इक्तालीसवीं क़ुरआन अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में शिरकत करने वाले क़ुरआन के हाफ़िज़ों, क़ारियों और उस्तादों ने 2 फ़रवरी 2025 को इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई से मुलाक़ात की। इस मौक़े पर अपने ख़ेताब में रहबरे इंक़ेलाब ने क़ुरआन के तअल्लुक़ से बड़ी अहम रूहानी गुफ़तगू की। (1)
स्पीचः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
अरबी ख़ुतबे का अनुवादः सारी तारीफ़ पूरी कायनात के मालिक के लिए, दुरूद व सलाम हो हमारे सरदार मोहम्मद और उनकी सबसे पाक नस्ल, उनके चुने हुए साथियों और उन पर जो भलाई में उनका पालन करे क़यामत के दिन तक।
बहुत ख़ुश हूँ और अल्लाह का शुक्र अदा करता हूँ कि उसने हमें यह मौक़ा दिया कि एक बार फिर क़ुरआन की यह आनंददायक, पसंदीदा और प्यारी महफ़िल का इस इमामबाड़े में आयोजन हो। जनाब आक़ाए ख़ामोशी और वक़्फ़ संगठनों का, पूरे मुल्क में एक के बाद एक प्रतियोगिता के आयोजन और बेहम्दिल्लाह मुख़्तलिफ़ शक्ल में क़ुरआन मजीद को बढ़ावा देने के लिए कोशिशों का शुक्रिया अदा करता हूँ। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस की बधाई पेश करता हूँ और मुझे उम्मीद है कि अल्लाह हमको इस महान हस्ती और इस सम्मानीय ख़ानदान का अनुसरण करने वालों में क़रार देगा।
अल्लाह के कलाम क़ुरआन मजीद के बारे में उलमा और महान हस्तियों ने हज़ारों गहरी और मधुर बातें कही हैं और हज़ारों बिंदु अभी भी अनकहे हैं। क़ुरआन के बारे में हम जो कुछ अर्ज़ करें, वह क़ुरआन की फ़ज़ीलत के चरम और इस मुक़द्दस और आसमानी किताब की क़द्र व क़ीमत तक नहीं पहुंच पाएगा। मैं आज सिर्फ़ एक बिंदु को पेश कर रहा हूँ और मुझे आशा है कि हमारे अज़ीम अवाम और सुनने वाले इस बिंदु पर ध्यान देंगे। वह बिंदु यह है कि हम जब भी क़ुरआन पढ़ें तो इस बात की ओर हमारा ध्यान रहे कि क़ुरआन पैग़म्बरे इस्लाम का चमत्कार है। क़ुरआन चमत्कार है। यानी अल्लाह ने क़ुरआन के ज़रिए, पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी को साबित किया है। यह बहुत अहम बात है। (क़ुरआन) हमेशा रहने वाला चमत्कार है। इस चमत्कार और दूसरे पैग़म्बरों के चमत्कार में अंतर यह है कि वे चमत्कार उस दौर के सम्मानीय पैग़म्बर के ज़माने से मख़सूस थे और उन्हीं लोगों से विशेष थे जिन्होंने अल्लाह के चमत्कार को देखा थाः हज़रत सालेह की ऊंटनी को सिर्फ़ उसी दौर के लोगों ने देखा, हज़रत मूसा की छड़ी को उस दौर के लोगों ने देखा, बाक़ी लोगों ने उसकी ख़बर सुनी। लेकिन पैग़म्बरे इस्लाम का चमत्कार पूरे इतिहास में और हज़ारों साल बाद तक लोग अपनी आँखों के सामने देखेंगे, इस चमत्कार को अपनी आँखों से देखेंगे। क़ुरआन के चमत्कार का जारी रहना और पैग़म्बरे इस्लाम का यह चमत्कार पूरी इंसानियत के लिए, पूरी सृष्ठि के लिए बहुत बड़ी बर्कत है।
पूरा क़ुरआन चमत्कार है। क़ुरआन का लफ़्ज़ चमत्कार है। क़ुरआन में मौजूद अनुक्रम चमत्कार है। क़ुरआन की बातें चमत्कार हैं। क़ुरआन में अतीत और भविष्य की ख़बरें चमत्कार हैं। क़ुरआन में सृष्टि की परंपराओं का उल्लेख चमत्कार है। इंसान के भीतर की ख़बर देना चमत्कार है। क़ुरआन की सारी चीज़ें चमत्कार हैं। हमें इस महाचमत्कार से फ़ायदा उठाना चाहिए, इसका उपयोग करना चाहिए। अगर क़ुरआन से सही फ़ायदा उठाएं तो मानवता की ज़िंदगी सुव्यवस्थित हो जाएगी, सभी मुश्किलें दूर हो जाएंगी। मानवता के लिए क़ुरआन के सबक़, व्यवहार में लाने वाले सबक़ हैं, प्रैक्टिकल ज़िंदगी में उतारे जाने वाले सबक़ हैं। यह उन ऊंचे अर्थों के अलावा जिन तक सिर्फ़ महापुरुषों, औलिया और नेक बंदों की पहुंच मुमकिन है, जो मेरा कहने का मतलब है यह है कि क़ुरआन का ज़ाहिरी रूप, यही बातें जो हम समझते हैं, यह "बेशक हमने क़ुरआन को नसीहत हासिल करने वाले के लिए आसान बना दिया है सो कोई है नसीहत हासिल करने वाला।" है। (2) (सूरए क़मर, आयत-17) इससे एक एक इंसान फ़ायदा उठा सकता है। क़ुरआन को इस नज़र से हम देखें।
मैं एक मिसाल पेश करता हूँ कि जिससे हम क़ुरआन के वर्णन के अंदाज़ पर ध्यान दें। "जो कोई अल्लाह पर भरोसा करता है वह (अल्लाह) उसके लिए काफ़ी है"। (3) (सूरए तलाक़, आयत-3) अगर आपने अल्लाह पर तवक्कुल किया, यानी भरोसा किया, विश्वास किया। तो अल्लाह आपके लिए काफ़ी है और आपको अपने मक़सद तक पहुंचने के लिए किसी दूसरे तत्व की ज़रूरत नहीं है। ख़ैर यह अहम और संपूर्ण सबक़ है। लेकिन ग़ौर व फ़िक्र करना चाहिए। यानी "अगर हम अल्लाह पर भरोसा करें तो हमें किसी दूसरे तत्व की ज़रूरत नहीं होगी?" किन हालात में, किस स्थिति में यह अटल हक़ीक़त व्यवहारिक होगी? इसे ख़ुद क़ुरआन से पूछना चाहिए। ख़ुद क़ुरआन ने इसे हमारे लिए तय किया है। अल्लाह पर भरोसा और इस भरोसे के असर के लिए एक दिली शर्त और एक अमली शर्त है। अगर ये दोनों शर्तें पूरी हो जाएं तो उस वक़्त "जो कोई अल्लाह पर भरोसा करता है वह (अल्लाह) उसके लिए काफ़ी है"। (सूरए तलाक़, आयत-3) यानी किसी दूसरे तत्व की आपको ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
उन दो शर्तों में से एक शर्त दिली है। दिली शर्त क्या है? दिली शर्त यह है कि आपको अल्लाह के वादे की सच्चाई पर भरोसा होना चाहिए। "और अल्लाह से बढ़कर कौन बात का सच्चा है"। (4)(सूरए निसा, आयत-122) इस पर भरोसा होना चाहिए। हमारा यह अक़ीदा होना चाहिए कि अल्लाह का वादा सच्चा और अटल है। यह तवक्कुल की दिली पृष्ठिभूमि का हिस्सा है। (अगर) यह न हो तो तवक्कुल नहीं होगा। इसलिए आप देखिए कि अल्लाह उन लोगों की निंदा करता है जो उसकी ओर से बदगुमानी रखते हैं: "जो अल्लाह के बारे में बुरे गुमान करते हैं बुराई की गर्दिश उन्हीं पर है अल्लाह उन पर ग़ज़बनाक है और उन पर लानत की है और उनके लिए जहन्नम तैयार कर रखी है और वह बहुत बुरा अंजाम है।"। (5) (सूरए फ़तह, आयत-6) यानी अल्लाह के वादे के संबंध में बदगुमानी नहीं होनी चाहिए। हमारा अक़ीदा होना चाहिए इस बात पर जो अल्लाह कह रहा है "जो कोई अल्लाह (के दीन) की मदद करेगा अल्लाह ज़रूर उसकी मदद करेगा..." (6) (सूरए हज, आयत-40), सच है। हममें यह भरोसा होना चाहिए। यह दिली शर्त है।
यहाँ मैं उस जुमले का ज़िक्र करना चाहता हूँ जिसे मैंने नोटि किया हैः इस दिली शर्त पर हमारा अक़ीदा होना चाहिए कि अल्लाह की इजाज़त से नामुमकिन, मुमकिन हो जाता है। जो चीज़ नामुमकिन दिखती है, मुमकिन हो जाती है। इस बात पर हमें यक़ीन होना चाहिए। हमारी दुनिया में, हमारी ज़िंदगी में बहुत सी चीज़ें हैं जो नामुमकिन की श्रेणी में आती हैं। मिसाल के तौर पर मुर्दे का ज़िंदा होना नामुमिकन चीज़ों में शामिल है। हमें यह यक़ीन होना चाहिए कि अल्लाह के हुक्म से, अगर अल्लाह हुक्म दे दे और वह इरादा कर ले, तो यह नामुमकिन काम, मुमकिन हो जाता है। जैसा कि ख़ुद क़ुरआन में एक जगह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का कथन और एक जगह अल्लाह का कथन हमारे लिए नक़्ल हुआ हैः "मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से परिंदे की सूरत बनाता हूँ और उसमें फूंक मारता हूँ तो वह ख़ुदा के हुक्म से परिंदा बन जाता है..."। (7)(सूरए आले इमरान, आयत-49) गीली मिट्टी से एक कबूतर की शक्ल, एक जानवर, एक परिंदा बनाउं, फिर उसमें फूंकूं, वह कबूतर हो जाए। क्या यह नामुमकिन चीज़ों में नहीं है? लेकिन अल्लाह के हुक्म से यह नामुमकिन, मुमकिन हो जाता है। "और मैं ख़ुदा के हुक्म से मादरज़ाद अंधे और कोढ़ी को शिफ़ा देता हूँ और मुर्दों को ज़िंदा करता हूँ।" (8) (सूरए आले इमरान, आयत-49) "अकमह" यानी जन्मजात अंधा- मैं जन्मजात अंधे को रौशनी देता हूँ, मैं मुर्दे को ज़िंदा करता हूँ अल्लाह के हुक्म से। ऐसा ही है। यह अक़ीदा हो कि अल्लाह के हुक्म से सृष्टि के सभी नामुमकिन और वे चीज़ें जिनके बारे में नहीं लगता कि व्यवहारिक होंगी, व्यवहारिक होती हैं। "ख़ुदा के हुक्म से कई छोटी जमाअतें बड़ी जमाअतों पर ग़ालिब आ जाती हैं..." (9) (सूरए बक़रह, आयत-249) थोड़े से लोग अल्लाह के हुक्म से ज़्यादा लोगों पर विजय हासिल करते है। ऐसा ही तो है। "उन लोगों ने ख़ुदा के हुक्म से उन लोगों (दुश्मनों) को शिकस्त दे दी..."(10) (सूरए बक़रह, आयत-251) तालूत के पास मौजूद एक छोटे से गिरोह ने अल्लाह के हुक्म से एक बड़े ताक़तवर दुश्मन को हरा दिया। यानी अल्लाह के हुक्म से ग़ज़ा, ज़ायोनी सरकार और अमरीकी सरकार को शिकस्त दे देता है। ऐसा ही तो है। नामुमकिन था न? अगर आपसे कहा जाता कि एक बालिश्त ज़मीन वाला ग़ज़ा अमरीका की सैन्य ताक़त जैसी एक बड़ी ताक़त से टकराने वाला है, सामना करने वाला है और दोनों में जंग होने वाली है और ग़ज़ा उस पर हावी हो जाएगा तो क्या आपको यक़ीन आता?! आपको यक़ीन नहीं आता। यह नामुमकिन चीज़ों में से है। लेकिन अल्लाह के हुक्म से यह काम मुमकिन है। यह दिली शर्त ज़रूरी है। यानी हमें यह जानना चाहिए कि दुनिया की सभी नामुमकिन चीज़ें, अल्लाह के हुक्म से, अल्लाह के इरादे से व्यवहारिक हो सकती हैं, मुमकिन हो सकती हैं। यह दिली शर्त है।
जहाँ तक व्यावहारिक शर्त की बात है तो वह यह है कि इस काम, इस घटना के अंजाम पाने के लिए अल्लाह काम का एक हिस्सा ख़ुद इंसान के ज़िम्मे रखता है। ऐसा नहीं है कि हम घर में बैठे रहें और कहें कि कितनी ही बार एक छोटी-सी टुकड़ी ने अल्लाह के हुक्म से एक बड़े गिरोह पर विजय पाई है। नहीं, काम का एक हिस्सा हमारे ज़िम्मे है, जैसा कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के मामले में बहरहाल काम का एक हिस्सा हज़रत ईसा के ज़िम्मे था: मिट्टी से वह पक्षी बनाना, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को यह काम करना ही था, अगर वे यह काम न करते तो कोई पक्षी वुजूद में न आता, काम का यह हिस्सा हज़रत ईसा के ज़िम्मे है। अगर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम लाठी को ज़मीन पर न फेंकते तो वह काम न होता: और ऐ मूसा! यह तुम्हारे दाहिने हाथ में क्या है? उन्होंने कहा: यह मेरी लाठी है। मैं इस पर टेक लगाता हूँ और इससे अपनी बकरियों के लिए पत्ते झाड़ता हूँ और इससे मेरी दूसरी ज़रूरतें भी पूरी होती है। अल्लाह ने कहा: ऐ मूसा! इसे ज़मीन पर डाल दो तो उन्होंने उसे ज़मीन पर डाल दिया। अचानक उन्होंने देखा कि वह एक साँप है, जो दौड़ रहा है।(11) ज़मीन पर डालना ज़रूरी है। अल्लाह ने कहा: उसे ज़मीन पर डाल दो, जब तुम लाठी को ज़मीन पर डाल दोगे तभी वह नतीजा हासिल होगा, चमत्कार सामने आएगा, असंभव काम, यानी लाठी का अजगर में बदल जाना, संभव और व्यावहारिक होगा। तो यह व्यावहारिक शर्त है: हमें काम का एक हिस्सा अपने ज़िम्मे लेना होगा। अगर तुम्हारे बीस आदमी जमे होंगे, तो वे दो सौ पर हावी होंगे।(12) यह क़ुरआने मजीद बयान कर रहा है उस ज़िम्मेदारी के बारे में जो इस्लाम के आरंभिक काल के मुसलमानों के कंधों पर डाली गयी थी। अगर तुम कम भी हुए तो बड़ी संख्या पर भी विजयी हो सकते हो।
हम ईरानी राष्ट्र, हम इस्लामी समुदाय और हम इंसानी समाज कुछ समस्याओं में फंसे हुए हैं और इनमें से कुछ समस्याएं ऐसी लगती हैं जिनका समाधान असंभव है, नहीं! उनका समाधान यही है: और जो अल्लाह पर भरोसा करे तो वह उसके लिए काफ़ी है। हम अल्लाह पर भरोसा करें, इन दो शर्तों के साथ: पहले यह कि हमें यक़ीन हो, भरोसा हो कि अगर हम मैदान में उतर गए ते अल्लाह हमारी मदद करेगा, दूसरे यह कि हम मैदान में उतरें: तो जब तुम उसमें दाख़िल हो जाओगे, तो तुम ही हावी रहोगे।(13)
अल्लाह ने हज़रत मूसा के साथियों से कहा कि जाओ उस शहर में, अगर तुम दाख़िल हो गए तो बेशक तुम ही विजयी होगे लेकिन वे लोग दाख़िल नहीं हुए तो विजयी भी नहीं हुए। अगर आपने वह हिस्सा जो आपके ज़िम्मे है, अंजाम दे दिया तो निश्चित तौर पर आपको वह नतीजा मिलेगा और अल्लाह उस वादे को पूरा करेगा।
आज हम साम्राज्यवाद के मुक़ाबले पर हैं, सिर्फ़ ईरानी क़ौम ही नहीं। दूसरी बहुत सी क़ौमों और ईरानी क़ौम में फ़र्क़ यह है कि ईरानी क़ौम में यह कहने की हिम्मत है कि अमरीका हमलावर है, अमरीका झूठा है, अमरीका धोखेबाज़ है, अमरीका साम्राज्यवादी है और अमरीका मुर्दाबाद। दूसरे भी समझते हैं कि अमरीका झूठा है, वे समझते हैं कि वह धोखेबाज़ है, वे समझते हैं कि वह साम्राज्यवादी है, वे समझते हैं कि वह हमलावर है, वे समझते हैं कि वह मानवीय उसूलों में से किसी भी उसूल का पाबंद नहीं है (लेकिन) उनमें यह बात कहने की हिम्मत नहीं है। उनमें उसके सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं है। ठीक है वे अपने हिस्से का काम नहीं करते, तो जब नहीं करते तो नतीजा भी हासिल नहीं होता। अपने हिस्से का काम करना चाहिए, धैर्य से काम लेना चाहिए, संघर्ष करना चाहिए, कोशिश करनी चाहिए ताकि ये नतीजे हासिल हो सकें।
ईरानी क़ौम ने इन 40-45 बरसों में संयम से काम लिया, कोशिश की, दुनिया की सारी साम्राज्यवादी ताक़तें उसके मुक़ाबले में खड़ी हो गईं, उसके ख़िलाफ़ काम करने लगीं, काम करती रहीं लेकिन ईरानी क़ौम को न सिर्फ़ यह कि बड़ा नुक़सान नहीं पहुंचा बल्कि वह आगे बढ़ी है, उसने तरक़्क़ी और विकास किया है। आज का ईरान 40 बरस पहले वाला ईरान नहीं है, हमने हर पहलू से तरक़्क़ी की है। कुछ लोग कहते हैं कि रूहानी और आध्यात्मिक पहलुओं से हमने तरक़्क़ी नहीं की है, जी नहीं! आध्यात्मिक पहलुओं से भी देखिए, यह उसकी क़ुरआनी मिसाल है। जब ये बच्चे क़ुरआन पढ़ते हैं तो इंसान को उनके पढ़ने से आनंद मिलता है। ये बच्चे क़ुरआन के हाफ़िज़ और क़ारी हैं। मशहद में हमारी जवानी के समय में, हमें भी क़ुरआन में दिलचस्पी थी, हम भी क़ुरआन की महफ़िलों में जाया करते थे लेकिन ऐसे लोगों की संख्या जो सही तजवीद के साथ क़ुरआन पढ़ सकें, पूरे मशहद में दस भी नहीं थी। आज पूरे मुल्क में हज़ारों बच्चे और जवान बेहतरीन तजवीद के साथ क़ुरआन पढ़ते हैं, हज़ारों की संख्या में क़ुरआन के हाफ़िज़ हैं, आज हमारी रूहानियत और अध्यात्म ने भी तरक़्क़ी की है, अल्लाह के करम के हम क़ुरआन के मैदान में भी आगे बढ़े हैं, भौतिक पहलुओं से भी हमने तरक़्क़ी की है। हमारे जवानों ने मुख़्तलिफ़ काम अंजाम दिए हैं और यह तरक़्क़ी जारी रहेगी और ईरानी राष्ट्र अल्लाह पर भरोसे की बरकत से, अपने मद्दे नज़र ऊँचाई तक पहुंचेगी।
आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत और बरकत हो।