अमरीका की साज़िश यह है कि हमारे मुल्क के भीतर ऐसी हरकत करे कि हम उस रास्ते पर आगे न बढ़ सकें जिस पर चल रहे हैं। भीतरी साज़िश करना, मुल्क के भीतर ऐसे लोगों के ज़रिए जो उन्हीं के एजेंट हैं। साज़िश यह है कि ईरान को बाहरी दुनिया के सामने ऐसा दिखाए कि न तो सरकार ही मुल्क को चला सकती है और न ही क़ौम इस लायक़ है कि आज़ाद रहे। ये शैतान हर जगह दंगा फ़साद फैला रहे हैं। पूरे मुल्क में, चाहे यूनिवर्सिटी हो, चाहे काउंटियां हों, चाहे अदालतें हो, चाहे फ़ोर्सेज़ के केन्द्र हों, पुलिस सेंटर, हर जगह किसी न किसी साज़िश से अफ़रा तफ़री फैलाना चाहते हैं, वे नहीं चाहते कि यह हुकूमत मज़बूत हो...अमरीकी हुकूमत को इस्लाम से मुंह की खानी पड़ी है और वह इस्लाम से डरती है। उसने इन जवानों से मुंह की खायी है जो इस्लाम के लिए इंक़ेलाब लाए, अपनी जानें दीं, क़ुरबानियां दीं। इसलिए फूट डाल रहा है ताकि इस समाज को, जो एकता के ज़रिए अपने मिशन को यहां तक आगे लाया, बीच रास्ते में ही नाकाम बना दे।
इमाम ख़ुमैनी
7/1/1980