बिस्मिल्लाह-अर्रहमान-अर्रहीम

सारी तारीफ़ें पूरी कायनात के परवरदिगार के लिए हैं और दुरूद व सलाम हो पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और उनकी पाक नस्ल तथा चुनिंदा साथियों पर।

हकीम व क़दीर अल्लाह के शुक्रगुज़ार हैं कि उसने एक बार फिर हज के मुबारक दिनों को मुसलिम उम्मत की वादा-गाह क़रार दिया और अपनी रहमत का रास्ता उनके लिए खोला। मुस्लिम उम्मत एक बार फिर इस साफ़ सुथरे और अमर आईने में अपनी एकता व समरस्ता की झलक देख सकती है और फूट व बिखराव फैलाने वाली वजहों से दूरी बना सकती है।

मुसलमानों में एकता हज के दो बुनियादी स्तंभों में से एक है, जो अगर अल्लाह के ज़िक्र व रूहानियत के साथ –जो इस रहस्यों से भरे फ़रीज़े का दूसरा स्तंभ है– मिल जाए तो मुसलमान क़ौम को इज़्ज़त और ख़ुश क़िस्मती की चोटी पर पहुंचा सकती है और उसे (इस आयत) सारी इज़्ज़त तो सिर्फ़ अल्लाह, उसके पैग़म्बर और मोमिनों के लिए है, (1) का अमली नमूना बना सकती है। हज इन दो सियासी व रूहानी पहलुओं का संग्रह है और पवित्र दीने इस्लाम, सियासत व रूहानियत का महान व भव्य मजमूआ है।

हालिया इतिहास में मुस्लिम उम्मत के दुश्मनों ने इन दो निर्णायक आयामों यानी इत्तेहाद और रूहानियत को कमज़ोर करने के लिए हमारी उम्मत के बीच बड़ी गतिविधियां की हैं। वे रूहानियत को, पश्चिमी जीवन शैली का प्रचार करके, जो अध्यात्म से ख़ाली और संकीर्ण भौतिकवादी सोच का नतीजा है, ख़त्म करने की कोशिश कर रहे हैं और एकता को भाषा, रंग, नस्ल और भौगोलिक सीमाओं जैसी बेबुनियाद बहसों में शिद्दत पैदा करके चुनौती दे रहे हैं। 

मुसलमान उम्मत को, जिसका एक संक्षिप्त नमूना इस वक़्त हज के सांकेतिक संस्कारों में नज़र आ रहा है, अपने पूरे वजूद के साथ मुक़ाबले के लिए उठ खड़े होना चाहिए। अर्थात एक तरफ़ अल्लाह की याद, अल्लाह की बातों पर ग़ौर व फ़िक्र और अल्लाह के वादों पर भरोसे को अपने सामूहिक विवेक में मज़बूत बनाए और दूसरी तरफ़ फूट व बिखराव पैदा करने वाले तत्वों को क़ाबू में करे।

आज जो बात यक़ीन के साथ कही जा सकती है वह यह है कि इस वक़्त दुनिया और इस्लामी जगत के हालात, इस मूल्यवान कोशिश के लिए पहले से ज़्यादा अनुकूल हैं।

क्योंकि पहली बात तो यह कि इस्लामी मुल्कों में स्कालरों और बड़ी तादाद में अवाम का ज़ेहन अपनी क़ीमती रूहानी पूंजी की तरफ़ मुतवज्जेह हो चुका है और इसकी अहमियत व क़ीमत को महसूस कर चुका है। पश्चिमी सभ्यता के सबसे अहम तोहफ़े की हैसियत से आज लिब्रलिज़्म और कम्युनिज़्म अपनी सौ साल और पचास साल पहले वाली कशिश खो चुके हैं। पूँजी की धुरी पर घूमने वाली पश्चिम की डेमोक्रेसी की साख पर गंभीर सवालिया निशान लग चुके हैं और पश्चिमी स्कालर इस बात को मान रहे हैं कि वह शिनाख़्त और अमल के पहलू से सरगर्दां हो चुके हैं। इस्लामी जगत में नौजवान, स्कालर और इल्म तथा इल्म के मैदान में सरगर्म लोग, यह अंजाम देखने के बाद अपनी रूहानी पूंजी और इसी तरह अपने मुल्कों में प्रचलित सियासी उसूलों के बारे में नया नज़रिया क़ायम कर रहे हैं। यह वही इस्लामी बेदारी है जिसका हम हमेशा ज़िक्र करते हैं।

दूसरी बात यह कि इस इस्लामी बेदारी ने इस्लामी दुनिया के दिल में हैरतअंगेज़ व करिश्माती रुजहान पैदा कर दिया है जिसका मुक़ाबला करने में साम्राज्यवादी ताक़तें बेबस हैं। इस रूजहान का नाम प्रतिरोध है और इसकी हक़ीक़त ईमान, जेहाद और अल्लाह पर भरोसे की ताक़त है। यह वही चीज़ है जिसके एक नमूने के बारे में इस्लाम के शुरुआती दौर में यह आयत नाज़िल हुयी थीः वह कि जिनसे लोगों ने कहा कि लोगों ने तुम्हारे ख़िलाफ़ बड़ा लश्कर इकट्ठा किया है इसलिए तुम उनसे डरो- तो इस बात ने उनका ईमान और बढ़ा दिया- और उन्होंने कहा कि हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है और वह बड़ा कारसाज़ है। तो यह लोग अल्लाह की इनायत और उसके फ़ज़्ल व करम से इस तरह (अपने घरों की तरफ़) लौटे कि उन्हें किसी क़िस्म की तकलीफ़ छुई भी नहीं थी और अल्लाह की ख़ुशी के आगे नत्मस्तक रहे और अल्लाह बड़े फ़ज़्ल व करम वाला है। (2)

फ़िलिस्तीन का मैदान इस हैरतअंगेज़ हक़ीक़त की तसवीर पेश करता है और इस चीज़ की वजह से सरकश ज़ायोनी शासन अपनी हमलावर पोज़ीशन और शैतानी हरकतों को छोड़कर रक्षात्मक पोज़ीशन अपनाने और पीछे हटने पर मजबूर हो गया है और वह खुली हुयी सियासी, सेक्युरिटी और इकानामिक मुश्किलों में घिर गया है। प्रतिरोध के दूसरे शानदार नमूनों को लेबनान, इराक़, यमन और कुछ दूसरी जगहों पर साफ़ तौर पर देखा जा सकता है।     

तीसरी बात यह कि इन सबके साथ ही आज दुनिया इस्लामी देश ईरान में इस्लाम की ताक़त व सियासी सिस्टम का कामयाब नमूना देख रही है। इस्लामी जुमहूरिया की मज़बूती, स्वाधीनता, प्रगति और प्रतिष्ठा एक आकर्षक व अर्थपूर्ण हक़ीक़त है जो हर बेदार मुसलमान के ज़ेहन और जज़्बात को अपनी ओर आकर्षित कर सकती है। इस व्यवस्था के हम अधिकारियों की कमज़ोरी और कभी-कभी ग़लत कारगुज़ारी, जिसकी वजह से इस्लामी सरकार की सारी बर्कतों की प्राप्ति में ताख़ीर हुई, इस सिस्टम के मज़बूत स्तंभों व ठोस क़दमों को, जिनका आधार उसके बुनियादी उसूल हैं, कभी भी कमज़ोर नहीं कर सकी और न ही उसकी भौतिक व रूहानी प्रगति को रोक सकी। इन बुनियादी उसूलों में सबसे ऊपर क़ानूनसाज़ी और उसके क्रियानवयन में इस्लाम का प्रभुत्व, मुल्क के सबसे अहम प्रशासनिक मामलों में जनता की राय पर भरोसा, पूरी राजनैतिक स्वाधीनता और ज़ालिम ताक़तों की तरफ़ न झुकना है। यही उसूल मुसलमान क़ौमों और सरकारों की एकता की बुनियाद बन सकते हैं और इस्लामी दुनिया को फ़ैसलों व सहयोग में एकजुट कर सकते हैं।

यही सबब व तत्व हैं जिन्होंने इस्लामी दुनिया के मुत्तहिद व समन्वित होकर आगे बढ़ने के लिए अनुकूल व मुनासिब हालात पैदा किए हैं। मुसलमान हुकूमतों, स्कालरों व धार्मिक हस्तियों, आज़ाद सोच रखने वालों व सत्य के खोजी नौजवानों को इन मुनासिब हालात से पहले से ज़्यादा फ़ायदा उठाने के बारे में दूसरों से बढ़कर सोचना चाहिए।

स्वाभाविक सी बात है कि साम्राज्यवादी ताक़तें और सबसे बढ़कर अमरीका इस तरह के रुजहान से फ़िक्रमंद हो और इसके ख़िलाफ़ अपने सभी संसाधन इस्तेमाल करे, इस वक़्त ऐसा ही हो रहा है। मीडिया के मैदान में डिक्टेटरशिप और सॉफ़्ट वॉर के अनेक तरीक़ों से लेकर जंग शुरू करने और प्रॉक्सी वॉर के शोले भड़काने तक और राजनैतिक उकसावे व जासूसी से लेकर धमकी, लालच और रिश्वत देने तक, ये सारी चीज़ें अमरीका और दूसरी साम्राज्यवादी ताक़तों की ओर से इस्तेमाल की जा रही हैं, ताकि इस्लाम को, बेदारी व कामयाबी के रास्ते से हटाया जा सके। इस इलाक़े में मुजरिम और नफ़रतअंगेज़ ज़ायोनी शासन भी इस व्यापक हथकंडे का ही एक भाग है।

अल्लाह की कृपा और इरादे से ज़्यादातर मौक़ों पर ये कोशिशें नाकाम रही हैं और घमंडी पश्चिम हमारे संवेदनशील इलाक़े और हालिया दिनों में पूरी दुनिया में दिन ब दिन कमज़ोर हुआ है। इलाक़े में अमरीका और उसके मुजरिम साथी यानी नाजायज़ क़ब्ज़ा करने वाली ज़ायोनी हुकूमत की परेशानियों और नाकामियों को फ़िलिस्तीन, लेबनान, सीरिया, इराक़, यमन और अफ़ग़ानिस्तान की घटनाओं में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। इसके मुक़ाबले में इस्लामी दुनिया जोश व जज़्बे वाले नौजवानों से भरी हुई है। मुस्तक़बिल सवांरने के लिए सबसे बड़ी संपत्ति उम्मीद व आत्मविश्वास है जो आज इस्लामी दुनिया ख़ास तौर पर इस इलाक़े के मुल्कों में लहरें मार रहा है। हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि इस पूंजी की हिफ़ाज़त करें और इसे बढ़ाएं।

मगर इसके बावजूद दुश्मन की चालों से एक लम्हा भी ग़फ़लत नहीं होनी चाहिए। घमंड और लापरवाही से दूर रहना चाहिए और अपनी कोशिशों और बेदारी को बढ़ाना चाहिए। हर हाल में अल्लाह की ओर पूरा ध्यान होना चाहिए और गिड़गिड़ा कर सर्वशक्तिमान व तत्वदर्शी अल्लाह से मदद मांगनी चाहिए।

हज की क्रियाओं में शिरकत, अल्लाह पर तवक्कुल, दुआ और इसी तरह ग़ौर व फ़िक्र और फ़ैसले करने का बड़ा अहम मौक़ा है। पूरी दुनिया में अपने मुसलमान भाइयों और बहनों के लिए दुआ कीजिए और अल्लाह से उनकी कामयाबी व मदद तलब कीजिए। अपने इस भाई की हिदायत व मदद की दुआ को भी अपनी दुआओं में शामिल कीजिए।

आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत हो

सैयद अली ख़ामेनेई

5 ज़िलहिज्जा सन 1443 हिजरी क़मरी

14 तीर सन 1401 हिजरी शम्सी मुताबिक़ 5 जुलाई सन 2022

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  1. सूरा मुनाफ़ेक़ून, आयत 8
  2. सूरा आले इमरान, आयत 173 और 174