लेखकः माएदा ज़मान फ़श्मी, पत्रकार और शोधकर्ता
"ग़ैस, तुम अपनी माँ का दिल व जान हो। मैं चाहती हूं कि तुम मुझसे वादा करो कि मेरे लिए रोओगे नहीं ताकि मैं ख़ुश रहूं, मेरा सिर फ़ख़्र से ऊंचा करो, समझदार व्यक्ति बनो और अपनी तमाम सलाहियत को इस्तेमाल करो और एक सफल व्यापारी बनो। मेरे प्यारे मुझे भूल न जाना, मेरे प्यारे मैंने तुम्हे ख़ुश रखने और तुम्हारे सुकून के लिए जो मुमकिन था किया, सभी कठिनाइयों को तुम्हारे लिए बर्दाश्त किया। जब बड़े होना और शादी करना और तुम बेटी के बाप बनो तो उसका नाम "मरयम" रखना मेरे नाम पर। तुम मेरे प्यारे, मेरा दिल, मेरा सहारा, मेरी जान और मेरे बेटे हो, मेरे लिए फ़ख़्र का सबब हो और तुम्हारे होने से मैं हमेशा ख़ुश रहती हूं।
मैं तुम्हें वसीयत करती हूं कि तुम्हारी नमाज़ न छूटे, मेरे बेटे नमाज़ नमाज़।
तुम्हारी माँ मरयम।"
यह वसीयतनामा, मरयम अबू दक़्क़ा का आख़िरी संदेश है अपने इकलौते बेटे के लिए। मरमय वही माँ हैं जिन्होंने ये बातें लिखीं, अब हमारे बीच नहीं है। 25 अगस्त को वह दुनिया वालों के सामने, ज़ायोनियों के अपराधों के लाइव प्रसारण के दौरान, ख़ान यूनुस में नासिर क्लिनिक के एमरजेंसी विभाग की इमारत की छत पर धमाकों और मलबों के बीच शहीद हो गयी। उनका कैमरा उनके साथ था। उनके हाथ में कोई हथियार नहीं था और वह सिर्फ़ तथ्यों को एकत्रित कर रही थीं, ऐसे तथ्य जिन्हें दुनिया नहीं देखना चाहती, लेकिन वह ख़ामोश नहीं रह सकती थीं।
मरयम की ज़िंदगी से उसी दिन से जंग और विनाश से जुड़ गयी जबसे वह पत्रकार बनीं। सन 2020 में उनका हर दिन घायलों से भरे अस्पतालों और ध्वस्त सड़कों के बीच गुज़रता था। मरयम मेज़ पर बैठकर काम करने वाली पत्रकार नहीं थी और न ऐसी शख़्स थी जो सुरक्षित जगह से ख़बरों की रिपोर्टिंग करे, वह लोगों के बीच में, धुएं और मलबों के बीच, ऐसी कहानियों के केन्द्र में थीं जिन्हें छापने की शायद कोई अख़बार हिम्मत न करता।
मरयम का इंस्टाग्राम पेज ऐसी तस्वीरों से भरा हुआ था जिसमें ज़िंदगी और जंग एक साथ दर्ज होते जाते थे, ऐसे बच्चे की जिसके अभ्यास की कापी मलबों के बीच थी, ऐसी औरत कि जो रोटी की लाइन में लगी थी, ऐसी एम्बुलेंस, जो धूल से भरी सड़कों पर तेज़ी से दौड़ती थी, ऐसे शहीदों की तस्वीर जो परलोक के सिधारते थे। उनकी पोस्ट न सिर्फ़ तस्वीर, बल्कि रेज़िस्टेंस का डाक्यूमेंट्स और खंडहरों और मलबों के बीच उम्मीद की किरण थी। कैमरे पर उनकी हर नज़र, हर तस्वीर और हर वीडियो, ऐसे लोगों की आवाज़ थी जिन्हें भुलाया जा रहा था।
उन्होंने अपने बेटे ग़ैस को यूएई भेजा ताकि वह सुरक्षित रहे, लेकिन ख़ुद ग़ज़ा में रहने का फ़ैसला किया। हर दिन बुलेट प्रूफ़ जैकेट के साथ, हाथ में कैमरा लिए, विस्फोटों और धुएं के बीच चलती थीं। वह जानती थीं कि मुमकिन है किसी भी वक़्त वह अपनी जान से हाथ धो बैठें लेकिन हमेशा कहती थीं, "कैमरा मेरा हथियार है।" उन्होंने सोमवार को उसी हथियार से, अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे को दर्ज किया। इस जातीय सफ़ाए के दौरान, उन्होंने बेघर होने, भुखमरी, मानवीय घटनाओं, ज़ायोनी फ़ौज के ज़मीनी हमलों और हवाई बमबारी को कवर किया और इसी तरह वे जंग के वीडियो भी रिकार्ड करती थीं। मरयम का घर और उनके आराम के साज़ो सामान जंग में तबाह हो गए, लेकिन उन्होंने घटनाओं को दर्ज करने और जंग के प्रभाव के वर्णन से हाथ नहीं रोका।
वह लगातार काम करती जाती थीं, दिन और रात की कोई परवाह नहीं थी। "मैंने उनकी बेमिसाल ऊर्जा को मीडिया कवरेज के दौरान देखा। हर जगह और हल सामाचारिक घटना में मौजूद रहती थी।" यह फ़िलिस्तीन पत्रकार संघ के उपप्रमुख तहसीन अलअस्तल के शब्द हैं। जंग के दौरान, मरयम की माँ बहुत बीमार हो गयीं लेकिन उनका ग़ज़ा में इलाज न हो सका और वे अस्पताल में शहीद हो गयीं। यह मरयम के लिए बहुत भारी नुक़सान था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा। उनकी ज़िंदगी के सबसे दर्दनाक लम्हे वे थे जब उन्हें अपने साथी पत्रकारों के शवों की तस्वीर लेनी पड़ती थी जो जंग के दौरान शहीद हो रहे थे। हर सहकर्मी को खोने पर ख़ुद से पूछती थी, "क्या मैं भी इनकी तरह क़ुर्बान हो जाउंगी या इस नरसंहार में बच पाउंगी?"
मरयम जब भी सुबह सोकर उठतीं तो उनका पहला काम कैमरा उठाना था। उनका हर क्षण मलबों और धमाके की आवाज़ के बीच सच्चाई को दर्ज करने और अपना ख़याल रखने में गुज़रता था। हर तस्वीर, हर पोस्ट और हर वीडियो, अवाम की ज़िंदगी का नोट था, ऐसा नोट कि अपने इंस्टाग्राम के पेज के कैप्शन में कभी कभी वह इस बारे में ख़ुद लिखती थीं, "उम्मीद सिर्फ़ एक चीज़ है जो हमें ज़िंदा रख सकती है।" या "जो तस्वीर मैं लेती हूं वह ऐसी सच्चाई की गवाही है जिसे दुनिया देखना नहीं चाहती।"
वह हर दिन इस बात की गवाह थीं कि किस तरह उनके साथी एक एक करके शहीद हो रहे थे लेकिन वह अपना काम करती गयीं। वह जानती थीं कि पत्रकार होने का मतलब, भुलाए जाने का मुक़ाबला करना, यानी ऐसे क्षणों को दर्ज करना जिसे दूसरे कर नहीं सकते या देखना नहीं चाहते। ग़ज़ा में जातीय सफ़ाए के आग़ाज़ से अब तक 246 पत्रकार शहीद हो चुके हैं जिनका बड़ा हिस्सा महिला पत्रकारों का है, जैसे शीरीन अबू आक़िला जो इससे पहले सच्चाई को दर्ज करने के लिए वेस्ट बैंक में ज़ायोनी फ़ौज की गोली से शहीद हुयी। मरयम इन लोगों के बीच से उठीं और उसी रास्ते को जारी रखा यहाँ तक कि नासिर एमरजेंसी क्लिनिक की छत पर एक के बाद एक दो बम धमाकों से शहीद हो गयीं।
ग़ज़ा में अस्पताल जिन्हें शरण स्थल होना चाहिए था, वह पत्रकारों का ठिकाना बन गए। अलजज़ीरा की पत्रकार हिन्द कहती हैं, "हम दो साल की जंग में बिना बिजली और इंटरनेट के हैं। फ़िलिस्तीनी पत्रकारों ने अस्पतालों को अपना गढ़ बना लिया ताकि घायलों, भुखमरी और निर्जीव शवों के बारे में रिपोर्ट दे सके।" मरयम भी इस निरंतर कोशिश का हिस्सा थीं। ज़ायोनी शासन ने बारंबार अस्पतालों और मीडिया केन्द्रों को निशाना बनाया और अपने दावे के सपोर्ट में कि जिसकी बुनियाद पर पत्रकारों को निशाना बनाता था, कोई सुबूत पेश नहीं किया है। जनेवा कन्वेंशन के मुताबिक़, पत्रकार, सिविलियन की श्रेणी में आते हैं, और उन्हें निशाना बनाना, युद्ध अपराध है। अलबत्ता ऐसे शासन के लिए युद्ध अपराध एक आम सी बात है जिसने 62 हज़ार से ज़्यादा फ़िलिस्तीनियों को मारा कि जिसमें आधे से ज़्यादा औरतें और बच्चे हैं और दुनिया की ओर से उचित प्रतिक्रिया नहीं देखी गयी।
इमाम ख़ामेनेई ने इस शासन के अपराधों का इस प्रकार उल्लेख किया, "जो अपराध आज ज़ायोनी सरकार के सरग़ना कर रहे हैं, मेरे ख़याल में इतिहास में इनकी मिसाल नहीं मिलती।" किसी भी समकालीन जंग में इतनी तादाद में पत्रकार नहीं मारे गए। किसी भी जंग में इस हद तक अस्पतालों और क्लिनिकों पर बमबारी नहीं हुयी थी। मरयम अबू दक़्क़ा ऐसी पत्रकार थीं जो अस्पताल पर बमबारी के दौरान शहीद हुयीं और यही एक लाइन, ग़ज़ा में ज़ायोनियों के अपराधों की सच्चाई से पर्दा उठाती है।
मरयम सोमवार 25 अगस्त को शहीद हुयीं लेकिन उनकी आवाज़ा अभी भी गूंज रही है। उनकी तस्वीरों, उनके वीडियो, उनकी इंस्टाग्राम की पोस्टों में जिसे उन्होंने जंग के दिनों में प्रसारित किया था, हर तस्वीर में उनकी बहादुरी और दृढ़ता के क्षण अभी भी ज़िंदा हैं। वह खंडहरों के बीच से ज़िंदगी का वर्णन करती थीं और अपनी आख़िरी तहरीर में जो अपनी शहादत से एक हफ़्ता पहले लिखा, एक जुमला हम सबके लिए यादगार छोड़ गयीं, "इस ज़िदंगी में हम उस बादल की तरह जो गुज़रता है, हम गुज़रते हैं और अपने कर्म के सिवा किसी चीज़ के हम मालिक नहीं है।"