कामयाबी मिलने पर क़ुरआन हमें नसीहत करता हैः जब अल्लाह की मदद और कामयाबी आ जाए, और आप देख लें कि लोग फ़ौज दर फ़ौज अल्लाह के दीन में दाख़िल हो रहे हैं, तो उस वक़्त अपने परवरदिगार की हम्द के साथ तस्बीह करें और उससे मग़फ़ेरत तलब करें, बेशक वह बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला है। (सूरे नस्र, 1-3 आयत)  ख़ुशी मनाने के लिए नहीं कह रहा है, मिसाल के तौर पर जाकर स्कावएर के बीच में नारा लगाइये, फ़सब्बेह बेहम्दे रब्बिक कह रहा है यानी ʺअपने परवरदिगार की हम्द के साथ तस्बीह करेंʺ इस (कामयाबी) का आपसे तअल्लुक़ नहीं है, अल्लाह से तअल्लुक़ है, इस्तेग़फ़ार कीजिए। इस कोशिश के दौरान मुमकिन है आपसे कोई लापरवाही हो गयी हो, अपने अल्लाह से मग़फ़ेरत तलब कीजिए, सार्थक घटनाओं के तअल्लुक़ से इस तरह का रवैया अपनाना चाहिएः मग़रूर न होना, यह मानना कि (हे रसूल यह कंकरियां जब आपने फेंकी तो आपने नहीं फेंकी, बल्कि अल्लाह ने फेंकी) (सूरे अनफ़ाल, आयत-17 का एक हिस्सा) यह नफ़्स का धोखा, अल्लाह की ओर से ग़ाफ़िल हो जाना, सही नहीं है। सहीफ़ए सज्जादिया की दुआ नंबर 39 में आया हैः हे अल्लाह, तू इस लायक़ है कि सिद्दीक़ीन को भी तेरी तरफ़ से ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिए कि कहें (हमारा तो अल्लाह से राब्ता है, हमारी रविश तो ज़ाहिर है और ... ) नहीं, अल्लाह को सिद्दीक़ीन के तअल्लुक़ से कोई तकल्लुफ़ नहीं है, अगर किसी वक़्त कोई ग़लती करेंगे तो वो भी नुक़सान उठाएंगे।

इमाम ख़ामेनेई

14/3/2019