इस मुद्दत (इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी) से पहले तक विदेशी इस बात को समझते थे कि अगर क़ौम एकजुट हो गयी तो क्या होगा, उन्होंने कोशिश कि ऐसा न हो। अब जबकि उन्हें महसूस हो गया और उन्होंने अपनी आँखों से देख लिया कि एक क़ौम के आपस में एकजुट होने से सभी साज़िशें फ़ेल हो जाती हैं, कोई भी ताक़त क़ौम का मुक़ाबला नहीं कर सकती...अब इस बात को वह महसूस कर चुके हैं। यह एकता –सभी विभागों में एकता और सभी का इस्लाम के लिए, अल्लाह के लिए एकजुट होना- ऐसी इलाही ताक़त है कि कोई उसे हरा नहीं सकता और वे इस ख़तरे को महसूस कर चुके हैं कि अब उनके बस में कुछ नहीं है। तो वे अब क्या करें? ऐसा काम करें कि ये लोग एक दूसरे से जुदा हो जाएं, दूर हो जाएं, अब दूर से बैठ कर प्लानिंग कर रहे हैं, उन्हें इसी काम को सौंपा गया है आपको हमसे, हमको आपसे, हम सबको एक दूसरे से जुदा करें, फिर अपने टार्गेट की ओर बढ़ें। हम सबको बेदार रहना चाहिए, हम होशियारी और बेदारी के साथ तवज्जो दें ताकि उनकी इस साज़िश को नाकाम बना सकें।

इमाम ख़ुमैनी

16/3/1979