव में उन विचारों को जीवित रखने वाले मुद्दे हैं जिन्हें मन में बाक़ी रहना चाहिए। यह इस दौर का काम है। मेरी नज़र में यह भी ज़रूरी है।

इसी तरह शायरी में तौहीदी, दीनी और हिकमत भरे विचार भी ज़रूरी हैं। मैंने जो एक दोस्त के शेरों के बारे में कहा कि वे वाक़ई हिकमत भरे थे तो यह हक़ीक़त है। कुछ अल्फ़ाज़ और विचार जो शायरी में बयान किए जा रहे हैं, वे बहुत ऊँचे दर्जे के हिकमत भरे विचार हैं। ये बातें बहुत अहम हैं। इनकी कोशिश करनी चाहिए। हाँ, इनके सुनने और समझने वाले कम होंगे क्योंकि हर कोई इन विचारों को नहीं समझता।

गुफ्तम ज़े कुजाई तू, तसख़र ज़द व गुफ़्ता मन

(मैंने पूछा कि तू कहां का है, उसने हंसी उड़ाते हुए कहा कि मैं)

नीमी अम ज़े तुर्किस्तान, नीमी ज़े फरग़ाने

(आधा तुर्किस्तान का और आधा फ़रग़ाना का हूं)(8)

इस बात को बहुत से लोग नहीं समझेंगे कि वह क्या कहना चाहता है। यह जो मस्ती वह बयान करता है:

ऐ लूली बर्बत ज़न, तू मस्त तरी या मन?

(ऐ वीना बजाने वाली लकड़ी, तू ज़्यादा मस्त है या मैं)

ऐ पेश चू तू मस्ती, अफ़्सून-ए मन अफ़्साने

(तेरे सामने तो मेरा जादू एक अफ़साने भर है)(9)

इसको ज़्यादातर लोग नहीं समझेंगे कि इसका क्या मतलब है लेकिन ये विचार पाया जाता है, इसके चाहने वाले भी हैं और इसे समझने वाले भी हैं। कुछ लोग हैं जो इन विचारों को समझते हैं। अगर कोशिश की जाए तो इसके अच्छे आडियंस मिल सकते हैं।

इस बारे में टीवी की मदद लेने के तरीक़े के बारे में भी मेरी एक राय है, अलबत्ता यह निजी राय है और मैं इस बारे में कोई आदेश देना या रोकना नहीं चाहता।

अगर हम टीवी पर नियमित रूप से, हर हफ्ते, एक घंटे का कार्यक्रम प्रसारित करें और उसमें अपने स्तर के मुताबिक़ अच्छे और योग्य शायर को बुलाएँ ताकि दर्शक उस युवा शायर को सुनें, उसके शेरों को सुनें, उसके बारे में बात करें, चर्चा करें तो इससे उस शायर का स्तर गिर जाएगा। टीवी पर शायर का इस तरह इस्तेमाल सही तरीक़ा नहीं है। इससे सभी लोग फ़ायदा नहीं उठा पाएंगे। मुझे डर है कि इस तरह के कार्यक्रम शायरी को बाज़ारी बना देंगे, उस अच्छे शायर को भी मामूली बना देंगे। कविताएँ निश्चित रूप से टीवी और रेडियो पर पढ़ी जाएं लेकिन एक अच्छे और विशेष तरीक़े से। कोई अच्छी नज़्म या ग़ज़ल एक प्रभावी भूमिका के साथ एक अच्छा एंकर पढ़े। जैसे वह बताए कि एक शायर ऐसा है जिसकी ये विशेषताएँ हैं और उसने इस विषय पर शेर कहें हैं, फिर उस शायर को पूरे सम्मान के साथ बुलाया जाए और वह अपने शेर सुनाए। यह तरीक़ा बहुत अच्छा होगा लेकिन उस तरह जैसा कि मैंने अभी कहा, मेरी नज़र में शायरी का स्तर गिरेगा। वैसे भी इसके बहुत अधिक समर्थक नहीं होंगे। यानी आम जनता इस तरह के शायरी के कार्यक्रमों को ज़्यादा पसंद नहीं करती। बहरहाल उम्मीद है कि इस विषय में सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाएगा।

एक दोस्त ने आज रात के बारे में मुझे एक सलाह दी है, बहुत अच्छे बिंदु की याद दिलाई है और वह यह है कि अतीत में हमारी शायरी की जो पारंपरिक किताब हुआ करती थी उसमें सबसे पहले तौहीद और हम्द का बयान होता था। “अव्वले दफ़्तर बे नामे ईज़दे दाना” (किताब का पहला हिस्सा ज्ञानी अल्लाह के नाम)(10) यहां तक कि मौलाना रोम भी, जो ख़ुदा का नाम नहीं लेते हैं, वे भी असल में एक आध्यात्मिक और हमेशा के संबंध को बयान करते हैं, और वह संबंध भी ख़ुदा से है, वह भी आध्यात्मिकता है, वह भी मारेफ़त है।(11) मेरी नज़र में अगर इस बात का ध्यान रखा जाए तो यह बहुत अच्छा होगा। यानी जब आप अपने काव्य संग्रह को प्रकाशित करें तो उसकी शुरुआत में मारेफ़त के शेर हों, तौहीद और हम्द के शेर हों। इंशा अल्लाह, ख़ुदा आप सबको कामयाबी प्रदान करे।

आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत और बरकत हो।

1.   इस महफ़िल की शुरुआत में कुछ शायरों ने अपने शेर सुनाए।

2.   ख़ाक़ानी, दीवाने शायरी

3.   सूरए शोअरा, आयत 227

4.   साएब तबरेज़ी, दीवाने शायरी

5.   फ़ारसी साहित्य में शेर की एक शैली जो नवीं शताब्दी हिजरी से वुजूद में आई। भारत के साहित्य प्रेमी दरबार में फ़ारसी शायरों की आव भगत और ईरान के सफ़वी शासकों द्वारा शायरों की क़द्र न किए जाने की वजह से बहुत से ईरानी शायर भारत चले गए जहां फ़ारसी शायरी की एक नई शैली वुजूद में आई।

6.   हज़ीन लाहीजी, दीवाने शायरी

7.   जनाव मुहम्मद हुसैन मलेकियान

8.   मौलाना रोम, दीवाने शम्स

9.   मौलाना रोम, दीवाने शम्स

10.  सादी शीराज़ी, दीवाने शायरी

11.  मौलाना रोम, मसनवी, दफ़्तरे अव्वल