जनाब डॉक्टर पेज़ेशकियान! इस्लामी क्रांति के नेता ने अपने हाल के एक भाषण में विशेष रूप से सरकार की सेवाओं की सराहना की और सरकार के समर्थन पर ज़ोर दिया; उसके बाद एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा कि मौजूदा समस्याओं और कमियों के बावजूद देश प्रगति कर रहा है। इस्लामी क्रांति के नेता के इन दो भाषणों और दो बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए, कृपया पिछले एक वर्ष में सरकार की सबसे महत्वपूर्ण कार्यकारी कार्रवाइयों की एक संक्षिप्त रिपोर्ट प्रस्तुत करें और दर्शकों के लिए देश की प्रगति की प्रक्रिया को समझाएं और स्पष्ट करें;  आप राष्ट्रपति और देश के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी के रूप में इस प्रगति की प्रक्रिया से सबसे अधिक अवगत हैं।

 

बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम

सबसे पहले, हमें इस्लामी क्रांति के नेता का आभार व्यक्त करना चाहिए कि अब तक, खुली बैठकों और निजी बैठकों दोनों में, उन्होंने सरकार का पूरा समर्थन किया है और यदि उनका समर्थन और सुझाव नहीं होते, तो निश्चित रूप से हम कई समस्याओं का सामना करते; इसलिए यह प्रशंसनीय है।

 

हम अब जिस चीज़ को फ़ालोअब कर रहे हैं और जिसे सुधारने का प्रयास कर रहे हैं, वह असंतुलन का मुद्दा है। यदि हम चर्चा करना चाहें, तो हमें कहना चाहिए कि देश में जो प्रक्रिया है, वह कई क्षेत्रों में बड़े असंतुलन का सामना कर रही है। ऊर्जा का मुद्दा — जो शुरुआत में ही सामने आया — पानी का मुद्दा, वित्तीय मुद्दे, प्रबंधन संबंधी मुद्दे, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुद्दे, ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जिनका हम बड़े पैमाने पर सामना कर रहे हैं। जब हमने सरकार संभाली, तो हमारे पास 20,000 मेगावाट ऊर्जा की कमी थी; यह ऊर्जा कमी वर्षों में उत्पन्न हुई थी और स्वाभाविक रूप से एक ओर खपत बढ़ रही थी, दूसरी ओर ऊर्जा सप्लाई के प्रावधान के संबंध में कोई विकास नहीं हुआ था और यह वह वर्ष भी था जब हमारे यहां बारिश कम थी, पिछले वर्षों की तुलना में औसत वर्षा में लगभग चालीस प्रतिशत की कमी आई थी, बांधों के पीछे पानी नहीं था और हमारे पास लगभग 14,000 मेगावाट पनबिजली ऊर्जा थी जिसका उपयोग हम पूरी तरह से नहीं कर सके क्योंकि बांधों के पीछे पानी की कमी थी; यानी हमारी ऊर्जा कमी लगभग 30,000 मेगावाट तक पहुंच गई। ज़ाहिर है जंग भी हुई और युद्ध में भी हमें समस्याओं को हल करना था।

 

इन असंतुलनों के संबंध में जो प्रयास किया गया, वह यह था कि एक ओर हमने लागत और खपत को कम या नियंत्रित करना शुरू किया और दूसरी ओर सबसे तेज़ रास्ता जिससे हम आवश्यक ऊर्जा प्राप्त कर सकते थे, वह सौर पैनल थे जो पर्यावरण की दृष्टि से भी बहुत मूल्यवान उपकरण हैं; इस तरह कि प्रत्येक हज़ार मेगावाट पर, वातावरण में लगभग दस लाख टन CO2 के प्रवेश को रोका जाता है। इस साल हम तीन हज़ार मेगावाट से अधिक पैनलों को ऊर्जा उत्पादन में लगाने में सक्षम हुए हैं, जबकि पिछले वर्षों में केवल हज़ार मेगावाट लगाए गए थे। यह प्रक्रिया जारी है, कल फिर से लगभग आठ सौ मेगावाट सौर पैनल लगाए जाएंगे और यह काम तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, ताकि प्रति सप्ताह लगभग तीन सौ मेगावाट के सौर पैनल लग रहे हैं और जो अनुबंध किए गए हैं वे लगभग 80000 मेगावाट के हैं; यानी यदि हम यह प्रक्रिया जारी रख सकें, तो हम फ़ॉसिल फ़्यूल के उपयोग को तेज़ी से कम कर देंगे। दूसरी ओर, हमने ऐसे पावर प्लांट बनाए थे जो संयुक्त चक्र (कंबाइंड साइकिल) के थे लेकिन केवल गैस का उपयोग करते थे; हमारे पास लगभग 7000 मेगावाट संयुक्त चक्र ऊर्जा है जिसमें से हम 3000 मेगावाट को ऑनलाइन लाने में सक्षम हुए, लेकिन अभी भी 4000 मेगावाट शेष है जिस पर काम किया जा रहा है और इसे अब गैस की आवश्यकता नहीं है, बल्कि भाप से भी ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।

 

बिजली की खपत की प्रक्रिया में, हर साल लगभग 5-6 प्रतिशत की वृद्धि हो रही थी और पाँच-छह प्रतिशत यानी तीन-चार हज़ार मेगावाट अतिरिक्त आवश्यकता। दिए गए सुझावों और कार्यक्रमों के साथ, हमारी वृद्धि दर में 5 प्रतिशत की कमी आई; न केवल हमारी पाँच प्रतिशत वृद्धि नहीं हुई, बल्कि हम पाँच प्रतिशत कम करने में सक्षम हुए; यानी हम लगभग तीन-चार हज़ार मेगावाट को नियंत्रित करने में सक्षम हुए। दूसरी ओर, मौजूदा माइनरों को नियंत्रित और एकत्र करके, हम लगभग दो हज़ार मेगावाट खपत को कम करने में सक्षम हुए। इसलिए, इन सब ने ऊर्जा समस्याओं को कुछ हद तक हल करने में मदद की। बेशक, ये कार्य अभी भी जारी हैं और हम कोशिश करेंगे कि इंशाअल्लाह आने वाली गर्मियों में हमें उस तरह की बिजली कटौती का सामना न करना पड़े, मगर यह कि ख़ुदा न ख़्वास्ता कोई दुर्घटना हो या कोई लाइन ख़राब हो जाए या कोई कारख़ाना बंद हो; लेकिन सौर पैनलों की स्थापना इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रही है कि इंशाअल्लाह ऊर्जा की सप्लाई के लिए कोई समस्या नहीं होगी।

 

हमारी अगली चर्चा उन गैसों के नियंत्रण के बारे में थी जो जल रही थीं। जल रही इन गैसों को नियंत्रित करने से होने वाला लाभ लगभग पाँच-छह अरब डॉलर है और यदि हम इन्हें नियंत्रित कर सकें, तो बहुत बचत होगी। अब तक हम प्रतिदिन लगभग १५ मिलियन क्यूबिक मीटर गैस को नियंत्रित करने में सक्षम हुए हैं, जबकि पिछली अवधियों में कुल मिलाकर ९ मिलियन क्यूबिक मीटर का ही प्रबंधन किया जा सका था। अब जिन अन्य क्षेत्रों में गैस जल रही है, उनके साथ विभिन्न ठेकेदारों ने इस मामले में अनुबंध किए हैं और उनका पालन किया जा रहा है ताकि उन लोगों के साथ भी अनुबंध किया जा सके जिनके साथ अभी तक अनुबंध नहीं हुआ है; हमने बैठक की है और इनका पालन कर रहे हैं ताकि हम अपना काम कर सकें।

 

गलियारों के संबंध में, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं, हम आस्तारा-रश्त गलियारे, शलम्चे-बसरा गलियारे और संभवतः ज़ाहेदान-चाबहार गलियारे को इस साल पूरा कर लेंगे। अब तक शायद दस-बारह हज़ार अरब तूमान से अधिक राशि इस मुद्दे के लिए आवंटित की गई है और संभवतः हमें फिर से इतनी ही राशि का भुगतान करना होगा। आज भी हमारी सरकार में इसी मुद्दे पर बैठक हुई थी और यदि कोई समस्या नहीं आती है, तो ईश्वर की कृपा से, हम इन गलियारों से संबंधित कार्य इस वर्ष पूरा कर लेंगे। शलम्चे-बसरा गलियारे के संबंध में मुख्य कार्य किए जा चुके हैं और इसके खंभे खड़े हो गए हैं। इस गलियारे का सबसे कठिन हिस्सा वह था जहां मार्ग को उस नदी से गुज़रना था जो हमारे और बसरा के बीच है; उस नदी में पानी के नीचे लगाए गए खंभों के लिए लगभग 60 मिलियन डॉलर ख़र्च किए गए, साथ ही माइन-स्वीपिंग भी की गई जो हमने की। बेशक, इराक़ी पक्ष को भी कुछ काम करने हैं जो वे भी कर रहे हैं। आस्तारा-रश्त गलियारा भी एक ऐसी परियोजना थी जो अधूरी रह गई थी और हम उसे आगे बढ़ा रहे हैं। जब हम आए, तो उन्होंने १६० किलोमीटर मार्ग में से लगभग ३० किलोमीटर का अधिग्रहण किया था, लेकिन अब उन्होंने लगभग ११५ किलोमीटर का अधिग्रहण कर लिया है; यानी जितनी ज़मीनों का वे अधिग्रहण करते हैं, उसकी मेक़दार हर हफ़्ते बढ़ रही है और उन्होंने वादा किया है कि इंशाअल्लाह इस वर्ष के अंत तक, वे इस परियोजना को पूरा कर लेंगे। हम हर हफ़्ते पालन कर रहे हैं ताकि हम पूरे मार्ग का अधिग्रहण कर सकें, ऋण भी उपलब्ध है और उस ऋण के अनुसार, यह परियोजना शुरू होगी और विशेषज्ञ आ गए हैं और वे यह काम कर रहे हैं।

 

हमारे पड़ोसियों के साथ संबंध बहुत बेहतर हुए हैं। हमारे पड़ोसी देशों के साथ संबंध कई क्षेत्रों में, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक क्षेत्रों में, विकसित हुए हैं। आज़रबाइजान, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमनिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, इराक़, तुर्किए और फ़ार्स की खाड़ी में ओमान, संयुक्त अरब इमारात, क़तर आदि के साथ संबंधों की प्रक्रिया बहुत बेहतर हुई है। इन सभी समस्याओं के बावजूद, हमारा अंतर्राष्ट्रीय संपर्क मार्ग बढ़ रहा है। चीन, रूस, क़ज़ाक़िस्तान, क़िरक़ीज़िस्तान और ताजिकिस्तान के साथ बहुत अच्छे संबंध स्थापित हुए हैं। अब हम मार्गों को सुधार रहे हैं। गलियारे अब सरकार की प्राथमिकता हैं। हमने उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम मार्ग के लिए आवश्यक संसाधन देखे हैं और अगले वर्ष हम बहुत तेज़ गति से आगे बढ़ेंगे; चाहे सड़क, रेल और पटरियों के निर्माण के संदर्भ में हो या वैगन, डीज़ल और आवश्यक उपकरणों के संदर्भ में। हम इन सभी कार्यों का पालन कर रहे हैं ताकि समस्याओं का समाधान हो सके।

 

सामाजिक मुद्दों के क्षेत्र में, मस्जिद के केंद्रिय रोल, मोहल्ले के केंद्रिय रोल और जन भागीदारी के संबंध में बड़े कार्य किए गए हैं। बेशक, चूंकि ये सामाजिक मुद्दे हैं, शायद इन्हें संख्या और आंकड़ों के रूप में नहीं बयान किया जा सकता; साथ ही, ये मुद्दे समय लेने वाले हैं और स्वाभाविक रूप से व्यवहारिक परिवर्तन आसान काम नहीं है। इस संबंध में, इस्लामी क्रांति के नेता ने हमारे प्यारे भाई हाज आग़ा अली अकबरी को समन्वय करने का आदेश दिया और वे लगभग 10000 मस्जिदों को समन्वित कर सके। हमने इस संबंध में अपने स्वास्थ्य केंद्रों को शामिल किया, स्कूलों को शामिल किया और शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा काम हुआ है; यानी जनता की भागीदारी से, हमने सभी कंटेनर स्कूलों, पत्थर के स्कूलों को ख़त्म किया और जहां स्कूल नहीं थे, वहां स्कूल बनाए गए। यह सब लोगों की मदद, अंतर-विभागीय संबंधों और कल्याणकारी लोगों के सहयोग से किया गया। 10 मिलियन वर्ग मीटर से अधिक जगह बनायी गयी है और अब भी तेज़ी से बनायी जा रही है। स्कूलों के निर्माण के अलावा, स्कूलों के भीतर हार्डवेयर पर भी चर्चा हुई कि हमारे बच्चों को किन चीज़ो की आवश्यकता है ताकि वे उस स्थान पर पर्याप्त शिक्षा प्राप्त कर सकें। और उससे भी महत्वपूर्ण, हमारी कक्षाओं में शिक्षण का तरीक़ा और विधि है। अब हमारी कक्षाओं की व्यवस्था बदल गई है, शिक्षण का तरीक़ा बदल गया है और इन शिक्षण विधियों में दिन-ब-दिन सुधार होगा और हो रहा है। बेशक, हमारा अधिक ध्यान सरकारी स्कूलों और वंचित क्षेत्रों के स्कूलों पर है और हम शैक्षणिक न्याय का पालन कर रहे हैं जिसके बारे में हम बात करते हैं।

 

एक महत्वपूर्ण मुद्दा प्रबंधन और अधिकारों के हस्तांतरण का है। इस्लामी क्रांति के नेता ने गवर्नरों के साथ बैठक में अपना सुझाव दिया कि प्रबंधकों के पास अधिकार होने चाहिए और इस्लामी क्रांति के नेता का दृष्टिकोण शुरू से ही ऐसा रहा है। विशेष रूप से 12 दिवसीय युद्ध में, यह अधिकार प्रकट हुआ और बिना किसी समस्या के, प्रांत अपना काम कर रहे थे; यह उन अधिकारों के कारण था जो हस्तांतरित किए गए थे। बेशक, सम्मानीय संसद ने कुछ क़ानूनी समस्याएं उठाईं जिन्हें हम हल कर रहे हैं। हमारा विश्वास और मानना है कि अधिकारों को प्रांतों में हस्तांतरित किया जाना चाहिए ताकि वे अपना काम कर सकें और हर काम के लिए गवर्नर, काउंटी अधिकारी, विश्वविद्यालय के कुलपति या महानिदेशक को तेहरान आकर अनुमति लेने की आवश्यकता न पड़े। इस संबंध में भी बहुत उपयोगी कार्रवाई की गई है और हमारे बहुत अच्छे परिणाम हैं जो विस्तृत हैं और यदि मैं आपको ये बताना चाहूं, तो मुझे केवल उस प्रक्रिया के बारे में बताना होगा जो हो रही है।

 

स्वास्थ्य और चिकित्सा के संबंध में, हमने परिवार चिकित्सक की चर्चा शुरू की है और अभी हम एक साझा भाषा और दृष्टिकोण पर पहुंच रहे हैं; क्योंकि उन्हें क्या करना चाहिए, यह सिद्धांत में स्पष्ट है लेकिन व्यवहार में, कई बार जो कहा जाता है वह लागू नहीं होता। हमारे द्वारा आयोजित बैठकों में, लगभग ६३ शहर और क्षेत्र चुने गए जो यह कार्य करेंगे और इनमें से 5 शहरों में, उन्होंने पूरे ज़िले को चुना। ख़ैर, कार्य की विधि स्पष्ट है; उन्हें केवल यह सीखने में सक्षम होना चाहिए कि क्या करना है। मुद्दा बहुत स्पष्ट है। परिवार चिकित्सक योजना बताती है कि कौन किस समूह के लिए ज़िम्मेदार है, उस समूह को क्या सेवाएं प्रदान करनी चाहिए और अंततः इस सेवा देने वाले को भुगतान कैसे किया जाना चाहिए। यदि हम ऐसा करते हैं, तो पूरे देश में कोई भी व्यक्ति शासन की नज़रों से दूर नहीं रहेगा; क्योंकि सभी लोग — चाहे ग़रीब हों, अमीर हों, दूरदराज़ के इलाके में हों या नज़दीक — यह स्पष्ट है कि किसे किस सेवा को किस गुणवत्ता के साथ प्रदान करना चाहिए, बिना किसी वित्तीय संबंध के। यदि हम ऐसा कर सकें, तो हम स्वास्थ्य और चिकित्सा प्रणाली में वास्तविक अर्थ में न्याय लागू करेंगे। बेशक, यह व्यवहार परिवर्तन आसान काम नहीं है और यह अपने आप में चर्चा का विषय है।

 

वित्तीय और मौद्रिक मामलों में भी हमने ईंधन अनुकूलन और पेट्रोल और डीज़ल की खपत प्रबंधन संगठन स्थापित किया है, उनके भी अपने विशेष कार्यक्रम हैं। वास्तव में, हमने उस टैबू को तोड़ा कि पेट्रोल की क़ीमतों को छुआ नहीं जा सकता। हमने ख़ुद से शुरुआत की; यानी अब सरकारी कारों में ईंधन कार्ड नहीं हैं और उन्हें आज़ाद रेट में ईंधन लेकर खपत करनी होगी; एक मुक्त क्षेत्र भी है, एक वे भी हैं जो अभी आ रहे हैं। अभी हमने अन्य मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया है, लेकिन हम कोशिश कर रहे हैं कि शहरी उपनगरीय रेलगाड़ी के मुद्दों को ठीक करें, सार्वजनिक परिवहन में सुधार हो, फिर हम अंतर-शहरी कीमतों में भी हस्तक्षेप कर सकें। सबसे महत्वपूर्ण चर्चा जो हम यहां कर रहे हैं वह लोगों की रोज़ी है; यानी यह चिंता है जिसके बारे में शायद हर हफ़्ते हम सरकार और इन प्यारे लोगों के साथ चर्चा करते हैं। इसके लिए संसाधनों पर विचार करना चाहिए ताकि इनके लिए संसाधन उपलब्ध हों और इन संसाधनों के अनुसार हम लोगों की रोज़ी-रोटी में सुधार कर सकें।

 

डॉक्टर साहब! आप सुबह साढ़े छह बजे उठते हैं और सात बजे काम पर होते हैं; रात को कितने बजे सोते हैं?

 

यह टाइम बदलता रहता है; हम कई बार मसलन 5 बजे उठते हैं और रात को 12 बजे घर लौटते हैं।

 

मैंने यह इसलिए पूछा क्योंकि कुछ पश्चिमी मीडिया आप के कुछ बयानों और बातचीत को विकृत कर के यह प्रचार अभियान चला रहे हैं कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान की सरकार और राष्ट्रपति समस्याओं से लड़ने और उन्हें हल करने में असमर्थ हैं। डॉक्टर मसऊद पेज़िश्कियान का इन शत्रुतापूर्ण दावों पर क्या जवाब है?

 

देखिए! उनके द्वारा किए गए सभी विश्लेषणों के आधार पर, उनका विश्वास था कि यदि ज़ायोनी शासन ईरान पर हमला करता है, तो व्यवस्था ढह जाएगी। यह क्यों नहीं ढही? वास्तव में, उनके सारे अनुमान यह थे कि यदि वे हमला करते हैं, तो लोग सड़कों पर उतर आएंगे, समस्याएं पैदा होंगी, लोगों की आजीविका में समस्याएं आएंगी और विभिन्न सेवाएं बाधित होंगी।

 

बेशक युद्ध के दिनों में भी सरकारी सेवाएं नियमित रूप से जारी थीं।

 

पहले से बेहतर थी, क्योंकि अधिकार गवर्नरों के पास थे; मसलन उन बारह दिनों के दौरान, वे हमारे कस्टम्ज़ के ज़रिए  10 मिलियन टन से अधिक माल का स्थानांतरण करने में सक्षम रहे। वही ड्राइवर जिन्होंने विरोध किया था, बहादुरी से आगे आए; जिन लोगों ने विरोध किया था, उन्होंने व्यवस्था और देश की अखंडता का पूरे जोश से बचाव किया; यानी वास्तव में, उन्होंने उनके ख़िलाफ़ आंतरिक एकजुटता, अपनी उपस्थिति और अपनी साझेदारी दिखाई। यह बहुत उच्च मूल्य है जो दर्शाता है कि सरकार के लोगों और इस्लामी क्रांति के नेताओं को इन अवाम पर विश्वास करना चाहिए और इन लोगों के साथ दयालु होना चाहिए। हमारा पूरा प्रयास यह है कि जो कुछ भी हमारे हाथ में है, हम ईमानदारी से और बिना किसी एहसान के इन लोगों की सेवा में लगाएं और इन अवाम की सेवा के अलावा, कम से कम मैं तो यही कहूंगा कि हमें स्वयं कुछ और नहीं चाहिए। लोगों ने भी इन सभी दबावों के बावजूद बहुत सहयोग किया। दुशमन के सारे अंदाज़े यह थे कि यदि हमला किया जाता है, तो देश अशांति में डूब जाएगा; लेकिन लोगों ने अपने ईरान, अपने देश, अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपने इस्लामी क्रांति के नेता का बचाव किया। 2022 में एक घटना हुई, कुछ लोग सड़कों पर उतर आए और इस्लामी क्रांति के नेता का अपमान किया; लेकिन 2024 में सभी सड़कों पर उतर आए और कहा कि हमारी जान इस्लामी क्रांति के नेता पर न्योछावर है। क्या हुआ? लोगों का यह दृष्टिकोण और सामाजिक पूंजी की वापसी बहुत आशाजनक थी और हम इन लोगों की जितनी सेवा करें, वह कम है; इसलिए मुझे उम्मीद है कि हम इन प्यारे लोगों के सामने शर्मिंदा नहीं होंगे।

 

आप इन शत्रुतापूर्ण दावों का क्या जवाब देंगे जो मैंने कहा? उदाहरण के लिए, आपके बारे में हाल ही में पश्चिमी मीडिया ने विश्लेषण प्रकाशित किए हैं कि श्री पेज़िश्कियान कहते हैं कि मैं नहीं कर सकता! जबकि यह उन कार्यों के ठीक विपरीत है जो आप कर रहे हैं।

 

बेशक मैंने कई बार कहा है कि मैं नहीं कर सकता, बल्कि हम कर सकते हैं। देश की समस्याएं ऐसी नहीं हैं कि मैं अकेले उन्हें हल कर सकूं — मैंने यह कई बार कहा है — लेकिन हम पूरी शक्ति के साथ इन समस्याओं, प्रतिबंधों और दबावों को पीछे छोड़ देंगे। यह संभव नहीं है कि हम एक साथ हों और वे हमें बेबस कर सकें। मेरा यह कहना कि हम एक साथ एकता रखें, सद्भाव रखें, यह इसलिए है क्योंकि मेरा विश्वास और मानना भी यही है। चाहे देश के भीतर की बात हो या हमारे पड़ोसियों का मामला हो, यदि हम एकता रखते हैं, तो अमरीका क्षेत्र के देशों का इस तरह शोषण नहीं कर सकता। यह हम हैं जो समस्याओं को हल कर सकते हैं। बेशक, मौजूदा समस्याएं इतनी आसानी से हल होने वाली नहीं हैं। उन्होंने हिसाब लगाया है; ऐसा नहीं है कि बिना हिसाब के आए हैं। आर्थिक, सैन्य, राजनीतिक, सुरक्षा और प्रचार, हर मामले में वे काम कर रहे हैं। हमारा देश अपने पैरों पर खड़ा है। अब उन्होंने कार्यक्रम लिखा है कि उदाहरण के लिए ईरान को 36 महीने में गिर जाना चाहिए! कल तक वे कह रहे थे कि 12 दिनों में गिर सकता है, अब उन्होंने 36 महीने लिखा है। यदि हम साथ रहें, तो 36000 वर्षों तक भी वे ऐसा नहीं कर सकते। साथ रहने के लिए हमें एक साझा भाषा और दृष्टिकोण पर पहुंचना चाहिए, हमें इस्लामी क्रांति के नेता की नीतियों के पीछे चलना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि मतभेदों को दूर रखें, क्योंकि हर मतभेद शासन की प्रक्रिया में असंतुलन पैदा करता है। इन्होंने हमारे रास्ते बंद कर दिए, लेकिन हम रास्ता ढूंढ लेंगे और यदि रास्ता नहीं मिला, तो रास्ता बना लेंगे। यदि हम साथ रहें, तो यह संभव है; लेकिन यदि हम आपस में लड़ें, तो यह संभव नहीं है; क्योंकि यह एक सामान्य और सार्वजनिक चर्चा है और हमें इसी रूपरेखा में चलना चाहिए और समन्वित कार्य करना चाहिए।

 

इस्लामी क्रांति के नेता ने एक संकेत दिया कि सरकार बदलने के बावजूद, व्यवस्था की कुछ नीतियां और बड़ी परियोजनाएं आगे बढ़ रही हैं और श्री पेज़िश्कियान, नए राष्ट्रपति के रूप में, पिछली सरकार की कुछ परियोजनाओं को जारी रख रहे हैं और पूरा कर रहे हैं। कृपया इन में से कुछ परियोजनाओं के बारे में समझाएं और बताएं कि क्या वे कहीं पहुंच गई हैं या आप की तकनीकी राय के अनुसार उनके रास्ते में कोई बदलाव किया गया है।

 

देखिए! मेरे विचार से अब तक हमारी समस्या यह रही है कि हर कोई आता है, अपने लिए एक कार्यक्रम लिखता है; जबकि ज़रूरत  है कि हम मान लें कि हमारे पास एक सामान्य नीति है, एक विजन और 20 साल की योजना है। इस्लामी क्रांति के नेता ने उस 20 साल के विजन दस्तावेज़ में कहा था कि हमें 2024 में कहां होना चाहिए; यदि हम उन नीतियों पर अमल करते, तो क्या हम वहां होते जहां अब हैं? क्यों नहीं हैं? क्योंकि हर कोई आया, सोचा कि उसके पास कार्यक्रम है; जबकि शासन के पास कार्यक्रम था, उसकी नीति स्पष्ट थी और हर कोई जो आता उसे उस कार्यक्रम और नीति को लागू करना होता। चुनाव अभियान के दौरान भी जो चर्चा हमारे साथ होती थी वह इसी बारे में थी कि वे कहते थे कि तुम्हारे पास कार्यक्रम नहीं है। यह नहीं हो सकता कि देश की नीति हो, कार्यक्रम हो, कोई आए और दूसरा कार्यक्रम दे। मैं उस कार्यक्रम को जिसे उन्होंने उन नीतियों के ढांचे में लागू किया, अलग रखकर दूसरा कार्यक्रम और दूसरा रास्ता नहीं चुन सकता। इन सभी समस्याओं के बावजूद, हम पूरी शक्ति के साथ उस रास्ते को जारी रख रहे हैं।

 

पिछली सभी परियोजनाएं जो मौजूद थीं और हमने उद्घाटन किया — चाहे आवास के संबंध में हो, चाहे अधूरी सड़क, रेलवे या जल और अधूरी परियोजनाओं के संबंध में — वहां भी हमने कहा कि यह उनका काम था, हमने उद्घाटन किया है; अब वे 80 प्रतिशत पूरा कर चुके थे, 20 प्रतिशत हमने जारी रखा। ऐसा नहीं है कि हम सोचें कि हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जो दूसरों ने नहीं किया; वास्तव में, हम उस रास्ते को जारी रख रहे हैं जो उन्होंने अपनाया और अब हम प्राथमिकता निर्धारित कर रहे हैं। इस वक़्त ज़मीनी स्तर पर लगभग 7000 परियोजनाएं ऐसी हैं जो वैज्ञानिक और प्रबंधन की दृष्टि से बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हैं। अब हम जिस प्रांत में भी जाते हैं, जो भी प्रस्ताव हमारे पास हैं, उनका हम सटीक पालन कर रहे हैं और लागू कर रहे हैं। आप जांच करें, पता लगाएं कि इनमें से किस प्रांत में हम गए, जहां हमारा कोई प्रस्ताव था और हमने लागू नहीं किया। कुछ स्थानों पर जो कहा और लिखा गया है उसका 100 प्रतिशत लागू किया जा रहा है। हमें ऐसे वादे नहीं करने चाहिए जिन्हें हम पूरा नहीं करते या कर नहीं सकते। अब हम कोशिश कर रहे हैं कि जो मार्ग हैं और जो परियोजनाएं मौजूद हैं, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर, शक्ति और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ाएं।

 

कृपया इसके दो-तीन उदाहरण दें।

 

उदाहरण के लिए, मेहर आवास योजना; हमने 50000 से अधिक वंचितों के लिए आवास निर्माण के अलावा अधूरे रह गए आवासों को पूरा किया। जल आपूर्ति योजनाओं के संबंध में, तालेक़ान से तेहरान तक पानी पहुंचाने का मार्ग एक बड़ी परियोजना थी; ख़ैर हमने बजट आवंटित किया और इसे पूरा किया और यह वही मार्ग था जिसे उन्होंने जारी रखा था। उदाहरण के लिए, ज़ाहेदान-चाबहार गलियारे को उन्होंने शुरू किया था, हम इसे पूरा कर रहे हैं; यहां तक कि आस्तारा-रश्त मार्ग को भी उन्होंने शुरू किया था, लेकिन हम इसे पूरा करने के लिए पूरी शक्ति से आगे बढ़ रहे हैं। अब बूशहर में मौजूद परमाणु ऊर्जा से संबंधित परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है जिससे लगभग 2000 मेगावाट बिजली उत्पन्न होगी। हम पूरी शक्ति के साथ इनका पालन कर रहे हैं। बेशक, इस में समय लगेगा और इतना आसान नहीं है। हमने ख़ुद से कुछ नहीं निकाला है; ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जो पहले से मौजूद थे और हम उसी मार्ग को जारी रख रहे हैं।

 

डॉक्टर साहब! इस्लामी क्रांति के नेता ने पानी, रोटी, भोजन, पेट्रोल और ऊर्जा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में फ़ुज़ूलख़र्ची की समस्या के बारे में कई बार चेतावनी दी है और इसे एक बड़ी समस्या बताया है। विशेष रूप से, विभिन्न क्षेत्रों में फ़ुज़ूलख़र्ची को कम करने के लिए आपकी सरकार की योजना क्या है?

 

हम यह काम कर रहे हैं और इस्लामी क्रांति के नेता अपने सुझावों और समर्थन से हमारी बहुत मदद कर रहे हैं। दिए गए सुझावों के साथ, पानी की खपत में 10 प्रतिशत की कमी आई है। क्या आप जानते हैं कि 10 प्रतिशत प्रति वर्ष कितने मिलियन क्यूबिक मीटर होता है? इस ओर से पानी की खपत कम करने के साथ, बिजली की खपत भी कम हुई। मैंने कई बार कहा है कि हम लगभग १८० अरब डॉलर, यानी प्रतिदिन लगभग ९ मिलियन बैरल तेल और गैस का उत्पादन करते हैं, लगभग डेढ़ मिलियन बैरल का निर्यात करते हैं, बाक़ी हम खपत करते हैं; अब यदि हम 10 प्रतिशत बचत करें — जो बहुत आसानी से संभव है — तो प्रतिदिन लगभग 9 लाख बैरल तेल और गैस बचेगी। केवल यह 10 प्रतिशत, मौजूदा सभी खाई को भर देगा; यानी वे सभी समस्याएं जिनसे लोग अब असंतुष्ट हैं; आजीविका, रास्ते, सड़क और आगे के विकास को। इसके बजाय कि हम मान लें कि 9 मिलियन बैरल तेल और गैस जलाते हैं, इसका 10 प्रतिशत बचाएं; यह बहुत बड़ी राशि है।

 

हम यूरोप से दो-तीन गुना अधिक बिजली की खपत करते हैं; हम जितनी गैस खपत करते हैं, उनके साथ बिल्कुल तुलना नहीं की जा सकती। गैस और ऊर्जा के मामले में हम दूसरे नंबर के देश हैं, लेकिन अब हम उद्योगों, पेट्रोकेमिकल्स और कारख़ानों की गैस काट रहे हैं; क्यों? क्योंकि हमने ठीक से प्रबंधन नहीं किया, ठीक से आवंटन नहीं किया, ठीक से खपत नहीं करते। ज़रूरी नहीं कि हम इस तरह ख़र्च करें जैसे अब कर रहे हैं। मैंने कुछ रिपोर्टें देखीं कि उसी अमरीका में, जब उन्हें थोड़ा संकट का सामना करना पड़ा, तो उनके राष्ट्रपति ने घोषणा की कि अपने घरों को 21 डिग्री से अधिक गर्म न करें। अब मेरे कार्यालय का तापमान 21 डिग्री से अधिक नहीं है। हम तापमान 28 या 30 पर रखते हैं, फिर भी अपनी शर्ट उतार देते हैं; कभी-कभी खिड़की भी खोल देते हैं, और हीटर या रेडिएटर भी चालू है! क़ुरआन में कहा गया है: "खाओ और पियो और फ़ुज़ूलख़र्ची न करो, निश्चय ही वह फ़ुज़ूलख़र्ची करने वालों को पसन्द नहीं करता।" हम एक कमरे में बैठे हैं, चालीस बल्ब जला रखे हैं! क्या ज़रूरत है? हर कोई थोड़ा नियंत्रण करे, तो हम अपनी बहुत सी समस्याओं को हल कर सकते हैं। हमें दूसरों की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है, बशर्ते कि हम स्वयं जो कुछ हमारे पास है उसका सही प्रबंधन कर सकें। हमारा देश सोने और खदानों से भरा है, लेकिन यह हमारा व्यवहार है जो यह तय करेगा कि इन सोने और खदानों का उपयोग कर पाएंगे या नहीं।

 

यानी यहाँ का तापमान 21 डिग्री से अधिक नहीं जाता?

 

मैं जब यहां आया, तो मैंने विरोध किया; क्योंकि जब हम यहां नहीं होते, तो उन्हें यहां गर्म करने का कोई अधिकार नहीं है।

 

नहीं, गर्म नहीं था डॉक्टर साहब।

उन्होंने कहा था कि अभी-अभी चालू किया है, वरना हम इन्हें बंद कर चुके हैं। हम अपने अधिकांश कमरों में अब हीटर नहीं चलाते; क्योंकि जब मैं वहाँ नहीं जाता, तो उसे चालू रखने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं एक घंटे के लिए वहाँ जाना चाहता हूँ, तो क्या 24 घंटे वहाँ हीटिंग चालू रहनी चाहिए? मैं अपना काम एक जगह करता हूँ और इस कमरे से उस कमरे में नहीं जाता; ऐसा करने की क्या ज़रूरत है? बहुत आसानी से बचत की जा सकती है। मैंने कहा है कि हमारे अपने घर में एक दीवार या पर्दा लगा दें ताकि हम एक छोटी सी जगह को, मान लीजिए उसी 21 या 22 डिग्री तक गर्म कर सकें, बाक़ी को बिल्कुल गर्म न होने दें; बस इतना काफ़ी है। जब मैं पाँच-छह मीटर के कमरे में बैठ सकता हूँ, तो मेरे लिए एक बड़े कमरे को गर्म या ठंडा करने की क्या ज़रूरत है? इस्लामी क्रांति के नेता का सुझाव भी यही है, अल्लाह भी कहता है कि अगर तुम मुसलमान हो तो फ़ुज़ूलख़र्ची न करो। मैं अभी अपने दफ़्तर में किताब पढ़ना चाहता हूँ, तो पूरी इमारत की लाइट जला देते हैं क्योंकि मैं वहाँ बैठा हूँ! क्यों? हमने अब स्टडी लैंप लगा लिया है, हम स्टडी लैंप से अपना काम करते हैं; मुझे वहाँ कोई और काम नहीं है, तो बाक़ी लाइटें बंद कर देते हैं। पूरे कमरे की लाइट जलाने की क्या ज़रूरत है सिर्फ़ इसलिए कि मुझे दो दस्तख़त करने हैं? अगर हम दस प्रतिशत बचत कर सकें, तो वह भी बहुत बड़ी मात्रा है। बेशक हम इससे कहीं ज़्यादा नियंत्रण कर रहे हैं। यहाँ एक स्विमिंग पूल बनाया गया था, जो लगातार गर्म रहता था; हमने पूछा कि आप इसे गर्म क्यों रखते हैं। अब मान लीजिए किसी दिन मुझे वहाँ तैरने जाना है। हमने कहा इसे हटा दो। बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। जब भी मुझे स्विमिंग पूल जाना हो, मैं एक सार्वजनिक पूल में चला जाता हूँ; चौबीसों घंटे एक निजी पूल को बनाए रखने की कोई ज़रूरत नहीं है कि अब किसी एक दिन कभी मुझे वहाँ तैरने जाना है।

 

क्या आप अपने ऊपर ज़्यादा सख़्ती नहीं कर रहे हैं?

नहीं, हम इन्हीं कठिनाइयों में बड़े हुए हैं। अभी भी हमारे पास उम्मीद से कहीं ज़्यादा है। मेरे ख़याल से, हम अमरीका, इस्राईल और यूरोप के साथ पूरी तरह युद्ध में हैं; वे नहीं चाहते कि हमारा देश खड़ा रहे। यह युद्ध हमारे और इराक़ के युद्ध से भी बदतर है; अगर कोई अच्छी तरह समझे, तो यह युद्ध उस युद्ध से कहीं ज़्यादा जटिल और कठिन है। इराक़ के साथ युद्ध में, स्थिति स्पष्ट थी; वह मिज़ाईल दागता था, और मुझे भी पता था कि मैं कहाँ मार रहा हूँ। यहाँ अब हर तरह से हमें घेर रहे हैं, हमें मुश्किल और तंगहाली में डाल रहे हैं, परेशानी पैदा कर रहे हैं — आजीविका, संस्कृति, राजनीति और सुरक्षा के मामले में — और समाज की अपेक्षाएं बढ़ा रहे हैं; एक ओर तो हमारी बिक्री, हमारे लेन-देन, हमारे व्यापार को रोक रहे हैं, दूसरी ओर समाज में अपेक्षाएं बढ़ गई हैं! नतीजतन, सभी को पूरी ताक़त से मदद करनी चाहिए और देश को ठीक करना चाहिए।

 

डॉक्टर साहब! ऐसा लगता है कि दुश्मन ने 12 दिन के युद्ध में असफलता और हार के बाद अपने व्यवहार और नीति में बदलाव किया है और एक तरह के मनोवैज्ञानिक और मीडिया अभियान पर उतर आया है, इस आधार पर कि ईरान पूरी तरह से और सरकार विशेष रूप से कमज़ोर हो और उसके सामने घुटने टेकने के अलावा कोई चारा न रहे। राष्ट्रपति और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख के रूप में इस मीडिया अभियान का आपके पास क्या जवाब है?

इन्हें इसी भ्रम में रहने दीजिए। इन्होंने इसी भ्रम में हमला किया, लेकिन आंतरिक एकता और मज़बूती बढ़ गई। इस्लामी क्रांति के नेता अब जो काम कर रहे हैं, उसके पीछे सभी संस्थाओं का तालमेल बन रहा है और अगर एकता और सहमति क़ायम हो जाए, तो कोई भी ताक़त एक संगठित और एकजुट राष्ट्र को नहीं ढा सकती। मेरी चिंता — किसी भी सैन्य ताक़त से ज़्यादा महत्वपूर्ण — आंतरिक एकता और एकजुटता है और मतभेदों को एक तरफ़ रखकर हाथ मिलाकर समस्याओं को हल करना है। हमने क्यों कहा कि काम मोहल्ला-केंद्रित हों, मस्जिद-केंद्रित हों और लोगों को भागीदार बनाया जाए? लोगों की नीति-निर्माण में हिस्सा और भागीदारी होनी चाहिए। हमें लोगों को फ़ैसले लेने में शामिल करना चाहिए। हमने युद्ध कैसे चलाया? क्या सरकार के पास पैसा था? उस समय भी अमरीका और अरब देश इराक़ की, सद्दाम की मदद कर रहे थे; क्या वे हमारी एक इंच ज़मीन ले पाए? सारी ताक़तें उनकी मदद कर रही थीं। लोग ही थे जिन्होंने यह काम किया। हमें वही लोग और वही प्रबंधक चाहिए उसी सोच के साथ; यानी ऐसे लोग और प्रबंधक चाहिए जो जानते हों कि देश उनका अपना है, इलाक़ा उनका अपना है और वे पूरी ताक़त से अपनी समस्याएँ हल कर सकते हैं।

 

हम अपनी समस्याएँ हल कर रहे हैं; जिस बात की ओर से मैं चिंतित हूँ और बार-बार कह चुका हूँ, वह सिर्फ़ यह है कि हम मतभेदों को दूर कर पाएँ। वे मतभेदों को हवा दे रहे हैं; हमें सावधान रहना चाहिए कि मतभेद हमें न घेर लें। अगर मतभेद हैं भी, तो बंद कमरों में बैठकर आपस में झगड़ लें; लेकिन जब हम बाहर जाएँ, तो व्यवस्था से एक ही आवाज़ निकले और वह आवाज़ वह दिशा और रास्ता हो जो इस्लामी क्रांति के नेता दिखाते हैं। हो सकता है मेरे मन में कुछ और हो लेकिन जब रास्ता साफ़ है, तो सभी को उसी रास्ते पर चलना चाहिए। और अगर हम सब एकजुट हों, तो इन समस्याओं पर क़ाबू पा लेंगे; वे जो चाहें कर लें। अगर हम देश में न्याय और निष्पक्षता लागू कर सकें और लोगों को फ़ैसले लेने और नीतियों में शामिल कर सकें और लोग देखें कि हम किन समस्याओं से जूझ रहे हैं, तो वे ख़ुद ही समस्याएँ हल करने में मदद करेंगे।

 

वर्तमान स्थिति में, आर्थिक दबाव बहुत ज़्यादा है और देश भी युद्ध की स्थिति में है, बड़ी संख्या में लोग इसे समझते भी हैं। राष्ट्रपति महोदय लोगों की आर्थिक स्थिति को कितना महसूस करते हैं और उससे कितना वाक़िफ़ हैं?

 

हम लोगों की आर्थिक समस्याओं को पूरी तरह समझते हैं। हम तेल लगभग 75 डॉलर (बैरल) में बेचते थे, अब 50 डॉलर में बेचते हैं; यानी हम 25 डॉलर कम में बेच रहे हैं। एक तरफ़ दबाव डाला और हमारी आमदनी कम हुई, एक तरफ़ युद्ध था और हमारी सेवाओं और उत्पादन में कुछ कमी आई। इन सबके बावजूद, तय हुआ है कि ईद तक लगभग 2.5 अरब डॉलर का पैसा परिवर्तित किया जाए और जहाँ तक संभव हो, आबादी के उस भाग को ज़रूरी राशन कूपन दिए जाएँ जो हमारे मद्देनज़र है। यह पेट्रोल का पैसा, अब 5000 तूमान की रक़म नहीं रह गई है, लेकिन तय हुआ है कि सरकार इस पैसे में से जो भी मिले, उसे राशन कूपन या लोगों की आजीविका पर ख़र्च करे। हमने अगले साल के लिए संसद से बात की है कि किसी भी तरह लोगों की आजीविका सुनिश्चित की जाए। हमें संसद, प्रतिनिधियों और यहाँ तक कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के साथ एक साझा सुर और नज़रिए पर पहुँचना होगा; जहाँ पैसा नहीं देना चाहिए, वहाँ न दें, जहाँ सब्सिडी नहीं देनी चाहिए, वहाँ न दें, जहाँ देनी चाहिए, वहाँ सहमति बनाकर दें।

 

इस पेट्रोल के मामले में, आपको क्या लगता है कि हम हर टैंक पेट्रोल पर कितनी सब्सिडी दे रहे हैं? जो कोटा हम देते हैं, उसके हिसाब से महीने में लगभग आठ लाख तूमान है और तब है जब वह साठ लीटर और सौ लीटर की सीमा में खपत करता है; अगर ज़्यादा खपत करता है, तो हर टैंक पर लगभग बीस लाख तूमान तक पहुँच जाता है; अब अगर दो टैंक हों, तो देखिए कितना हो जाता है। हम इस तरह पैसा क्यों ख़र्च कर रहे हैं? हम यह सब्सिडी सबको क्यों नहीं देते? जब भी हम हस्तक्षेप करते हैं, कुछ लोग चिल्लाने लगते हैं कि आप महंगाई क्यों बढ़ा रहे हैं। हम महंगाई नहीं बढ़ा रहे; हम चाहते हैं कि जो मिले वह सबको मिले। अगर मुझे एक कार के टैंक पर सात लाख, दस लाख या 20 लाख सब्सिडी देनी है, तो मैं यह सब लोगों को दूँगा; मैं सबको उनके हिस्से के अनुसार दूँगा। हमारे मीडिया को इस का सपोर्ट करना चाहिए और इसका माहौल बनाना चाहिए। हम अपनी सरकार के लिए पैसा नहीं रखेंगे, सब्सिडी से कुछ भी नहीं काटेंगे, लेकिन हम यह सब्सिडी सबको देना चाहते हैं। मेरे घर में जितनी कारें हैं, मेरी खपत के हिसाब से, हर टैंक पर मुझे आठ लाख, नौ लाख या दस लाख सब्सिडी मिल रही है; उसी समय, कुछ लोगों के पास रात की रोटी खाने को नहीं है! क्यों?

 

आँकड़ों के अनुसार भी शायद सिर्फ़ पचास-साठ प्रतिशत लोगों के पास निजी वाहन हैं।

 

हाँ,यह भी चर्चा का विषय है और पूरी तरह स्पष्ट है। हम पैसा सब को क्यों नहीं देते और सिर्फ़ उन्हें देते हैं जिनके पास कार है? यह संस्कृति बनानी होगी। हमने अगले साल के लिए इस मामले में लोगों से, प्रतिनिधियों से और सरकार से बात करने का फैसला किया है ताकि एक साझा स्वर बने। हम सरकार के लिए कोई पैसा नहीं चाहते। यह पैसा सबको मिलना चाहिए, न यह कि जिसके पास कई कारें हैं वह सारी सब्सिडी ले ले। हमने इस साल लगभग पाँच मिलियन डॉलर का पेट्रोल आयात किया है; हमने इसे 60 हज़ार तूमान में खरीदा, और इसे 1500 या 3000 तूमान में बेच रहे हैं! क्यों? तब हम लोगों की आजीविका तक नहीं पहुँच पाते। यह वह चीज़ है जिसके लिए हम सभी को एक दूसरे का हाथ थामना चाहिए और अगर हम न्याय चाहते हैं, तो यह पैसा सबको देना चाहिए और अगर हम सबको दे पाए, तो अगर किसी के पास पैसा है तो ख़र्च करे, अगर पैसा नहीं है तो अपने हिस्से का उपयोग करे। इसके लिए समन्वय की ज़रूरत है, बातचीत की ज़रूरत है, लोगों के साथ संवाद की ज़रूरत है, लोगों के भरोसे की ज़रूरत है। हमने इस साल जो कुल बजट संसद को दिया है, उसमें 2 प्रतिशत की वृद्धि है; जबकि पिछले साल हम 40 प्रतिशत या 50 प्रतिशत की वृद्धि और ख़र्च करते थे। हमने अपना ख़र्च कम करने की कोशिश की; हमने संसद से भी कहा कि जहाँ तक हो सके हमारा ख़र्च कम कर दें, ज़्यादा ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं है।

 

उन्होंने कहा कि आपने अगले साल का बजट बहुत संकुचित तरीक़े से तैयार किया है।

नहीं, अभी भी बहुत गुंजाइश है; अभी भी बहुत गुंजाइश है कि हम अपने बहुत से ख़र्चे कम कर सकें। हम ज़्यादा ख़र्च क्यों कर रहे हैं? हमारे मानव संसाधन की उत्पादकता और हमारी सेवाओं का तरीक़ा इससे कहीं बेहतर हो सकता है और यह वह काम है जिसके लिए सहयोग, एकजुटता और एक स्वर होने की ज़रूरत है। हम बहुत से काम नहीं कर सकते। लोगों की आजीविका हमारी प्राथमिकता है। मैं मोबाइल फ़ोन के लिए पैसा नहीं दे सकता, लेकिन लोगों की आजीविका के लिए देना होगा। हमने अब तक डेढ़ अरब दिया है और मोबाइल फ़ोन आयात किए गए हैं, लेकिन अब हम लोगों की आजीविका और आवश्यक वस्तुओं में फँसे हुए हैं। बेशक हम ने उसे कम क़ीमत वाली विदेशी मुद्रा नहीं दी, लेकिन आख़िरकार विदेशी मुद्रा तो दी। ख़ैर, मुझे पहले लोगों की आजीविका के लिए विदेशी मुद्रा देनी चाहिए और अगर बची तो बाक़ी कामों के लिए दूँगा; अगर नहीं बची, तो अब निर्यात करे और अपने निर्यात के आधार पर अपनी सेवाएँ भी उसी से ले।

 

इस के लिए सोच में बदलाव की ज़रूरत है, माहौल बनाने की ज़रूरत है। बिजली भी ऐसी ही है, गैस भी ऐसी ही है। मान लीजिए मेरे पास चार घर हैं, चार इमारतें हैं, मुझे उन सभी पर गैस सब्सिडी मिलती है, बिजली सब्सिडी मिलती है; किसी और के पास घर नहीं है, उसे घर किराए पर लेने के लिए भारी पैसा देना पड़ता है। ख़ैर जब आप इस मामले में हस्तक्षेप करते हैं, तो सब चिल्लाने लगते हैं कि महंगाई बढ़ा दी! हम महंगाई नहीं बढ़ा रहे; हम चाहते हैं कि जो है वह सबको मिले। अगर यह सोच स्वीकार कर ली जाए और लोग हमारे साथ सहयोग करें, तो ज़्यादा से ज़्यादा मेरे एक घर को गैस सब्सिडी दी जाए और एक हिस्सा दिया जाए कि हम तुम्हें इतनी गैस मुफ़्त देते हैं; लेकिन मेरे बाक़ी घरों के लिए गैस, मान लीजिए तीन सौ तूमान की क़ीमत पर क्यों दी जानी चाहिए? और यह वह चीज़ है जिसमें हमारे टीवी-रेडियो, हमारे प्रिय प्रतिनिधि, हमारे प्रिय धर्मगुरु और हमारे राजनीतिक दलों को मदद करनी चाहिए कि हम इस देश में न्याय और निष्पक्षता लागू करें। तब किसी को भी भूख और आजीविका की समस्या नहीं होगी। हमारे पास पैसा है, लेकिन हम ग़लत तरीक़े से ख़र्च करते हैं; हमें इसका ठीक तरह से प्रबंधन करना होगा।

 

डॉक्टर साहब! क्या इस हफ़्ते या पिछले हफ़्ते आर्थिक और रोज़गार के मुद्दों पर इस्लामी क्रांति के नेता के साथ कोई बैठक हुई थी? उनके साथ आपकी आख़िरी बैठकों में, अवाम के रोज़गार और आर्थिक मुद्दों पर उन्होंने कौन से विशेष सुझाव और बिंदु रखे?

 

हम हर हफ़्ते बहरहाल इस्लामी क्रांति के नेता से मिलने का मौक़ा पाते हैं और मौजूदा रिपोर्टों और दिशाओं के बारे में उनसे सलाह लेते हैं। वे हमें और अन्य संस्थाओं को और जहाँ ज़रूरी है वहाँ के लोगों को सुझाव देते हैं और मामलों पर कुछ नियंत्रण होता है। देखिए! इस्लामी क्रांति के नेता की प्राथमिक चिंता लोगों की रोज़ी रोज़गार है; यानी उनकी सबसे बड़ी चिंता भी लोगों की आजीविका है। हम जो काम कर रहे हैं और जो योजनाएँ बना रहे हैं, उसके लिए ज़रूरी है कि हम सब एकजुट हों और साथ-साथ आगे बढ़ें; अगर ऐसा होता है और हमारे मीडिया, हमारी संसद और बाक़ी संस्थाएँ समन्वय करें, तो कम से कम अगले साल के लिए हम ऐसा कुछ कर सकते हैं कि लोग रोज़गार की दृष्टि से परेशान न हों और उनकी खाद्य जरूरतों की क़ीमतें अब न बढ़ें; हम यह काम कर सकते हैं। हमने यह मामला उनके सामने रखा, उनकी राय सकारात्मक थी। हमने लगभग बीस बिंदुओं वाली एक योजना पेश की और सरकार, संसद और कुछ संस्थाओं के विभिन्न आर्थिक समूहों ने इन बीस बिंदुओं को लागू करने के लिए समन्वय किया है। क्योंकि वे विदेशी मुद्रा की स्थिति, आवश्यक वस्तुओं, सेविंग, मुद्रास्फीति और इस तरह की चीज़ों को लेकर चिंतित थे, सत्रह-अठारह बिंदु थे जिनके बारे में हमें रिपोर्ट देने में सक्षम होना चाहिए।

 

देखिए! एक बच्चा बीमार है, उसे चोट लगी है, आपको उसे टाँके लगाने पड़ेंगे; अगर आप इस बच्चे को आइसक्रीम देंगे तो उसे अच्छा लगेगा, लेकिन जो कोई भी उसे टाँके लगाना चाहेगा वह उससे नाराज़ और परेशान हो जाएगा, चीख़ने-चिल्लाने लगेगा। हमें इस मामले में समस्या है और इसके लिए हस्तक्षेप की ज़रूरत है, यह हस्तक्षेप भी दर्दनाक है। लोगों को पता होना चाहिए कि हमारा इरादा यह है कि हम उन चोटों को ठीक कर सकें और इन चोटों पर टाँके लगाना महँगा है। अगर आप कहें कि मैं यह दूँगा, यह दूँगा, यह दूँगा, तो सबको अच्छा लगेगा; जब आप कहेंगे कि यह नहीं दूँगा, यह नहीं दूँगा, तो सब नाराज़ होंगे कि क्यों नहीं दे रहे। हमें अपनी खपत पर नियंत्रण करना चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा कि खपत न करें; मैं कह रहा हूँ कि हमें अपनी खपत पर नियंत्रण करना चाहिए। 10 प्रतिशत की कमी बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। सभी एक क़दम आकर हमारी मदद कर सकते हैं, हमारे देश की, हमारे ईरान की और उस समाज की मदद कर सकते हैं जिसमें हम रहते हैं। ऐसा होने पर हम इन सभी समस्याओं से आसानी से उबर जाएँगे।

 

मैं जो कहता हूँ कि आकर मदद करो, इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपना काम नहीं कर रहे; हम पूरी ताक़त से अपना काम कर रहे हैं, कुछ काम ऐसे भी कर रहे हैं जो अभी नहीं बताऊँगा, क्योंकि वे शरारत करके उसका रास्ता रोक देंगे; हम अपना काम पूरी ताक़त से कर रहे हैं। लेकिन अगर इस मामले में हर कोई जहाँ भी कर सकता है एक छोटी सी मदद करे, तो हालात बिल्कुल बदल जाएँगे। हम अपने को किसी की मदद से वंचित नहीं करना चाहते; जो भी कर सकता है, आकर मदद करे। मैं कल संसद में बोल रहा था, श्री कुचकज़ादेह ने कहा कि पानी इस तरह ठीक करते हैं। ख़ैर उन्हें लगता है कि विचार के स्तर पर हम से 180 डिग्री का अंतर है। मैंने उनसे कहा कि मैं आपको अधिकार देता हूँ, इलाक़ा देता हूँ, जाइये अपने इस विचार को लागू कीजिए और समस्या ठीक कीजिए। वे कहते हैं कि यह इस तरह नहीं होगा, यह इस तरह होगा; मैंने कहा कि अगर आप ठीक कर सकते हैं, तो आइये और ठीक कीजिए। ख़ैर देश बड़ा है और हमें हर जगह समस्या है; एक हिस्सा लेकर ठीक करके दिखाइये कि आप कैसे ठीक करेंगे। मैदान के किनारे खड़े होकर लगातार यह नहीं कहा जा सकता कि उसे मोड़िए!  आप आइये और उसे मोड़कर दिखाइये कि आप उसे कैसे मोड़ सकते हैं।

ये समस्याएँ भी जो हमारे सामने आई हैं, अभी पैदा नहीं हुई हैं, शहीद रईसी के समय भी पैदा नहीं हुई थीं; एक प्रक्रिया चल रही थी, समस्याएँ लगातार बढ़ती जा रही थीं, अब हमें उसके सामने खड़े होना होगा; अगर हम उसके सामने खड़े होंगे, तो टाँके लगेंगे, कभी-कभी व्यापक सर्जरी भी करनी पड़ेगी। ख़ैर हमारे विशेषज्ञों, हमारे वैज्ञानिकों, हमारे प्रतिभाशाली लोगों, निवेशकों और उत्पादकों को सभी को एक साझा समझ पर पहुँचना चाहिए कि अगर हम यह हस्तक्षेप कर रहे हैं, तो यह हमारे समाज के हित में है, यह नहीं है कि हम अपने लोगों के लिए समस्याएँ पैदा करना चाहते हैं। हम यहाँ लोगों की सेवा करने के लिए हैं; कम से कम मेरे दिल में कोई और इरादा नहीं है, सिवाय इसके कि हम अपने लोगों की समस्याएँ हल कर सकें।

 

डॉक्टर साहब! दुश्मन के प्रचार के कारण, हमारे कुछ लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि शायद अमरीकी और इस्राईली दुश्मन फिर से शरारत करना चाहेगा। इन चिंताओं के प्रति राष्ट्रपति महोदय का क्या जवाब है? बेशक हम ने 12 दिन के युद्ध के दौरान देखा कि सरकारी सामान्य सेवाएँ भी बाधित नहीं हुईं और पहले से निर्धारित समन्वय, सहयोग और योजना के साथ समाज सामान्य रूप से चलता रहा।

 

देखिए! हमारी प्यारी सैन्य फ़ोर्सेज़ पूरी ताक़त से अपना काम कर रही हैं और अब उपकरणों और मैन पावर के मामले में, हमारी सभी समस्याओं के बावजूद, उस समय से कहीं ज़्यादा मजबूत हैं जब उन्होंने हमला किया था। इसलिए अगर वे टकराव चाहेंगे, तो स्वाभाविक रूप से उन्हें और ज़्यादा ठोस जवाब मिलेगा। लेकिन मैं फिर से इस बात पर लौटता हूँ कि अगर हम लोग एकजुट हों और एकता बनाए रखें, तो वे हमारे देश पर हमला करने के बारे में सोचकर ही निराश हो जाएँगे। इनकी उम्मीद है — अपनी बातों में उन्होंने यह कहा भी है — कि अंदरूनी स्तर पर कुछ घटना घटनी चाहिए ताकि वे आकर हस्तक्षेप शुरू कर सकें। मैं लगातार यह कहता रहता हूँ कि अगर कोई बहस है भी, तो बेहतर है कि हम कमरों में बैठकर आपस में झगड़ लें लेकिन बाहर एक आवाज़ बन जाएँ, इसका कारण यह है कि अगर हमारी एकता और मज़बूती होगी, तो लोग समझेंगे कि हम वास्तव में सेवा करना चाहते हैं और हम किसी भी लिंग, किसी भी जातीयता, किसी भी विश्वास और धारणा के बीच कोई अंतर नहीं करते। मैं देश के प्रमुख के रूप में न्याय के आधार पर सभी की सेवा करने के लिए बाध्य हूँ। अगर हम शिया हैं, अगर हम कहते हैं कि हम हज़रत अली के अनुयायी हैं, तो हज़रत अली ने अपने भाई अक़ील को, जो ख़ज़ाने से ज़्यादा चाहते थे, कुछ नहीं दिया। सच कहूँ तो अगर हम यह करते, तो क्या लोग हमसे नाराज़ होते? कुछ जगहों पर हमने नहीं किया, लोग हमसे नाराज़ हैं।

 

ख़ैर अब साबित होना चाहिए। थ्योरी और कहने से नहीं होता। मुझसे कहते हैं आओ बोलो; ख़ैर हम एक उम्र से बोल रहे हैं। मुझे साबित करना होगा कि मैं लिंग, जातीयता, नस्ल और भाषा के बीच कोई अंतर नहीं करूँगा। ये सब अल्लाह, पैग़म्बर और इमाम के आदेश हैं; ख़ैर हमें अमल करना चाहिए। अगर हम इस्लाम और पैग़म्बर के आदेशों और इमाम के आदेशों पर अमल करें, तो हमारे समाज में एकता, मज़बूती और सहमति पैदा होगी कि दूसरे लोग ईर्ष्या करेंगे कि काश हम भी ऐसे होते। हमें एक-दूसरे से ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए जो शोभा नहीं देतीं। शैतान इंसान का दुश्मन है और चाहता है कि हम एक-दूसरे से कठोर बोलें, ग़लत बोलें ताकि हम आपस में झगड़ें।

 

हमें अपना समय देने के लिए धन्यवाद। हम आपके और सम्मानीय सरकार के लिए सफलता की कामना करते हैं।

हम सब एक हैं; नतीजतन, हम और सरकार कोशिश कर रहे हैं। वे कहते हैं:

यह 'मैं' और 'हम' सब बुद्धि और बेड़ियाँ हैं

मस्तानों की एकांत में न 'मैं' है न 'हम'

सब वही है। अब अल्लाह करे कि हम ईश्वरीय रास्ता जारी रख सकें और वह आदर्श जो इस्लामी क्रांति के नेता इस्लाम और इस्लामी जीवन से चाहते हैं, हमें अपने व्यवहार में दिखाना चाहिए, अपनी बातों में नहीं; हम काफ़ी बोल चुके हैं। सफल रहें। ख़ुदा आपको ताक़त दे।