धन संपत्ति इकट्ठा करना और अल्लाह की राह में ख़र्च न करना, मूल्यों के ख़िलाफ़, एक गुनाह और शायद महापाप है। ऐसा नहीं है कि चूंकि अपनी संपत्ति से कारोबार करना जायज़ है तो उसकी बुनियाद पर इंसान यह हक़ रखता है कि हलाल तरीक़ों से ही क्यों न हो, धन दौलत इकट्ठा करे और बचाता चला जाए, जबकि समाज को उसकी धन संपत्ति, संसाधन और पूंजि की ज़रूरत हो और वो उसे सामाजिक हित और अल्लाह की राह में ख़र्च न करे, यह जायज़ हो, ऐसा नहीं है। इस्लाम में इन्फ़ाक (अल्लाह की राह में ख़र्च) एक बुनियादी उसूल है, अल्लाह की राह में ख़र्च करना चाहिए। यह नहीं कहा गया कि सौदा न कीजिए, पैसा न कमाइये, ये काम कीजिए लेकिन अल्लाह की राह में ख़र्च कीजिए।
इमाम ख़ामेनेई
06/11/2009