क़ुरआन को व्यवहार में रच बस जाना चाहिए, क़ुरआन के विषयों का संबंध इंसान की ज़िन्दगी से है, सिर्फ़ मालूमात नहीं हैं। कभी किसी इंसान को क़ुरआन की मालूमात अच्छी होती है लेकिन उसकी व्यवहारिक ज़िन्दगी में क़ुरआन का कोई असर दिखाई नहीं देता! हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि क़ुरआन हमारी ज़िन्दगी में साक्षात रूप अख़्तियार कर ले, उसी तरह जिस तरह पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि वआलेही वसल्लम की एक आदरणीय बीवी से जब उनके अख़लाक़ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब में कहा कि उनका अख़लाक़, क़ुरआन था, यानी आप क़ुरआन का साक्षात रूप थे। हमारे समाज में (भी) इस बात को व्यवहारिक होना चाहिए।

इमाम ख़ामेनेई

20/10/2009