अल्लाह के नाम से जो बहुत मेहरबान और रहम करने वाला है

सारी तारीफ़ उस परवरदिगार के लिए जो पूरी सृष्टि का मालिक है, सलाम हो हमारे सरदार हज़रत मोहम्मद और उनके पाक अहलेबैत (घर वालों ) पर और अल्लाह की लानत हो उनके दुश्मनों पर।

सलाम और अल्लाह की रहमत व बरकत हो आप पर हे मूसा बिन जाफ़र (अ.स) की बेटी फ़ातेमा मासूमा।

क़ुम के अवाम की सभा हमारे लिए हमेशा से एक अच्छा अनुभव रहा है। दो साल से हमें यह मौक़ा नहीं मिल पा रहा था। आज आप लोगों से फिर से मुलाक़ात हो रही है। हमर क़ुम के प्रिय अवाम की सेवा में सलाम पेश करते हैं और अपनी मोहब्बत का इज़हार करते हैं।

आज की बात 19 देय सन 1356 हिजरी शमसी (बराबर 9 जनवरी सन 1978) की अहम ऐतिहासिक घटना के बारे में है। कुछ ऐतिहासिक घटनाओं को जिनमें गहरे अर्थ और अगली नस्ल के लिए उच्च संदेश  हैं, हमेशा ज़िंदा रखना चाहिए। उनके बारे में बात होनी चाहिए, गुफ़्तगू होनी चाहिए। इन महाघटनाओं को समय की धूल के नीचे दबने नहीं देना चाहिए। ऐसी ही घटनाओं में 9 जनवरी की घटना है। अलबत्ता जब हम 9 जनवरी की घटना के बारे में बात करते हैं तो इसका मतलब सिर्फ़ यह घटना नहीं बल्कि इसकी वजह से वजूद में आने वाली दूसरी घटनाएं भी हैं। यह घटना एक दूसरे से जुड़ी लगातार कई घटनाओं के वजूद में आने का कारण बनी और फिर यही आंदोलन इस्लामी क्रांति की सफलता के रूप में सामने आया। यानी यह एक दो दिन के भीतर हुयी सीमित घटना के बारे में बात नहीं हो रही है। इस घटना को एक बड़े बदलाव के स्रोत की हैसियत से देखना चाहिए। यह घटना और इसका गहरा असर, अवाम की गहरी आस्था की निशानी है। इसी बात पर हम ज़ोर देते हैं, ताकीद करते हैं। यह इस्लामी क्रांति के स्पष्ट बुनियादी उसूलों में है, लेकिन जिन लोगों के दिल में क्रांति से द्वेष पाया जाता है, उनका प्रोपैगंडा धीरे-धीरे इस बात का कारण बनता है कि क्रांति के स्पष्ट बुनियादी उसूलों के बारे में भी लोग शक करने लगें। मैं ज़ोर देकर कहता हूं कि क़ुम में 9 जनवरी की घटना और इसके नतीजे में सामने आने वाली बातें, अवाम की गहरी आस्था को बयान करती हैं। इस घटना का एक वरिष्ठ धर्मगुरू से संबंध है, एक वरिष्ठ धर्मगुरू ने इस घटना को वजूद दिया यानी अगर इस घटना के केन्द्र में इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह एक वरिष्ठ धर्मगुरु, एक धार्मिक नेता व संघर्षरत धर्मगुरू की हैसियत से मौजूद न होते तो इस तरह की घटना का कोई ख़ास नतीजा सामने नहीं आता। कोई भी दूसरा शख़्स, कोई भी दूसरा धड़ा ऐसा काम नहीं कर सकता था और ऐसी पोज़ीशन में नहीं हो सकता था कि एक क़ौम को, एक शहर को, फिर एक दूसरे शहर को और इसी तरह दूसरे शहरों को और आख़िर में पूरी एक क़ौम को इस तरह उठ कर खड़ा कर दे। आप जानते हैं कि ज़ालिम शाही शासन अनेक राजनैतिक धड़ों के सैकड़ों अहम लोगों और शख़्सियतों में, जो संघर्ष भी कर रही थीं, कुछ को या ज़्यादातर को, चाहे वे दक्षिणपंथी धड़े की हों, वामपंथी धड़े की हों, मार्क्सवादी हों या किसी और नज़रिये की हों, धमकियां दी गयीं, जेलों में डाला गया, तकलीफ़ें दी गयीं, मौत की सज़ा दी गयी, बेइज़्ज़ती की गयी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। यानी अवाम के सामाजिक माहौल पर कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ा, कोई असर नहीं हुआ, लेकिन इमाम ख़ुमैनी के ख़िलाफ़ अख़बार में कुछ लाइनें लिख दी गयीं तो क़ौम में यह महाघटना घटी। इसका मतलब यह है कि इस घटना का वरिष्ठ धर्मगुरू, धर्मगुरू, धर्म और धार्मिक मामलों से संबंध है।

मैं आपको बताना चाहता हूं कि हमारे देश में पिछले 150 बरसों में घटने वाली ज़्यादातर घटनाएं, इसी तरह की हैं। ऐतिहासिक घटनाएं, सामाजिक घटनाएं और ऐसी घटनाएं जिनमें अवाम मैदान में आ गए और उन्होंने किसी बड़े काम को अंजाम दिया और उसे नतीजे तक पहुंचाया, ऐसी सभी घटनाओं में, जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, किसी वरिष्ठ धर्मगुरु, एक धर्मगुरु और एक बहादुर, संघर्षशील और राजनीति की समझ रखने वाले धर्मगुरु का रोल नज़र आता है। मिसाल के तौर पर तंबाकू के मसले में मीरज़ाए शीराज़ी हैं, संवैधानिक क्रांति के मामले में नजफ़ के वरिष्ठ धर्मगुरु हैं, तेहरान, तबरेज़, इस्फ़हान और दूसरी जगहों के बड़े धर्मगुरु हैं। गौहरशाद मस्जिद की अहम घटना में स्वर्गीय जनाब हुसैन क़ुम्मी रिज़वानुल्लाह अलैह और मशहद के धर्मगुरु हैं। 30 तीर (21 जुलाई) की घटना में स्वर्गीय आयतुल्लाह काशानी हैं। 15 ख़ुर्दाद सन 1342 हिजरी शमसी (बराबर 5 जून सन 1963) की घटना में इमाम ख़ुमैनी सहित कुछ दूसरे धर्मगुरु हैं। एक बहादुर, संघर्षशील और राजनीति की समझ रखने वाले धर्मगुरु इन सभी घटनाओं में मौजूद हैं और यह उनकी मौजूदगी ही है जो अवाम के उठ खड़े होने की बुनियादी वजह है। हाँ मुमकिन है कि कोई शख़्स, कोई रुसूख़दार  इंसान, किसी जगह कुछ लोगों को रिएक्शन दिखाने पर तैयार कर ले, लेकिन अवाम का महाआंदोलन, उन्हें हरकत में लाना, इस महासागर में लहर पैदा करना, सिर्फ़ एक धर्मगुरु के बस की बात है, सिर्फ़ एक वरिष्ठ धर्मगुरु ही कर सकता है और यहीं से धर्मगुरुओं, राजनीति की समझ रखने वाले विद्वानों, राजनीति की समझ पैदा करने वाले धर्म व धर्मशास्त्र और राजनीति के विद्वानों से विश्व साम्राज्य की दुश्मनी की वजह भी समझ में आती है। क्योंकि उनकी मौजूदगी साम्राज्य की मौजूदगी के ख़िलाफ़ है, साम्राज्य के ख़िलाफ़ है, उसने इन महाघटनाओं को वजूद दिया है। वे (साम्राज्यवादी ताक़तें) जानती हैं और इसीलिए राजनीति के विद्वानों के ख़िलाफ़ हैं, राजनीति की समझ रखने वाले वरिष्ठ धर्मगुरु के ख़िलाफ़ हैं, राजनीति की सूझबूझ पैदा करने वाले धर्मशास्त्र के ख़िलाफ़ हैं, राजनैतिक सूझबूझ पैदा करने वाले धर्म के ख़िलाफ़ हैं, राजनैतिक सूझबूझ पैदा करने वाले इस्लाम के ख़िलाफ़ हैं और खुल कर कहती भी हैं कि मुख़ालिफ़ हैं और यह वह सच्चाई है जिसकी ओर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा इस्लामी गणराज्य व्यवस्था से अमरीका की दुश्मनी व गहरे द्वेष को भी इसी बात से समझा जा सकता है।

इस्लामी गणराज्य व्यवस्था अवाम की मज़हबी आस्था का सिंबल है और यह सिस्टम देश व दुनिया के जारी विषयों और मामलों के संबंध में धर्म के अपने ख़ास दृष्टिकोण से के आधार पर वजूद में आया है। इसी वजह से साम्राज्य का सरग़ना जो अमरीका है, इस्लामी गणराज्य के ख़िलाफ़ है। कुछ लोग जो यह कहते हैं कि आप अमरीका की मुख़ालेफ़त क्यों करते हैं और अमरीका मुर्दाबाद क्यों कहते हैं तो यह सिर्फ़ मसले का ज़ाहिरी रुख़ है, यह सिर्फ़ मामले को सतही तौर पर देखना है। अस्ल मामला है साम्राज्य की फ़ितरत, इस्लामी गणराज्य जैसी चीज़ को बर्दाश्त ही नहीं कर सकती जिसकी हर चीज़ का संबंध धर्म से है, यह धर्मगुरुओं की धर्म की व्याख्या से संबंधित है और यह एक धार्मिक आंदोलन है, इसलिए साम्राज्य स्वाभाविक तौर पर इसके ख़िलाफ़ है। यह मस्जिद के बारे में एक और बात थी।

एक दूसरी बात यह है कि इस घटना में अवाम की मज़हबी ग़ैरत (धार्मिक स्वाभिमान) के रोल को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। इस पर भी मैं ताकीद करता हूं, इसकी वजह यह है कि हम देखते हैं कि इस बात का प्रोपैगंडा किया जाता है कि और बड़े पैमाने पर कल्चरल तरीक़ों के ज़रिए कोशिशें की जाती है कि मज़हबी ग़ैरत पर, तर्कहीनता, तर्कहीन कठरोता  का इल्ज़ाम लगाया जाए है। मैं कहना चाहता हूं कि मामला ऐसा नहीं है। मज़हबी ग़ैरत जहाँ सामने आती है और अपना असर रखती है वहाँ तर्क व विवेक के साथ होती है, मज़हबी ग़ैरत का स्रोत बुनियादी तौर पर पहचान है और पहचान तर्क का एक हिस्सा है जिससे धार्मिकता की गहराई का पता चलता है। अकसर मामलों में आप देखेंगे तो पाएंगे कि मज़हबी ग़ैरत तर्क व विवेक के साथ है। जिन हस्तियों के पास धार्मिक ग़ैरत सबसे ज़्यादा होती है, उनमें से ज़्यादातर के पास तर्क व सूझबूझ भी ज़्यादा होती है। इसकी मिसाल इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह हैं। वह धार्मिक ग़ैरत के चरम पर थे, हक़ीक़त में हमने ऐसे किसी शख़्स को नहीं देखा और नहीं जाना जो धर्म, मज़हबी संस्कृति, मज़हबी ज़िन्दगी, मज़हबी जीवन शैली और मज़हबी नियमों के संबंध में इमाम ख़ुमैनी की तरह हो, इसी के साथ वह बुद्धि व तर्क की नज़र से भी चरम पर थे। अक़्लमंद, विवेकशील और विद्वान। इस संबंध में हमारे मौजूदा दौर के धर्मशास्त्री व दार्शनिक आयतुल्लाह मिस्बाह यज़्दी का ज़िक्र करना भी बेहतर होगा। वह भी इसी तरह के थे। वह भी इमाम ख़ुमैनी के बड़े अच्छे शिष्य थे, मरहूम में मज़हबी ग़ैरत भी चरम पर थी और तार्कशीलता भी। सही अर्थों में वह एक दार्शनिक थे। 9 जनवरी का आंदोलन ग़ैरत और तर्क का सुनहरा संगम है। इस बारे में मैं थोड़ी तफ़सील पेश करुंगा ताकि यह बात स्पष्ट हो जाए कि तर्कशीलता के मैदान में यह आंदोलन कितना कामयाब रहा।

बेलगाम शाही शासन का एक लक्ष्य था। यानी ‘इत्तेलाआत’ अख़बार (2) में वह लेख लिखा जाना एक संयोग से घटना वाली घटना नहीं थी कि उन्होंने इसके बारे में अचानक फ़ैसला कर लिया हो। इसके पीछे बड़ा लक्ष्य था और वह इमाम ख़ुमैनी की छवि को ख़त्म करना था। अवाम की नज़रों में इमाम ख़ुमैनी की जो छवि थी और जिसकी वजह से वे उनके हुक्म पर चलते थे, उसे तोड़ना और ख़त्म करना था। वह लोगों के मन में इमाम ख़ुमैनी के बढ़ते असर को देख रहे थे, उस पर नज़र रखे हुए थे, वह चाहते थे कि अवाम की नज़र में इमाम ख़ुमैनी की पोज़ीशन को गिरा दें। इसलिए उन्होंने यह काम शुरू किया। अगर 9 जनवरी के दिन क़ुम के अवाम ने शाही शासन को ज़ोरदार थप्पड़ न जड़ा होता तो यह सिलसिला जारी रहता। फ़िल्में तैयार की जातीं ताकि इमाम ख़ुमैनी और उनकी पोज़ीशन को अवाम की नज़रों में गिरा दें और हक़ीक़त में आंदोलन को उसके ध्रुव से हटा दें क्योंकि इमाम ख़ुमैनी अवाम के इस महाआंदोलन के केन्द्र व ध्रुव थे जो दिन ब दिन फैलता जा रहा था और शाही शासन की सुरक्षा एजेंसियां इस सच्चाई को देख व समझ रहे थीं, यही वजह थी कि वह आंदोलन के इस ध्रुव को और इस आंदोलन को ताक़त देने वाले केन्द्र को अपनी इस करतूत के ज़रिए ख़त्म करना चाहते थे।

शाही शासन को अमरीका का भरपूर समर्थन हासिल था; यानी उसे इत्मेनान था कि वह इस सिलसिले में जो भी करेगा और अगर उसके एजेंट, इमाम ख़ुमैनी पर मिसाल के तौर पर चरमपंथ या हिंसा को जन्म देने वाले काम का इल्ज़ाम लगाएं और यह तय कर दें कि जो भी इमाम ख़ुमैनी का समर्थन करेगा, उस पर दबाव डालेंगे तो अमरीकी प्रशासन समर्थन ही करेगा और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी रिएक्शन वग़ैरह नहीं होगा। आप जानते हैं कि उन्हीं दिनों, यानी 10 देय सन 1356 हिजरी शमसी (बराबर 31 दिसंबर सन 1977) को (जिमी) कार्टर तेहरान में थे और उन्होंने नए साल का जश्न तेहरान में शाह के साथ मनाया था। उन्होंने यहाँ स्पीच दी और कहा कि ईरान -पहलवी का ईरान- स्थिरता का द्वीप है। यह उनकी ग़लतियों में से एक थी और यह बात साफ़ हो गयी कि उनके कैलकुलेशन कितने ग़लत थे। अब भी अमरीकियों के कैलकुलेशन ग़लत हैं। उनमें से एक यही बात थी कि उन्होंने कहा, ईरान स्थिरता का द्वीप है। इस बुनियाद पर सरकश -मोहम्मद रज़ा- समझ हा था कि इमाम ख़ुमैनी को कुचल कर आंदोलन को ख़त्म करने के लिए मौक़ा पूरी तरह मुनासिब है। अलबत्ता इमाम ख़ुमैनी का जिस्म उनकी पहुंच से दूर था, क्योंकि वह नजफ़ में थे लेकिन शाह और उसके आदमी इमाम ख़ुमैनी के ज़िक्र, उनके नाम और उनकी इज़्ज़त को ख़त्म कर सकते थे, उनकी बेइज़्ज़ती कर सकते थे; उन्होंने देखा कि मौक़ा बड़ा अच्छा है तो उन्होंने यह काम शुरू कर दिया। इस तरह यह काम पहले से तयशुदा व सोचा समझा था यानी उन्होंने इस विषय की बैठकर योजना बनाई थी और सारा कैलकुलेशन कर लिया था।

क़ुम के अवाम ने उनके कैलकुलेशन को मिट्टी में मिला दिया; यानी क़ुम के अवाम के इस काम ने दुश्मन के कैलकुलेशन व हिसाब-किताब को पलट दिया; “फ़ल्लज़ीना कफ़रू हुमुल मकीदून”(3) उन्होंने चाल चली लेकिन यह चाल उन्हीं के ख़िलाफ़ चली गयी; यानी वह चाहते थे कि इमाम ख़ुमैनी की पोज़ीशन कमज़ोर कर दें लेकिन उनका यह काम इस बात का कारण बना कि इमाम ख़ुमैनी पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर और पहले से ज़्यादा महानता के साथ मैदान में आएं। वह चाहते थे कि इमाम ख़ुमैनी के साथ अवाम के रिश्ते को कमज़ोर बना दें, मगर यह रिश्ता और मज़बूत हो गया। वह चाहते थे कि आंदोलन को कमज़ोर बना दें, यह आंदोलन ज़्यादा मज़बूत हो गया। हक़ीक़त में अवाम का इस आंदोलन में एक ऐसा कैलकुलेशन शामिल था। हम यह नहीं कहते कि सड़क पर आने वाले हर एक शख़्स ने यह अंदाज़ा लगा लिया था लेकिन इस सामूहिक क़दम के पीछे जिसे उठाने की भावना अल्लाह ने लोगों के मन में डाली थी, एक अहम कैलकुलेशन था और उस कैलकुलेशन ने दुश्मन के सारे कैलकुलेशन उलट दिए, उसकी चाल को नाकाम बना दिया। यानी वही शख़्स जिसने-10 देय सन 1356 हिजरी शमसी (बराबर 31 दिसंबर सन 1977) को ईरान को स्थिरता का द्वीप कहा था, वह ख़ुद यानी कार्टर अगले साल हाइज़र को तेहरान भेजने पर मजबूर हो गया ताकि वह जिस ज़रिए से भी मुमकिन हो, जिस तरह भी मुमकिन हो, आंदोलन को ख़त्म कर दे। बग़ावत से, क़त्लेआम से, अवाम के क़त्ले आम से यह काम करे। अलबत्ता अल्लाह की कृपा रही कि वह इस काम में भी नाकाम रहा और वे क्रांति को जन्म लेने से नहीं रोक सके।

अमरीका का यह ग़लत कैलकुलेशन, नीति निर्धारक विभागों में बदस्तूर जारी है। आज भी यही स्थिति है। इस वक़्त भी विभिन्न मामलों के बारे में कैलकुलेशन करते हैं, लेकिन नाकाम हो जाते हैं; इसका नमूना हमारे प्रिय शहीद शहीद सुलैमानी की शहादत की घटना का ताज़ा बाक़ी रहना है। वह क्या सोच रहे थे और क्या हो गया! वह सोच रहे थे कि शहीद सुलैमानी को रास्ते से हटाने से, वह महाआंदोलन, जिसके शहीद सुलैमानी प्रतिनिधि थे, सिंबल थे, रुक जाएगा, मगर आप देख रहे हैं कि उसका दायरा और फैल गया। इस साल शहीद सुलैमानी की दूसरी बरसी पर यह शानदार आयोजन किसका था? किसके हाथ में था? कोई है जो यह दावा कर सके कि यह काम मैंने किया या हमने किया? अल्लाह की क़ुदरत के अलावा किसी का काम नहीं था। ईरान में भी, ईरान से बाहर भी यह शानदार काम, शहीद सुलैमानी से अवामी सतह पर मोहब्बत व श्रृद्धा के इज़हार का अंदाज़ा दुश्मन नहीं लगा सका और वह इन चीज़ों के बारे में अंदाज़ा लगा भी नहीं सकता। दुश्मन के आंकलन करने व नीति बनाने वाले विभाग नाकारा व बेख़बर हैं। वह इस्लामी गणराज्य से संबंधित तथ्यों को उस तरह से नहीं समझ सकते जिस तरह से वे हैं। जब मौजूदा हालात के बारे में अंदाज़ा ग़लत होगा तो फ़ैसले भी ग़लत होंगे और ग़लत फ़ैसले उनकी नाकामी का कारण बनेंगे, जैसा कि वह अब तक नाकाम रहे हैं और अल्लाह ने चाहा तो इसके बाद भी नाकाम रहेंगे।

बहरहाल, प्रिय साथियो! वह दिन गुज़र गए, 9 जनवरी को कभी भुलाया नहीं जा सकता, अल्लाह की मेहरबानी से आज तक ज़िन्दा है, इसके बाद भी इसे भुलाया नहीं जाएगा। क़ुम की 9 जनवरी की घटना के बाद आंदोलन ने रफ़तार पकड़ी। अल्लाह ने क़ुम वालों के अमल में बर्कत दी, यह आंदोलन तेज़ होता गया और क्रांति के रूप में अपने अंजाम को पहुंचा। महान इमाम ख़ुमैनी फ़ातेहाना अंदाज़ में वतन वापस लौटे, क्रांति कामयाब हुयी और इस्लामी गणराज्य -जो धार्मिक गणराज्य व्यवस्था है- क़ायम हुआ और वजूद में आया।

इस दिन को 43 साल गुज़र चुके हैं और ये 43 साल संघर्ष, उतार-चढ़ाव और तरह तरह की घटनाओं के गवाह रहे। ये घटनाएं, हमारे अतीत की घटनाएं हैं जिनसे हमें पाठ लेना चाहिए। अलबत्ता एक ज़िन्दा क़ौम सिर्फ़ अतीत पर नज़र नहीं रखती। एक ज़िन्दा क़ौम अपने इतिहास के हर दौर में अपने वक़्त की ज़रूरतों और वर्तमान क्षण में उसके कांधे पर जो ज़िम्मेदारी है उस पर भी, अपने अगले क़दम पर भी जो उसे उठाना है, और रणनीति पर भी नज़र रखती है। हमें मौजूदा लम्हे की अपनी ज़िम्मेदारी को पहचानना चाहिए, भविष्य के लिए अपने उठने वाले क़दमों को तय करना चाहिए, रणनीति स्पष्ट करनी चाहिए, उस पर नज़र रखनी चाहिए और पूरी ताक़त और शक्ति से उसकी ओर बढ़ना चाहिए। इस तरह यह आंदोलन सही अर्थों में कामयाब होगा और अपनी निश्चित फ़तह तक पहुंचेगा जिसका पहला चरण है ईरानी क़ौम का पाकीज़ा जीवन। यह अलग बात है कि दूसरों ने भी इससे सबक़ हासिल कर लिया है, यह आइडियल बन गया है, यह अलग विषय है। कल्याण और इस्लामी ज़िन्दगी जो पाकीज़ा ज़िन्दगी है, इसमें धर्म भी है, दुनिया भी है, आराम भी है, शरीर भी है और आत्मा भी है और इन सब ज़रूरतों को पूरा करने का ज़रिया भी है, इंशाअल्लाह देश और राष्ट्र के लिए यह पवित्र जीवन हासिल हो। अभी हम बीच रास्ते में हैं। बेशक अबतक उस रास्ते का कुछ हिस्सा तय किया जा चुका है, ईरानी क़ौम ने काम किया है, कोशिश की है और हम थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं लेकिन हमें अपनी आज की ज़िम्मेदारी को समझना चाहिए और कल की ज़िम्मेदारी और अपने विजन को महसूस करना चाहिए। कभी हम देखते हैं मिसाल के तौर पर लोगों की राय के बारे में कुछ सर्वे कराए जाते हैं, लेकिन उनसे ईरानी क़ौम की हक़ीक़त का प्रतिबिंबन नहीं होता, ईरानी क़ौम की हक़ीक़त का अंदाज़ा शहीद सुलैमानी की शवयात्रा के दौरान होता है। ये चीज़ें बताती हैं कि ईरानी क़ौम का इस वक़्त क्या हाल है और वह किस तरह के दिन गुज़ार रही है? उसके क्या जज़्बात हैं? उसके मन में क्या है? यानी ईरान और ईरानी क़ौम की महानता के जितना बड़ा मैदान दरकार है जो इस क़ौम की हक़ीक़त और उसकी मनोदशा की सही तसवीर ज़ाहिर कर सके। ये सर्वे जो कुछ लोग इधर उधर किसी मक़सद या बिना मक़सद के अंजाम देते हैं, कसौटी नहीं बन सकते।

अल्लाह का शुक्र है कि इस वक़्त देश में मोमिन जवानों की सोच फैलती जा रही है। ख़ुशक़िस्मती से इस वक़्त भी जवानों की बड़ी तादाद की तरफ़ से ये क्रांतिकारी व मोमिन सोच हमारे साथ है, क्रिएटिव सोच, आगे बढ़ने की सोच। इस बुनियाद पर मैं कुछ अनुशंसाएं और ताकीद करना चाहता हूं, हालांकि अनुशंसाएं तो बहुत ज़्यादा हैं लेकिन इस सभा में इस बात की गुंजाइश नहीं है कि इंसान लंबी बातचीत कर सके, इसलिए मैं बस चंद चीज़ों की ताकीद करना चाहता हूं।

मेरी पहली ताकीद यह है मेरे प्रिय! जो लोग मुझ नाचीज़ से यह बातें सुन रहे हैं! मज़हबी ग़ैरत (धार्मिक स्वाभिमान) की रक्षा करें। मज़हबी ग़ैरत को क़ायम रखिए। अनेक अहम मौक़ों पर देश की मुक्ति की वजह ईरानी क़ौम की धार्मिक ग़ैरत रही है। धार्मिक ग़ैरत ही है जो ख़तरों को अवसरों में बदल देती है। इसकी एक मिसाल थोपी गयी जंग और 8 वर्षीय पवित्र प्रतिरक्षा है जो बहुत बड़ा ख़तरा था लेकिन लोगों की धार्मिक ग़ैरत, नौजवानों की धार्मिक ग़ैरत और माँ-बाप तथा बीवियों की धार्मिक ग़ैरत इस बात का कारण बनी कि हमारे नौजवान, जंग के मोर्चे पर जाएं। धार्मिक ग़ैरत ने इस जंग में, जो हक़ीक़त में वैश्विक जंग थी, उस वक़्त अमरीका, पूर्व सोवियत संघ, नेटो और क्षेत्र की रूढ़ीवादी ताक़तों ने, सभी ने ईरान को हराने, इमाम ख़ुमैनी को हराने और आंदोलन को ख़त्म करने के लिए एक दूसरे से हाथ मिला रखा था, उस जंग में उन सभी को हराया और फ़तह दिलाई। इसका स्रोत मज़हबी ग़ैरत थी। यह तो पवित्र प्रतिरक्षा की बात थी, बाद के बरसों में भी अनेक घटनाएं हुयीं जिनमें मज़हबी ग़ैरत ने अपना रोल अदा किया। ख़ुद हमारे इस दौर में भी हमारे इन्ही शहीद, शहीद सुलैमानी की शहादत हक़ीक़त में एक ऐतिहासिक व हैरतअंगेज़ घटना बन गयी। कोई सोच भी नहीं सकता था, दोस्त भी नहीं सोचते थे कि यह घटना इस तरह से महान हो जाएगी, अल्लाह उसे ऐसी बर्कत देगा कि यह अवाम की धार्मिक व क्रांतिकारी पहचान को सभी की आँखों के सामने ले आएगी और सभी इसे देखेंगे। सही अर्थों में शहीद सुलैमानी के ताबूत की छाया में ईरानी क़ौम ने अपनी पहचान व एकता का प्रदर्शन किया। तेहरान में जनाज़े का जुलूस, केरमान में जनाज़े का जुलूस, तबरीज़ में जनाज़े का जुलूस और अनेक शहरों में जनाज़े का जुलूस- मशहद में जनाज़े का जुलूस। इराक़ में वह शानदार जनाज़े का जुलूस और अगर इस शहीद का पवित्र शव सीरिया और लेबनान ले जाया जाता तो वहाँ भी ऐसा ही होता। अगर पाकिस्तान ले जाते तो वहाँ भी यही घटना होती। यानी शहीद सुलैमानी के इस महान कारमाने ने यह दिखा दिया कि यह घटना बहुत बड़ी घ़टना थी। यानी शहीद क़ासिम जैसी एक महान हस्ती की शहादत, दुश्मन की नज़र में और सभी की नज़र में एक ख़तरनाक मोड़ समझी जाती थी, लेकिन मुसलमान क़ौम, ईरानी क़ौम ने इस ख़तरे को अवसर में बदल दिया और यह एक अवसर बन गयी।

अतीत में हमारे इतिहास में इस तरह की घटनाएं हुयी हैं, 9 देय (30 दिसंबर) की घटना भी इसी तरह की है। 9 देय सन 1388 हिजरी शमसी (बराबर 30 दिसंबर 2009) की घटना भी ऐसी ही है; इसमें भी एक बड़े ख़तरे का सामना हुआ था, कई महीने तक जारी भी रहा लेकिन लोगों की ग़ैरत 9 देय को मैदान में आ गयी और इस ख़तरे को ख़त्म कर दिया, बल्कि इसके बुरे प्रभावों को भी ख़त्म कर दिया, उस ख़तरे को मौक़े में बदल दिया। इन कामयाबियों, इन सफलताओं और इन ख़तरों के मौक़े में बदल जाने की अस्ल वजह अवाम में मज़हबी ग़ैरत (धार्मिक स्वाभिमान) थी, इसे बचाए रखना चाहिए। वक्ता, लेखक और अवाम की सोच पर असर डालने वाले लोग भी इस बिन्दु पर ध्यान दें। अलबत्ता ज़ाहिर है कि विरोधी और दुश्मन भी इस सिलसिले में अपना काम करते रहेंगे; इस सिलसिले में मेरी इन  बातों पर एतेराज़ भी करेंगे, बातें बनाएंगे लेकिन सच्चाई यही है; सच्चाई यह है कि अवाम में मज़हबी ग़ैरत बची रहनी चाहिए और अल्लाह की कृपा से बची रहेगी।

दूसरी बात जो मैं याद दिलाना चाहता हूं यह है कि इस बात पर ध्यान दीजिए कि आज कल क्रांति के दुश्मनों और इस्लामी गणराज्य व्यवस्था के दुश्मनों की साज़िशों में जिन बिंदुओं पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है उनमें से एक, क्रांति के बुनियादी उसूलों के संबंध में संवेदनशीलता को ख़त्म करना है। लोग संवेदनशील हैं ना! लोग क्रांति के बुनियादी उसूलों को लेकर संवेदनशील हैं, अगर कोई बुनियादी उसूलों पर हमला करे तो लोग सामने आ जाते हैं। दुश्मन चाहते हैं कि इस संवेदनशीलता को धीरे-धीरे कम कर दें। यह चीज़ भी बड़े पैमाने पर प्रोपैगंडे के इसी रास्ते से आगे बढ़ाई जा रही है जो आजकल साइबर स्पेस और विदेशी मीडिया में अलग अंदाज़ से पेश की जा रही है। कभी कुछ लोगों की बातों को, ऐसे लोगों की बातों को जिनकी कोई ख़ास हैसियत नहीं है, ना उनकी बातें अहम और ना ही उनकी सोच, इन लोगों की बातो कों बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है, ये बड़बोले क़िस्म के लोग हैं जो क्रांति के उसूलों पर और क्रांति की बुनियादों पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं।  क्रांति के उसूलः जैसे धर्म की प्रभुसत्ता पहले दर्जे पर है। बुनियादी तौर पर इस्लामी गणराज्य और इस्लामी क्रांति अल्लाह के धर्म की प्रभुसत्ता के लिए वजूद में आयी है; इसके वजूद में आने की बुनियादी वजह यह है कि समाज धार्मिक रूप में, धार्मिक अंदाज़ में ज़िन्दगी गुज़ारे और उसे धार्मिक रूप में ढाला जाए। हुकूमत धर्म के तरीक़े पर गठित हो, आगे बढ़े, काम करे; ये चीज़ क्रांति के बुनियादी उसूलों में थी। लोगों ने जान दी, अपना ख़ून पेश किया, क़ुर्बानी दी ताकि यह काम हो जाए; यह क्रांति के उसूलों का हिस्सा है, इसे कमज़ोर करना चाहते हैं। या मिसाल के तौर पर साम्राज्यवादी दुश्मन के सामने न झुकना, यह क्रांति के उसूलों में शामिल है। झुकना नहीं चाहिए; दुश्मन की धमकी से प्रभावित नहीं होना चाहिए; ये जो हम मिसाल के तौर पर कभी दुश्मन से बातचीत करते हैं, संवाद करते हैं, संपर्क करते हैं, यह एक अलग बात है। क्रांति हमसे कहती है कि दुश्मन की धमकी और उसकी बातों के सामने नहीं झुकना चाहिए; अब तक अल्लाह की कृपा से हम झुके नहीं हैं और भविष्ण में भी कभी नहीं झुकेंगे, यह चीज़ बुनियादी उसूलों में है। वे इस उसूल को कमज़ोर करना चाहते हैं, मिसाल के तौर पर कहते हैं “जनाब क्यों? क्या हरज है? क्या मुश्किल है?” यानी इस तरह के स्पष्ट उसूलों की अहमियत को कम करना। या देश की संप्रभुता या भ्रष्टाचार से निपटना, नाइंसाफ़ी से मुक़ाबला वग़ैरह, ये सब क्रांति के बुनियादी उसूल हैं। ये दुश्मन की बड़े पैमाने पर अलग अलग तरह की सॉफ़्ट वॉर का हिस्सा है जिस पर वह लगातार काम कर रहा है। इसे मद्देनज़र रखना चाहिए और संवेदनशीलता ख़त्म करने की इस साज़िश के ख़िलाफ़ डट जाना चाहिए। विचारक, लेखक, विभिन्न प्रकार की सामाजिक सरगर्मियां अंजाम देने वाले लोग, साइबर स्पेस और सोशल मीडिया पर काम करने वाले लोग, जो लोग कर सकते हैं और जिनके हाथ खुले हैं, इस सिलसिले में उन पर ज़िम्मेदारी है; उन्हें दुश्मन को यह मौक़ा नहीं देना चाहिए कि वह धीरे-धीरे अवाम की इस संवेदनशीलता व दीनी ग़ैरत को कम कर दे।

यहीं पर इस बात को भी जान लेना चाहिए कि यह सोचना कि ये उसूल अवाम के लिए, देश के लिए और भविष्य के लिए फ़ायदेमंद नहीं हैं, एक बहुत ही ग़लत ख़्याल है जो हक़ीक़त से दूर है; यह पूरी तरह से नाइंसाफ़ी है। हमारे देश में इन 43 बरसों में जहाँ भी हमने तरक़्क़ी की है, कामयाबी से भरा क़दम उठाया है, हमारे हाथ खुले हैं, वे ऐसी जगहें रहीं हैं जहाँ क्रांति के जज़्बे से भरे लोगों ने संघर्ष किया है, उन्होंने काम किया है और हमने तरक़्क़ी की है। वैज्ञानिक तरक़्क़ी, औद्योगिक तरक़्क़ी, तकनीकी तरक़्क़ी, राजनैतिक तरक़्क़ी, विभिन्न विभागों में जहाँ भी मोमिन, जागरुक, माहिर और क्रांतिकारी लोग मैदान में मौजूद थे, वहाँ हमने तरक़्क़ी की लेकिन जहाँ भी काम रुक गया, वहाँ हम देखते हैं कि अवसरवाद ने अड़ंगा लगा दिया, वहां भ्रष्टाचार, सुख भोग, ग़ैर क्रांतिकारी सोच और ग़ैर क्रांतिकारी क़दम का दख़ल है। ये कामों के रुक जाने और प्रगति न करने की वजह बनते हैं। इसलिए क्रांति के उसूलों पर अमल, निश्चित तौर पर देश की तरक़्क़ी और कौम की तरक़्क़ी के सबसे अहम साधनों में है, यह याद दिलाने वाली बात है जो आपके मद्देनज़र रहनी चाहिए।

याद रखने वाली अगली बातः मेरी नज़र में यह भी बहुत अहम है, देश में एकता को मज़बूत रखने का मुद्दा है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि जितना हो सके फूट डालने वाले तत्व कम हों। अलबत्ता मतभेद होता है, तरीक़े में फ़र्क़ होता है, अंदाज़ में फ़र्क़ होता है, आदत में फ़र्क़ होता है, ये सब है, लेकिन हमें इन चीज़ों को एक दूसरे से टकराव की वजह नहीं बनने देना चाहिए। अवाम में एकता इन चीज़ों से ख़त्म नहीं होनी चाहिए, हमें इन मतभेदों को बढ़ने नहीं देना चाहिए।

अलबत्ता स्वाभाविक तौर पर कुछ लोग हैं जो क्रांति के मुक़ाबले में खड़े हो जाते हैं तो क्रांति के पास उनसे मुक़ाबले करने के अलावा कोई और चारा नहीं है; लेकिन अगर बात मतभेद, तरीक़े में अंतर और नज़रिये में फ़र्क़ की है और ये चीज़ें समाजों में हों तो इन्हें राषट्रीय एकता की कमज़ोरी का कारण नहीं बनने देना चाहिए; यानी देश की रक्षा के लिए, देश की तरक़्क़ी के लिए, देश के जवानों में उम्मीद पैदा करने और इसी तरह की दूसरी बातों के लिए सामूहिक संकल्प बाक़ी रहना चाहिए।

हमें यह बात हमेशा मद्देनज़र रखनी चाहिए कि दुनिया में हमारी दुश्मनी के मोर्चे में ऐसे दुश्मन भी हैं जो मतभेद पैदा करने में माहिर हैं, उनकी महारत “फूट डालो और हुकूमत करो” की है; यह बड़ी पुरानी चीज़ है जो इनमें कुछ अपनाते हैं; ये लोग यह काम करना जानते हैं और हम देखते हैं कि जहाँ भी उन्हें मौक़ा मिला है, उन्होंने यह काम किया है। जैसे मज़हबी मतभेद, शीया सुन्नी मतभेद; हमें अपने देश में इन चीज़ों को सामने आने या बढ़ने का मौक़ा नहीं देना चाहिए। देश में सदियों से शिया और सुन्नी एक साथ रहते आए हैं, बरसों से उन्होंने एक साथ ज़िन्दगी गुज़ारी है और कोई भी मुश्किल पेश नहीं आयी। हमारे यहाँ कभी क़ौमों में तो मतभेद रहे हैं, दूसरी क़ौमों और जातियों में टकराव भी रहा है, लेकिन शिया और सुन्नी समुदायों के बीच टकराव और मतभेद कभी नहीं रहा है। अब भी ऐसा कोई बहाना पैदा नहीं होना चाहिए, ऐसी कोई चीज़ सामने नहीं आनी चाहिए, अलबत्ता अल्लाह की मेहरबानी से ऐसी कोई चीज़ नहीं हुयी है। हमें इस तरह की किसी भी चीज़ को नहीं होने देना चाहिए, ख़्याल रखना चाहिए। अब अगर कोई एक ग़लत बात कह देता है और उसके मुक़ाबले में एक शख़्स अपनी कुछ ज़िम्मेदारी महसूस करना शुरू कर देता है तो उसे ज़्यादा तूल नहीं पकड़ना चाहिए, जारी नहीं रखना चाहिए, इसलिए सभी को एकता की रक्षा करनी चाहिए।

आप देखिए इस्लामी गणराज्य में एक इस्लामी हुकूमत है जिसका पर्चम शिया मत है, लेकिन इस वक़्त जिन इस्लामी देशों में सुन्नी मत के लोग रहते हैं, अकसर उनमें इस्लामी गणराज्य के संबंध में प्रेम व स्नेह, सहयोग, मदद और गहरी दोस्ती की भावना नज़र आती है। पूर्वी एशिया से लेकर पश्चिमी अफ़्रीक़ा तक अनेक देशों में ऐसे लोग हैं जो इस्लामी गणराज्य के साथ इस तरह का बर्ताव करते हैं हालांकि वे शिया भी नहीं हैं। आज इस्लामी दुनिया में इस्लामी गणराज्य इस्लाम का सिंबल है, इस्लामी उम्मत का सिंबल है, इस्लामी उम्मत के प्रभुत्व का सिंबल है। मैंने अर्ज़ किया, आपने देखा कि शहीद सुलैमानी की इसी बरसी के मौक़े पर अनेक देशों में कि जिनमें ज़्यादातर सुन्नी थे, कितने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। यह सोच नहीं होनी चाहिए कि आज हमें इस बात का हक़ हासिल है कि राष्ट्रीय एकता के विषय पर लापरवाही भरा रवैया अपनाएं।

अलबत्ता कुछ दूसरी अहम बातें याद दिलाने लायक़ हैं, जिन्हें पहले भी पेश किया जा चुका हैः उम्मीद बढ़ाना और भविष्य के बारे में स्पष्ट विजन रखना; यह हमारे आज के अहम मुद्दों में है। कुछ लोग हैं जो कोशिश करते हैं कि नौजवानों में मौजूद उम्मीद को कमज़ोर कर दें और उन्हें भविष्य की ओर से नाउम्मीद करें ताकि उनके सामने कोई विजन ही न रहे; यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि दिलों में इस उम्मीद को मज़बूत बनाएं। यह उम्मीद सिर्फ़ ज़बानी जमा ख़र्च से मज़बूत नहीं बनायी जा सकती; कोशिश और काम होना चाहिए। देश के अधिकारियों, राजनेताओं को, जो अल्लाह की मेहरबानी से काम कर रहे हैं सरगर्म हैं, इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उनके बहुत से अच्छे काम, जवानों के दिलों में उम्मीद जगा सकते हैं, उम्मीद भर सकते हैं। जब जवान में उम्मीद होगी तो अनेक मैदानों में ख़ूब काम करेगा, ख़ूब कोशिश करेगा, अच्छी तरह शिक्षा हासिल करेगा, अच्छे तरीक़े से रिसर्च करेगा। एक काम यह भी है कि आप साइबर स्पेस, सोशल मीडिया और दूसरी जगहों पर कुछ लोगों को इस बात की इजाज़त न दीजिए के वे अपने शैतानी प्रलोभन के ज़रिए नौजवानों को उम्मीद की विपरीत दिशा में बहका ले जाएं।

एक और याद रखने लायक़ बिन्दु यह है कि हम यह मौक़ा न दें कि इस्लामी गणराज्य की कामयाबियां छिपी रह जाएं। यह हक़ीक़त में बहुत अहम बात है। इस बात में शक नहीं कि आज आर्थिक क्षेत्र में कुछ मुश्किलें हैं, मिसाल के तौर पर इन्फ़लेशन (मुद्रा स्फीति) का मुद्दा है, कुछ चीज़ों के महंगे होने का मुद्दा है, अवाम में ख़ास तौर पर कमज़ोर वर्ग की आर्थिक स्थिति, बैंकिंग के क्षेत्र में मुश्किलें, टैक्स की मुश्किलें वग़ैरह हैं। ये हमारी मुश्किलें हैं। मगर कुछ लोग इन्हीं मुश्किलों को कुछ ऐसे अंदाज़ में बयान करते हैं कि मानो इस्लामी गणराज्य को कहीं कोई कामयाबी ही नहीं मिली, उन कामयाबियों पर पर्दा डाल देते हैं। इस्लामी गणराज्य व्यवस्था की विभिन्न क्षेत्रों में दर्जनों कामयाबियां हैं जिनमें से कुछ का ज़िक्र नाचीज़ ने ‘दूसरा क़दम’ नाम के घोषणापत्र (5) में किया था।

हमें इस्लामी गणराज्य की इन बड़ी कामयाबियों को बयान करना चाहिए, अवाम के सामने और उन लोगों के सामने लाना चाहिए जो नज़रअंदाज़ करते हैं। यह भी अहम बिन्हु है जिस पर ध्यान देना चाहिए।

एक अहम बिन्दु अवाम से संबंध का है। अल्लाह का शुक्र कि आज जो हुकूमत सत्ता में है, अवाम से उसका संपर्क अच्छा है। आम लोगों के बीच जाती है, अवाम के बीच मौजूद रहती है। अवाम के हित में क़दम व रुझान महसूस होता है। इस प्रक्रिया को पूरा करने की ज़रूरत है। पहली बात तो यह है कि यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। कुछ लोग इस पर भी सवाल उठाते हैं जो तवज्जो देने के लायक़ नहीं है। सच में अवाम के बीच जाना, अधिकारियों को थका देने वाला काम है, यह कठिन काम है, लेकिन इसका बहुत असर है, बहुत अच्छा क़दम है। यह जारी रहना चाहिए। दूसरे यह कि अवाम से जो वादे किए जाते हैं उन पर अमल किया जाए। समय सीमा के भीतर वादे पूरे किए जाएं ताकि अवाम को महसूस हो कि गंभीरता पायी जाती है। जहाँ उन वादों पर अमल करना मुमकिन न हो, कभी ऐसा भी होता है कि कोई वादा किया गया लेकिन उसे पूरा करने के लिए संसाधन मुहैया नहीं हैं, ऐसी हालत में जाएं और उन्हीं अवाम को जिनके बीच वादा किया था, साफ़ तौर पर स्पष्टीकरण दें। बताएं कि यह वजह हो गयी जो हम उस पर अमल नहीं कर सके। इंशाअल्लाह भविष्य में अमल करेंगे। यह था वादों को पूरा करने का मामला।

एक और चीज़ यह है कि कभी कभी अवाम में से कुछ माहिर लोग विभिन्न विभागों के बारे में कुछ सुझाव व उपाय पेश करते हैं। अधिकारी ऐसा तरीक़ा अपनाएं जिससे उन सुझावों से फ़ायदा उठाना मुमकिन हो। यानी हक़ीक़त में अवाम को देश के योजना बनाने वाले और नीति निर्धारक विभागों के फ़ैसलों में भागीदार बनाएं। यह रही एक बात। अवाम के सुझाव को किस तरह व्यवहारिक बनाया जाए उसके लिए भी एक सिस्टम बनाने की ज़रूरत है ताकि अवाम व्यवहारिक क़दम में भी भागीदार हो सकें। बहुत से लोग हैं जो कुछ कामों में हुकूमत की मदद करना चाहते हैं और मदद करते हैं। यह तरीक़ा तय होना चाहिए कि किस तरह अवाम का सहयोग व मदद संबंधित विभाग तक पहुंचे। इन चीज़ों के बारे में बैठ कर ग़ौर करने की ज़रूरत है, ध्यान से सोचने की ज़रूरत है। स्टडी वग़ैरह करने की ज़रूरत है।

निगरानी के लिए भी अवाम की क्षमता से फ़ायदा उठाया जाना चाहिए। देश में विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी जगहें हैं जहाँ भ्रष्टाचार है। अधिकारों का ग़लत इस्तेमाल है। मुमकिन है संबंधित अधिकारियों की निगाह से यह बात छिपी हो, लेकिन अवाम उसे देखते हैं, उससे आगाह हैं। इस संबंध में भी अवाम की क्षमता से फ़ायदा उठाया जाना चाहिए। इसलिए अवाम से तालमेल होना बहुत ही बुनियादी काम है। अधिकारियों को चाहिए कि उसी शक्ल में जो मैंने संक्षेप में बतायी है, अमल करें।

कुल मिलाकर जो सिफ़ारिशें अपने प्रिय अवाम के सामने पेश करता हूं उसके संबंध में अधिकारी अपना फ़र्ज समझें कि हक़ीक़त में उन्हें पूरे वजूद से काम करना है। अलबत्ता आज जो चीज़ मैं देख रहा हूँ वह यह है कि अल्लाह का शुक्र है कि ऊपर से नीचे तक अधिकारी काम में लगे हुए हैं, मेहनत कर रहे हैं, कठिनाइयां बर्दाश्त कर रहे हैं। जहाँ तक मेरी नज़र जाती है और हम देखते हैं, वे मेहनत कर रहे हैं, सच में कड़ी मेहनत कर रहे हैं। ये कठिन मेहनत अल्लाह ने चाहा तो बरकत का ज़रिया बनेंगी। इस कठिन मेहनत को जारी रखें, अवाम के लिए काम करें, अपनी नियत को अल्लाह के लिए शुद्ध बनाएं। ऐसी हालत में उनका अमल हक़ीक़त में बहुत बड़ी इबादत क़रार पाएगा। मैं यहां पर अपनी बात ख़त्म करता हूं।

अल्लाह से दुआ है कि ईरानी राष्ट्र को सभी मैदानों में, सभी विभागों में दुश्मनों पर कामयाबी दे। महान इमाम ख़ुमैनी की पवित्र आत्मा को ख़ुश करे और क़यामत में अपने ख़ास बंदों के साथ उठाए। उन्हें हमसे राज़ी व ख़ुश रखे कि हम उनके सामने शर्मिन्दा न हों। शहीदों की पाक आत्माओं को हमसे राज़ी रखे और उन्हें भी क़यामत में अपने ख़ास बंदों के साथ उठाए, हमें उनके सामने शर्मिन्दा होने से बचाए।

मैं एक बार फिर क़ुम के प्रिय अवाम और इस सभा में मौजूद आप सम्मानीय लोगों की सेवा में सलाम पेश करता हूं और उम्मीद करता हूं कि इंशाअल्लाह, अल्लाह आप सबको अपनी मेहरबानी, रहमत व बरकत से नवाज़ेगा।

वस्सलामो अलैकुम व रहमतुल्लाहे व बरकातोह

  1. इस प्रोग्राम में शामिल लोग क़ुम में हज़रत मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के रौज़े में इमाम ख़ुमैनी हाल में इकट्ठा हुए।
  2. ‘ईरान और सुर्ख़ व सियाह साम्राज्य’ उस लेख का टाइटल था जिसे 17 देय सन 1356 हिजरी शमसी (7 जनवरी 1978) को शाह के हुक्म पर उसके एक एजेंट ने अहमद रशीदी मुतलक़ के क़लमी नाम से अख़बार इत्तेलाआत में छपवाया था। उस लेख में इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह का अपमान किया गया था और उन्हें विदेशी एजेंट कहा गया था।
  3. ताहा सूरे की आयत 42, तो कुफ़्र करने वालों पर उनकी चाल उलटी पड़ गयी है।
  4. जनरल हायज़र अमरीकी वायुसेना का जनरल था जो 4 जुलाई सन 1979 को इस्लामी क्रांति को कामयाब होने से रोकने के लिए बग़ावत और शाही फ़ौज की अगुवाई करने ईरान आया था और एक महीने बाद, बग़ावत की साज़िश नाकाम होने पर ईरान से फ़रार हो गया था।
  5. इस्लामी क्रांति की कामयाबी की चालीसवीं सालगिरह पर ईरानी क़ौम के नाम संदेश (11/2/2019)