हज़रत फ़ातेमा ज़हरा, इस्लामी ख़ातून की बुलंद तरीन सतह पर पहुंचने वाली महिला हैं। इस सतह पर पहुंचने के साथ ही वह माँ की ज़िम्मेदारी को पूरा करती हैं, बीवी के किरदार को अदा करती हैं, घरेलू काम करती हैं। इन चीज़ों को समझने की ज़रूरत है।
साम्राज्यवाद और ज़ायोनीवाद ने लैटिन अमरीका में प्रगतिशील क्रांति प्रक्रिया ख़ास तौर पर बोलिवर इंक़ेलाब के ख़िलाफ़ साज़िशें की हैं और अब भी कर रहे हैंः निकोलस मादुरो
ईरान के तेल को यूनान के समंदर में लूट लिया जाता है, जब ईरान के बहादुर सिपाही, बदला लेते हुए दुश्मन का तेल टैंकर ज़ब्त कर लेते हैं तो मीडिया प्रोपैगंडों में ईरान पर चोरी का इल्ज़ाम लगाते हैं।
इमाम ख़ुमैनी के आख़िरी लम्हे - आयतुल्लाह ख़ामेनेई की ज़बानी
इमाम ख़ुमैनी, कोमा में जाने से पहले तक सुबहानल्लाहे वलहम्दो लिल्लाहे व ला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर पढ़ते रहे।
यक़ीनन क़ुम को क़ुम बनाने और इस तारीख़ी-मज़हबी शहर को ख़ास अज़मत दिलाने में हज़रत मासूमा का किरदार नुमायां है। इसमें किसी को कोई संदेह नहीं। यह अज़ीम हस्ती और ख़ानदाने पैग़म्बर में परवरिश पाने वाली नौजवान ख़ातून इमामों के अक़ीदतमंदों, साथियों और चाहने वालों के बीच अपनी गतिविधियों के ज़रिए, अलग अलग शहरों से गुज़र कर, पूरे रास्ते में लोगों के बीच ज्ञान और मुहब्बते अहलेबैत की ख़ुशबू फैला कर और फिर इस इलाक़े में पहुंच कर और क़ुम में ठहर कर, इस बात का कारण बनीं कि यह शहर ज़ालिम हुकूमत के उस तारीक दौर में ख़ानदाने पैग़म्बर के उलूम और शिक्षाओं के अहम मरकज़ की हैसियत से जगमगा उठे और वह मरकज़ बन जाए जो अहलेबैत के उलूम और उनकी शिक्षाओं की रौशनी पूरे इस्लामी जगत में और दुनिया के पूरब व पश्चिम तक पहुंचा दे।
इमाम ख़ामेनेई
21 अकतूबर 2010
मेरे अज़ीज़ो! मेरे प्यारे बच्चो! बहुत सारे ख़ुर्रमशहर आपके सामने हैं। सामरिक जंग के मैदान में नहीं बल्कि ऐसे मैदान में जो सैनिक जंग के मैदान से ज़्यादा कठिन हैं।
इमाम ख़ामेनेई
23 मई 2016
जन्नतुल बक़ी के विध्वंस पर पूरी इस्लामी दुनिया ने एतेराज़ किया।
इमाम ख़ामेनेई
6 मई 2013
(8 शौवाल जन्नतुल बक़ी को ध्वस्त किए जाने के दिन के उपलक्ष्य में)
नमाज़ गुज़ारों, ईरानी क़ौम और पूरे इस्लामी जगत को ईदे फ़ित्र की मुबारकबाद पेश करता हूं। अज़ीज़ भाइयो और बहनो इस महीने में जो कुछ आपने हासिल किया है, वह आपके लिए इलाही पूंजी है।
ईमान, अख़लाक़ और अमल की पाकीज़ा जन्नत में दाख़िल होना, नामुनासिब अमल, नापसंदीदा अख़लाक़ और आदतों, ग़लत आस्था व अक़ीदे के जहन्नम से निकलना, ईदे फ़ित्र की दुआ का लक्ष्य है।
युक्रेन के मामले में आसमान सिर पर उठा लेने वाले यूरोप और अमरीका में मानवाधिकार की रक्षा के झूठे दावेदारों ने, फ़िलिस्तीन में इतने ज़ुल्म व सितम पर अपने होंठ सी लिए हैं।
अमरीकी और अमरीका के पिट्ठुओं की नीतियों के बरख़िलाफ़ जो चाहते थे कि फ़िलिस्तीन के मुद्दे को भुला दिया जाए, दिन ब दिन फ़िलिस्तीन का मुद्दा उभरता जा रहा है।