पुराने ज़माने में ज़्यादातर कहा जाता था कि लड़की को निभाना चाहिए, जैसे वो इस बात को मानते ही नहीं थे कि लड़के को भी निभाना चाहिए। नहीं! इस्लाम यह बात नहीं कहता; इस्लाम कहता है कि लड़की और लड़के दोनों को निभाना चाहिए। दोनों को एक दूसरे के सार्थक पहूल को देखना चाहिए और यह तय करना चाहिए कि घरेलू ज़िन्दगी एक दूसरे से इश्क़ व मोहब्बत के साथ, पूरी तरह इत्मेनान, सुकून और पारदर्शी तरीक़े से गुज़ारेंगे, जारी रखेंगे और इसकी हिफ़ाज़त करेंगे। अगर ऐसा हो गया जो कि इंशाअल्लाह इस्लामी तरबियत के साथ मुश्किल भी नहीं है तो ऐसी फ़ैमिली वैसी स्वस्थ फ़ैमिली होगी जैसी इस्लाम चाहता है। इमाम ख़ामेनेई 2/08/1995
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